विषय: केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) + राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) [कुल 40 प्रश्न]
LIVE INTERACTIVE TESTING PAGE
सूचना के अधिकार एवं पारदर्शिता संगठनों का सम्पूर्ण वस्तुनिष्ठ ग्रन्थ
छात्र निर्देश: प्रत्येक प्रश्न के सही विकल्प पर क्लिक करके अपना उत्तर जांचें। क्लिक करते ही सही/गलत उत्तर हाइलाइट होगा और विधिक व्याख्या स्वतः नीचे प्रकट हो जाएगी।
अनुभाग 1: केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) — 15 प्रश्न
Q1. सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 की वैधानिक योजना के अनुसार, केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की स्थापना निम्नलिखित में से किस तारीख को आधिकारिक रूप से की गई थी?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 संसद द्वारा पास होने के बाद 15 जून 2005 को आंशिक रूप से लागू हुआ था। परंतु यह ऐतिहासिक कानून पूर्ण रूप से 12 अक्टूबर 2005 को देश में प्रभावी हुआ। इसी गौरवमयी तिथि को अधिनियम की धारा 12 के विधिक प्रावधानों के तहत देश में **केंद्रीय सूचना आयोग (CIC)** की विधिवत स्थापना एक शीर्ष स्वायत्त सांविधिक (Statutory) निकाय के रूप में की गई थी।
Q2. सूचना का अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2019 के प्रभावी होने के पश्चात, केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) एवं अन्य सूचना आयुक्तों के 'कार्यकाल' (Tenure) के संदर्भ में कौन-सा विधिक तथ्य सर्वथा सत्य है?
सही उत्तर: (C)गहन व्याख्या: आरपीएससी के आधुनिक ट्रेंड का यह सबसे कोर प्रश्न है। मूल अधिनियम 2005 के अनुसार सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्ष निश्चित था। परंतु **RTI (संशोधन) अधिनियम, 2019** द्वारा इस नियम को कड़ाई से बदल दिया गया। अब धारा 13 में संशोधन करके यह प्रावधान किया गया है कि कार्यकाल **केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित (Notified) अवधि** तक होगा। केंद्र सरकार ने इसके तहत वर्तमान में यह अवधि **3 वर्ष** निर्धारित की है। ऊपरी आयु सीमा अभी भी **65 वर्ष** ही अक्षुण्ण है। ये सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्ति (Re-appointment) के पात्र विधिक रूप से नहीं होते।
Q3. केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक 3-सदस्यीय उच्च स्तरीय 'चयन समिति' की सिफारिश पर की जाती है। इस समिति की विधिक संरचना में निम्नलिखित में से कौन शामिल होता है?
सही उत्तर: (A)गहन व्याख्या: RTI अधिनियम 2005 की धारा 12(3) के अनुसार, चयन समिति की संरचना में 3 विशिष्ट व्यक्ति शामिल होते हैं: 1. **प्रधानमंत्री** (जो समिति के अध्यक्ष होते हैं), 2. **लोकसभा में विपक्ष का नेता** (विपक्ष का नेता न होने पर सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता), तथा 3. प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत किया जाने वाला **एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री**। इस समिति में न्यायपालिका (CJI) का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होता है, इसे विशेष रूप से ध्यान रखें।
Q4. सूचना का अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2019 के विधिक नियमों के अनुसार, केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) एवं अन्य सूचना आयुक्तों के 'वेतन और भत्ते' (Salaries & Allowances) अंतिम रूप से किसके द्वारा विनियमित व निर्धारित किए जाते हैं?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: 2019 के संशोधन से पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन मुख्य चुनाव आयुक्त के समान तथा अन्य सूचना आयुक्तों का वेतन चुनाव आयुक्तों के समान विधिक रूप से तय था। परंतु **2019 के विधिक संशोधन** द्वारा इस वित्तीय अधिकार को केंद्र सरकार ने अपने अधीन कर लिया। अब अधिनियम की धारा 13 और 16 के तहत मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते और सेवा शर्तें **केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित** की जाती हैं। इसके तहत वर्तमान में मुख्य सूचना आयुक्त को ₹2,50,000/माह तथा अन्य सूचना आयुक्तों को ₹2,25,000/माह का निश्चित वेतन देय है।
Q5. केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की अधिकतम 'सांगठनिक संरचना' (Organization Structure) के संदर्भ में आरटीआई अधिनियम, 2005 में क्या विधिक सीमा निश्चित की गई है?
सही उत्तर: (C)गहन व्याख्या: अधिनियम की धारा 12(2) स्पष्ट विधिक व्यवस्था देती है कि केंद्रीय सूचना आयोग में एक 'मुख्य सूचना आयुक्त' (Chief Information Commissioner) होगा तथा उतनी संख्या में, **जो 10 से अधिक न हो**, केंद्रीय सूचना आयुक्त (Information Commissioners) होंगे। अर्थात आयोग में अधिकतम **1 + 10 = कुल 11** सदस्य ही हो सकते हैं, इससे अधिक नहीं।
Q6. केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त या किसी सूचना आयुक्त को उनके पद से हटाने (Removal) की अनन्य विधिक प्रक्रिया के संदर्भ में कौन-सा नियम सर्वथा सत्य है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 14** के अनुसार, मुख्य सूचना आयुक्त या किसी सूचना आयुक्त को केवल 'साबित कदाचार' (Proved Misbehaviour) या 'असमर्थता' (Incapacity) के आधार पर ही उनके पद से हटाया जा सकता है। इसके लिए विधिक सुरक्षा यह है कि राष्ट्रपति मामले को **उच्चतम न्यायालय** को जांच हेतु संदर्भित करेंगे। उच्चतम न्यायालय की विधिक जांच में आरोप सही पाए जाने की रिपोर्ट मिलने के बाद ही राष्ट्रपति उन्हें पद से हटा सकते हैं। (हालांकि दिवालिया होने या वैतनिक रोजगार में लगने पर सीधे भी हटाया जा सकता है)।
Q7. केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के विधिक इतिहास के संदर्भ में, वर्ष 2005 में देश के 'प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त' बनने का गौरव निम्नलिखित में से किसे प्राप्त हुआ था?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: वर्ष 2005 में केंद्रीय सूचना आयोग के गठन के समय देश के **प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त (First Chief Information Commissioner) के रूप में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी श्री वजाहत हबीबुल्लाह** को नियुक्त किया गया था। उनका कार्यकाल आयोग के शुरुआती विधिक नियमों और पारदर्शिता के विंग को खड़ा करने में ऐतिहासिक माना जाता है।
Q8. केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के इतिहास में 'प्रथम महिला मुख्य सूचना आयुक्त' (First Woman Chief Information Commissioner) बनने का गौरव किसे प्राप्त हुआ था?
सही उत्तर: (C)गहन व्याख्या: देश के केंद्रीय सूचना आयोग के इतिहास में **श्रीमती दीपक संधू (Deepak Sandhu)** वर्ष 2013 में आयोग की **प्रथम महिला मुख्य सूचना आयुक्त** नियुक्त की गई थीं। उनके पश्चात श्रीमती सुष्मा सिंह भी इस शीर्ष पद पर आसीन रही हैं। अतः प्रथम महिला का विधिक रिकॉर्ड दीपक संधू के नाम दर्ज है।
Q9. आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 18 के विधिक उपबंधों के अनुसार, केंद्रीय सूचना आयोग को किसी शिकायत की जांच (Inquiry) करते समय निम्नलिखित में से किस न्यायालय की पूर्ण विधिक शक्तियां प्राप्त होती हैं?
सही उत्तर: (A)गहन व्याख्या: अधिनियम की धारा 18(3) स्पष्ट रूप से अधिदेश देती है कि इस कानून के तहत किसी भी शिकायत की जांच करते समय, केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को **सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908** के अधीन उन मामलों के संबंध में **एक दीवानी अदालत (Civil Court)** की पूर्ण शक्तियां प्राप्त होंगी जो गवाहों को समन करने, शपथ पर गवाही लेने, सार्वजनिक दस्तावेजों को मँगाने और हलफनामे पर साक्ष्य दर्ज करने से संबंधित हों।
Q10. आरटीआई अधिनियम की धारा 20 के विधिक प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई लोक सूचना अधिकारी (PIO) बिना किसी तर्कसंगत कारण के सूचना देने से मना करता है, तो आयोग उस पर प्रतिदिन के हिसाब से अधिकतम कितना दंडात्मक जुर्माना (Penalty) लगा सकता है?
सही उत्तर: (C)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 20(1)** आयोग को दंडात्मक जुर्माना लगाने की एक अत्यंत प्रभावी और वास्तविक विधिक शक्ति सौंपती है। यदि कोई केंद्रीय या राज्य जन सूचना अधिकारी (PIO) दुर्भावनापूर्वक या लापरवाही से आवेदन स्वीकार करने से मना करता है या गलत सूचना देता है, तो आयोग उस पर **₹250 प्रति दिन** की दर से जुर्माना लगाएगा, बशर्ते ऐसे जुर्माने की कुल संचयी राशि **₹25,000 से अधिक नहीं होगी**। यह जुर्माना संबंधित अधिकारी के निजी वेतन से काटा जाता है।
Q11. आरटीआई अधिनियम, 2005 के विधिक अपीलीय ढांचे के अनुसार, जन सूचना अधिकारी (PIO) के निर्णय के विरुद्ध 'द्वितीय अपील' (Second Appeal) आयोग के समक्ष अधिकतम कितने दिनों के भीतर दर्ज की जानी अनिवार्य है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: आरटीआई कानून में दो स्तर की अपीलों का विधिक प्रावधान है। यदि कोई आवेदक पीआईओ के निर्णय से संतुष्ट नहीं है, तो वह 30 दिनों के भीतर अपने ही विभाग के वरिष्ठ अधिकारी के समक्ष 'प्रथम अपील' दर्ज कराएगा। यदि प्रथम अपील के निर्णय से भी संतोष न हो, तो अधिनियम की **धारा 19(3)** के तहत वह निर्णय प्राप्त होने की तिथि से **90 दिनों के भीतर** सीधे केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग के समक्ष **'द्वितीय अपील' (Second Appeal)** दर्ज करा सकता है। विशेष विधिक कारणों से आयोग इस अवधि के बाद भी अपील स्वीकार कर सकता है।
Q12. केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) प्रतिवर्ष देश में सूचना के अधिकार के क्रियान्वयन की अपनी विस्तृत 'वार्षिक प्रशासनिक रिपोर्ट' (Annual Report) वैधानिक रूप से किसे सौंपता है?
सही उत्तर: (A)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 25** स्पष्ट रूप से यह वैधानिक नियम अधिदेशित करती है कि केंद्रीय सूचना आयोग प्रतिवर्ष इस कानून के अनुपालन की एक विस्तृत वार्षिक रिपोर्ट तैयार करके **केंद्र सरकार (Central Government)** को सौंपेगा। केंद्र सरकार उस रिपोर्ट को प्राप्त होने के पश्चात, संसद के प्रत्येक सदन (लोकसभा और राज्यसभा) के पटल पर रखवाने की विधिक व्यवस्था सुनिश्चित करती है।
Q13. आरटीआई अधिनियम, 2005 की किस विशिष्ट 'धारा' के तहत केंद्रीय व राज्य सूचना आयोग को यह विधिक शक्ति प्राप्त है कि वह लोक प्राधिकारी को रिकॉर्ड के उचित प्रबंधन और डिजिटलीकरण का सीधा निर्देश जारी कर सकता है?
सही उत्तर: (C)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 19(8)** आयोग को व्यापक सुधारात्मक विधिक शक्तियां सौंपती है। इसके तहत किसी अपील का निपटारा करते समय आयोग लोक प्राधिकारी (Public Authority) को यह निर्देश दे सकता है कि वह: रिकॉर्ड के प्रबंधन, रखरखाव और इंडेक्सिंग के तौर-तरीकों में बदलाव करे, सूचना के डिजिटलीकरण को बढ़ावा दे, तथा लोक सूचना अधिकारियों को प्रशिक्षण प्रदान करे। यह आयोग की एक अत्यंत शक्तिशाली प्रशासनिक शक्ति है।
Q14. यदि कोई नागरिक भारत की संप्रभुता, अखंडता या सुरक्षा से संबंधित अति संवेदनशील जानकारी आरटीआई के तहत मांगता है, तो अधिनियम की किस धारा के विधिक अपवाद के तहत PIO उसे सूचना देने से मना कर सकता है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: आरटीआई कानून में पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा के मध्य कड़ा विधिक संतुलन बनाया गया है। अधिनियम की **धारा 8(1)** उन श्रेणियों (Exemptions) को सूचीबद्ध करती है जिनके तहत सूचना देने से छूट प्राप्त है। यदि जानकारी प्रकट होने से भारत की संप्रभुता, अखंडता, सामरिक व वैज्ञानिक हित, विदेशी राज्यों के साथ संबंधों या आंतरिक सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो धारा 8(1)(a) के तहत पीआईओ सूचना देने से विधिक रूप से पूर्णतः मना कर सकता है।
Q15. वैधानिक नियमों के अनुसार, केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) का मुख्य प्रशासनिक सचिवालय स्टाफ (Secretariat Staff) तथा आयोग के संपूर्ण वित्तीय खर्चे भारत सरकार के किस नोडल मंत्रालय के प्रशासनिक बजटीय क्षेत्राधिकार के अधीन आते हैं?
सही उत्तर: (A)गहन व्याख्या: केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) एक स्वतंत्र सांविधिक संस्था होने के बावजूद, प्रशासनिक और बजटीय नियमों के संचालन हेतु भारत सरकार के **कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय** (विशेष रूप से इसके कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग - DoPT) के सीधे नोडल समन्वय में कार्य करता है। आयोग का बजट आवंटन और स्टाफ की सेवा शर्तें इसी मंत्रालय के विधिक प्रभाग द्वारा नियमन की जाती हैं।
अनुभाग 2: राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) — 25 प्रश्न
Q16. राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) की ऐतिहासिक स्थापना और विधिक सुदृढ़ीकरण के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा प्रांतीय विधिक तथ्य पूर्णतः सत्य है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) की स्थापना के लिए अलग से कोई राज्य कानून नहीं बना था। केंद्रीय आरटीआई अधिनियम 2005 की **धारा 15** राज्य सरकारों को यह विधिक शक्ति देती है कि वे अपने यहाँ राज्य सूचना आयोग का गठन करें। इसी शक्ति के तहत राजस्थान सरकार ने एक गजट अधिसूचना जारी करके **13 अप्रैल 2006** को राजस्थान राज्य सूचना आयोग का विधिवत गठन किया था। इसका स्थायी मुख्यालय **जयपुर** में स्थित है तथा इसकी कार्यप्रणाली **18 अप्रैल 2006** से अनवरत रूप से लाइव हुई थी।
Q17. राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) के अध्यक्ष (राज्य मुख्य सूचना आयुक्त) एवं अन्य सूचना आयुक्तों की 'नियुक्ति' (Appointment) करने की अनन्य विधिक शक्ति अधिनियम की धारा 15(3) के तहत किसमें निहित है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: अधिनियम की धारा 15(3) के अनुसार, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति **संबंधित राज्य के राज्यपाल** द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर सहित वारंट द्वारा की जाएगी। व्यावहारिक रूप से राज्यपाल महोदय एक उच्च स्तरीय प्रांतीय चयन समिति की सिफारिश पर ही यह नियुक्ति आदेश जारी करते हैं, जिसके अध्यक्ष राज्य के मुख्यमंत्री होते हैं।
Q18. राजस्थान राज्य सूचना आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति करने वाली प्रांतीय 'चयन समिति' (Selection Committee) की विधिक संरचना में निम्नलिखित में से कौन अनिवार्य रूप से शामिल होता है?
सही उत्तर: (D)गहन व्याख्या: केंद्रीय चयन समिति की तर्ज पर ही राज्यों में भी 3-सदस्यीय चयन समिति का कड़ा विधिक नियम है। इसमें: 1. **मुख्यमंत्री** (अध्यक्ष), 2. **विधानसभा में विपक्ष का नेता**, तथा 3. मुख्यमंत्री द्वारा मनोनीत **एक कैबिनेट मंत्री** शामिल होते हैं। इस प्रांतीय समिति में राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या आरपीएससी के अध्यक्ष को शामिल करने का कोई विधिक नियम नहीं है। अतः विकल्प (D) पूर्णतः सत्य है।
Q19. आरपीएससी के बदलते और आगामी एडवांस परीक्षा पैटर्न के अनुसार कूट आधारित प्रश्न: राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) के सांगठनिक ढांचे के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अधिनियम के अनुसार आयोग में 1 राज्य मुख्य सूचना आयुक्त तथा अधिकतम 10 अन्य राज्य सूचना आयुक्त हो सकते हैं।
2. स्थापना के समय से ही आयोग में हमेशा 1 मुख्य सूचना आयुक्त और 10 सूचना आयुक्तों के सभी पद पूर्णतः लाइव संचालित किए जा रहे हैं।
सही उत्तर: (A)गहन व्याख्या: अधिनियम की धारा 15(2) के विधिक नियमानुसार आयोग की अधिकतम सीमा **1 + 10 = कुल 11** ही निश्चित की गई है, अतः कथन 1 सत्य है। परंतु कथन 2 पूर्णतः असत्य है क्योंकि व्यावहारिक और प्रशासनिक रूप से राजस्थान सरकार ने शुरुआत में केवल 1 मुख्य सूचना आयुक्त और 1 या 2 सदस्यों की ही नियुक्ति की थी। हाल के वर्षों में कार्यभार बढ़ने पर सदस्यों की संख्या बढ़ाकर बढ़ाई गई है, परंतु स्थापना के समय से सभी 10 पद कभी भी एक साथ लाइव नहीं रहे हैं।
Q20. राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) के विधिक इतिहास के संदर्भ में, अप्रैल 2006 में राज्य के 'प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त' नियुक्त होने का ऐतिहासिक कीर्तिमान किसके नाम दर्ज है?
सही उत्तर: (C)गहन व्याख्या: राजस्थान में 13 अप्रैल 2006 को आयोग के गठन के पश्चात, राज्य के **प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में वरिष्ठ पूर्व प्रशासनिक अधिकारी श्री एम.डी. कौराणी (M.D. Kaurani)** को 18 अप्रैल 2006 को पदभार विधिक रूप से सौंपा गया था। परीक्षा हेतु ध्यान रखें कि वर्तमान में इस गरिमामयी पद का दायित्व **श्री डी.बी. गुप्ता** (सुरेश चौधरी व अन्य के बाद) संभाल रहे हैं।
Q21. सूचना का अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2019 के प्रभावी होने के पश्चात, राजस्थान के राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों के 'कार्यकाल' के संदर्भ में कौन-सा नियम वर्तमान में विधिक रूप से लागू होता है?
सही उत्तर: (A)गहन व्याख्या: यह आरपीएससी जाल बिछाने वाला सबसे एडवांस प्रश्न है। छात्र अक्सर सोचते हैं कि राज्य आयोग है तो कार्यकाल राज्य सरकार तय करेगी। परंतु **RTI (संशोधन) अधिनियम, 2019 की धारा 15 व 16** के अनुसार, राज्य स्तर के मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल भी **अनन्य रूप से केंद्र सरकार (Central Government) द्वारा ही निर्धारित किया जाता है**। केंद्र सरकार ने इसके तहत देश के सभी राज्यों हेतु यह अवधि **3 वर्ष** अधिसूचित की है। ऊपरी आयु सीमा **65 वर्ष** ही विधिक रूप से मान्य है।
Q22. राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) के अध्यक्ष व सदस्यों को गंभीर कदाचार या वित्तीय अनियमितता के आरोपों के आधार पर पद से हटाने (Removal) की अनन्य विधिक शक्ति अधिनियम की धारा 17 के तहत किसमें निहित है?
सही उत्तर: (C)गहन व्याख्या: यह आरपीएससी (RPSC) के नियमों से पूर्णतः भिन्न है! आरपीएससी के सदस्यों को हटाते राष्ट्रपति हैं, परंतु **राज्य सूचना आयोग (RIC)** के अध्यक्ष व सदस्यों को पद से हटाने की अनन्य विधिक शक्ति **राज्य के राज्यपाल** में निहित है। अधिनियम की धारा 17(1) के तहत राज्यपाल महोदय भी सीधे अपनी मर्जी से नहीं हटा सकते; उन्हें पहले मामला **उच्चतम न्यायालय (Supreme Court)** को जांच हेतु भेजना होता है। उच्चतम न्यायालय की विधिक जांच में आरोप सिद्ध होने की रिपोर्ट के बाद ही राज्यपाल अंतिम आदेश जारी करते हैं। जांच के दौरान राज्यपाल उन्हें निलंबित (Suspend) कर सकते हैं।
Q23. सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 19(1) के वैधानिक नियमों के अनुसार, यदि किसी नागरिक को पीआईओ (PIO) से समय पर सूचना नहीं मिलती है, तो वह प्रथम अपील (First Appeal) अधिकतम कितने दिनों के भीतर दर्ज करा सकता है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 19(1)** के तहत प्रथम अपील का कड़ा नियम है। यदि पीआईओ 30 दिनों के भीतर सूचना नहीं देता है या गलत सूचना देता है, तो आवेदक उस निर्णय की अवधि समाप्त होने के **30 दिनों के भीतर** उसी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी (First Appellate Authority) के समक्ष प्रथम अपील दर्ज कराएगा। यदि अधिकारी संतुष्ट हो जाए कि आवेदक किसी वैध कारण से लेट हुआ था, तो वह 30 दिन बीतने के बाद भी अपील को विधिक रूप से स्वीकार कर सकता है।
Q24. यदि आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी किसी व्यक्ति के 'जीवन या स्वतंत्रता' (Life or Liberty) से संबंधित है, तो अधिनियम की धारा 7(1) के विधिक परंतुक के अनुसार सूचना अधिकतम कितने समय सीमा के भीतर दी जानी अनिवार्य है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: यह आरटीआई कानून का सबसे मानवीय और कड़ा विधिक उपबंध है। सामान्यतः पीआईओ को सूचना देने के लिए 30 दिनों का समय मिलता है। परंतु यदि मांगी गई जानकारी किसी नागरिक के **प्राण या दैहिक स्वतंत्रता (Life or Liberty)** से सीधे सरोकार रखती है (जैसे जेल में बंद व्यक्ति की मेडिकल रिपोर्ट या कस्टडी का मामला), तो जन सूचना अधिकारी को आवेदन प्राप्त होने के **48 घंटे के भीतर** अनिवार्य रूप से जानकारी उपलब्ध करानी होगी। विफल रहने पर अधिकारी पर कड़ा अनुशासनात्मक मुकदमा चलता है।
Q25. राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) प्रतिवर्ष अपनी संपूर्ण विधिक गतिविधियों और अपीलीय निर्णयों का 'वार्षिक प्रतिवेदन' (Annual Report) अधिनियम की धारा 25(1) के तहत किसे सौंपता है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: अधिनियम की धारा 25(1) के विधिक नियमानुसार, राजस्थान राज्य सूचना आयोग अपनी संपूर्ण वार्षिक रिपोर्ट तैयार करके **राज्य सरकार (State Government)** को प्रस्तुत करता है। राज्य सरकार इस रिपोर्ट को प्राप्त होने के पश्चात, इसे राज्य विधानमंडल (विधानसभा) के समक्ष पटल पर रखवाने की विधिक व्यवस्था करती है, ताकि जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा पारदर्शिता की समीक्षा की जा सके।
Q26. आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 11 के विधिक प्रावधानों के अनुसार, यदि मांगी गई सूचना किसी 'तृतीय पक्ष' (Third Party Information) के व्यापारिक या व्यक्तिगत गोपनीयता से संबंधित है, तो PIO को निर्णय लेने से पूर्व अधिकतम कितने दिनों का विधिक समय अतिरिक्त मिलता है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 11** 'पर-व्यक्ति' या 'तृतीय पक्ष' (Third Party) की सूचना से संबंधित है। यदि आवेदक किसी अन्य व्यक्ति से जुड़ी गोपनीय जानकारी मांगता है, तो पीआईओ आवेदन प्राप्त होने के 5 दिनों के भीतर उस तीसरे व्यक्ति को लिखित नोटिस जारी कर सहमति मांगेगा। उस तीसरे व्यक्ति को अपनी आपत्ति दर्ज कराने के लिए 10 दिनों का समय मिलता है। इस पूरी विधिक प्रक्रिया के कारण, सामान्य 30 दिनों की समय सीमा बढ़कर अधिकतम **40 दिन** विधिक रूप से हो जाती है।
Q27. यदि राज्य सूचना आयोग के किसी अपीलीय निर्णय से कोई लोक प्राधिकारी या नागरिक संतुष्ट नहीं है, तो आरटीआई अधिनियम के अनुसार आयोग के फैसले के विरुद्ध कहाँ विधिक अपील दायर की जा सकती है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: वैधानिक योजना के अनुसार, **सूचना आयोग (CIC/RIC) आरटीआई कानून के तहत अंतिम और सर्वोच्च अपीलीय प्राधिकारी है**। इसके फैसलों के विरुद्ध किसी अन्य ऊंचे सूचना बोर्ड या न्यायाधिकरण में कोई प्रशासनिक अपील दायर करने का विधिक प्रावधान नहीं है। हालांकि, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत, पीड़ित पक्ष (चाहे वह नागरिक हो या सरकारी विभाग) **उच्च न्यायालय (High Court)** में 'रिट पिटीशन' दायर करके आयोग के फैसले की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) कराने का विधिक अधिकार रखता है। न्यायालय केवल प्रक्रियात्मक कमियों पर ही हस्तक्षेप करता है।
Q28. आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 22 के 'अध्यारोही प्रभाव' (Overriding Effect) का विधिक दृष्टिकोण से क्या वास्तविक अर्थ प्रस्तुत होता है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 22** इस पूरे कानून का सबसे शक्तिशाली विधिक सुरक्षा कवच है जिसे 'अध्यारोही प्रभाव' (Overriding Effect) कहा जाता है। ब्रिटिश काल के *शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 (Official Secrets Act)* का बहाना बनाकर अधिकारी अक्सर सूचनाएं छुपाते थे। धारा 22 स्पष्ट करती है कि यदि किसी पुराने कानून या नियमों में सूचना देने पर रोक लगाई गई है, परंतु आरटीआई अधिनियम के तहत वह सूचना देने योग्य है, तो **आरटीआई कानून के विधिक प्रावधान ही लागू होंगे** और अधिकारी को सूचना देनी होगी।
Q29. आरटीआई अधिनियम की धारा 24 के कड़े विधिक अपवादों के अनुसार, देश की विख्यात खुफिया और सुरक्षा संस्थाएं (जैसे IB, RAW, BSF) सूचना देने के दायरे से मुक्त हैं। परंतु इन संस्थाओं पर भी किस गंभीर परिस्थिति के आधार पर सूचना देना विधिक रूप से अनिवार्य माना गया है?
सही उत्तर: (A)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 24** के तहत केंद्रीय खुफिया और सुरक्षा संगठनों (द्वितीय अनुसूची में शामिल 26 से अधिक संस्थाएं जैसे IB, RAW, CBI, BSF आदि) को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है ताकि देश की आंतरिक सुरक्षा अक्षुण्ण रहे। परंतु, इसी धारा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक परंतुक (Proviso) जोड़ा गया है: यदि मांगी गई जानकारी **भ्रष्टाचार के आरोपों** से संबंधित है, या **मानव अधिकारों के उल्लंघन** से जुड़ी है, तो ये संस्थाएं भी सूचना देने के लिए **विधिक रूप से बाध्य हैं**। मानव अधिकार उल्लंघन से जुड़े मामलों में सूचना देने से पूर्व **केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग की लिखित मंजूरी** अनिवार्य होती है और ऐसी सूचना **45 दिनों के भीतर** देनी होती है।
Q30. आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 4(1)(b) के विधिक प्रावधानों के अनुसार, प्रत्येक 'लोक प्राधिकारी' (Public Authority) के लिए स्वतः संज्ञान लेकर (Suo Motu Disclosure) अपनी संपूर्ण प्रशासनिक संरचना और नियमों की कितनी श्रेणियों की जानकारी इंटरनेट पर सार्वजनिक करना विधिक रूप से अनिवार्य है?
सही उत्तर: (C)गहन व्याख्या: आरटीआई अधिनियम की **धारा 4(1)(b)** स्वतः संज्ञान प्रकटन (Proactive/Suo Motu Disclosure) से संबंधित है। यह कानून का सबसे कोर दर्शन है जो कहता है कि नागरिकों को आरटीआई लगाने की आवश्यकता ही न पड़े, प्रशासन खुद ही पारदर्शी हो। इसके तहत प्रत्येक सरकारी विभाग/लोक प्राधिकारी के लिए **17 विशिष्ट श्रेणियों (17 Manuals)** की जानकारी (जैसे संगठन के कार्य, अधिकारियों की शक्तियां, निर्णय लेने की प्रक्रिया, कर्मचारियों की डायरेक्टरी, मासिक वेतनमान, आवंटित बजट आदि) को अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर स्वतः सार्वजनिक और रीयल-टाइम अपडेट करना विधिक रूप से अनिवार्य किया गया है।
Q31. राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) के सांगठनिक इतिहास में, निम्नलिखित में से किस मुख्य सूचना आयुक्त के कार्यकाल के दौरान राज्य में पारदर्शिता को बढ़ावा देने हेतु 'आरआरटीआई' (RRTI - Remote RTI Portals) प्रभागों की स्थापना की शुरुआत प्रांतीय स्तर पर की गई थी?
सही उत्तर: (A)गहन व्याख्या: राजस्थान में पारदर्शिता और दूरदराज के क्षेत्रों के नागरिकों तक आरटीआई की पहुँच को सुगम बनाने के उद्देश्य से, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त **श्री सुरेश चौधरी** के कार्यकाल के दौरान राज्य सूचना आयोग के भीतर प्रशासनिक नवाचारों और डिजिटल रिमोट आरटीआई मॉनिटरिंग प्रभागों को विधिक रूप से गति प्रदान की गई थी। अतः विकल्प (A) प्रशासनिक इतिहास की दृष्टि से पूर्णतः सत्य है।
Q32. आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 2(h) के विधिक प्रावधानों के अनुसार, निम्नलिखित में से किसे 'लोक प्राधिकारी' (Public Authority) के विधिक दायरे में शामिल माना जाएगा, जिससे नागरिक सूचना मांग सकते हैं?
सही उत्तर: (D)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 2(h)** 'लोक प्राधिकारी' (Public Authority) को विधिक रूप से परिभाषित करती है। इसके अनुसार, प्रत्येक वह संस्थान पारदर्शी होने के लिए बाध्य है जो: संविधान से बना हो, संसद या विधानसभा के कानून से बना हो, या सरकार की अधिसूचना से स्थापित हुआ हो। साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई निजी ट्रस्ट, स्कूल या एनजीओ सरकार से सीधे **सार्थक फंड या ज़मीन (Substantial Funding)** प्राप्त करता है, तो वह भी लोक प्राधिकारी के दायरे में आएगा और उसे अपने यहाँ पीआईओ की नियुक्ति करनी होगी।
Q33. आरटीआई अधिनियम की धारा 19(6) के विधिक अधिदेश के अनुसार, प्रथम अपीलीय प्राधिकारी (First Appellate Authority) के लिए किसी भी प्रथम अपील का निपटारा अधिकतम कितने दिनों के भीतर करना विधिक रूप से अनिवार्य है?
सही उत्तर: (C)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 19(6)** प्रथम अपीलीय प्राधिकारी (जो सरकारी विभाग का वरिष्ठ अधिकारी होता है) पर कड़ा समय नियंत्रण लागू करती है। अपील प्राप्त होने पर उसे सामान्यतः **30 दिनों के भीतर** अपना अंतिम लिखित निर्णय देना होता है। परंतु यदि मामला जटिल है, तो वह लिखित में कारणों को दर्ज करके इस समय सीमा को **45 दिनों** तक बढ़ा सकता है, इससे अधिक एक भी दिन की छूट विधिक रूप से स्वीकार्य नहीं है।
Q34. आरपीएससी के आगामी पैटर्न के अनुसार कूट आधारित प्रश्न: राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) की विधिक स्वायत्तता और शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. आयोग को किसी भी विभाग के लोक अभिलेखों (Public Records) की जांच करने की पूर्ण विधिक शक्ति प्राप्त है, और जांच के दौरान कोई भी अभिलेख आयोग से छुपाया नहीं जा सकता।
2. आयोग के पास अपनी जांच के दौरान पाए गए दोषी लोक सूचना अधिकारी के विरुद्ध सीधे विभागीय स्तर पर कड़ा अनुशासनात्मक मुकदमा (Disciplinary Action) चलाने की सिफारिश करने का अनन्य विधिक अधिकार है।
सही उत्तर: (D)गहन व्याख्या: आरपीएससी के एडवांस पेपर हेतु दोनों कथन बिल्कुल सत्य हैं। अधिनियम की धारा 18(4) के तहत आयोग को किसी भी लोक प्राधिकारी के कस्टडी वाले रिकॉर्ड्स की जांच करने की पूर्ण विधिक शक्ति है, और "किसी भी आधार पर कोई भी रिकॉर्ड आयोग से रोका नहीं जा सकता।" साथ ही, धारा 20(2) आयोग को यह अनन्य अधिकार देती है कि यदि पीआईओ लगातार नियमों का उल्लंघन करता है, तो आयोग उसके सेवा नियमों (Service Rules) के तहत उसके विरुद्ध **अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Action)** करने का कड़ा निर्देश सीधे सक्षम प्राधिकारी/सरकार को जारी कर सकता है।
Q35. आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 19(7) के वैधानिक उपबंधों के अनुसार, द्वितीय अपील या शिकायत पर विचार करते समय सूचना आयोग (CIC/RIC) द्वारा जारी किए जाने वाले फैसलों का विधिक दर्जा क्या होता है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 19(7)** स्पष्ट और कड़ा विधिक अधिदेश जारी करती है कि: "आयोग द्वारा अपील पर किया गया निर्णय लोक प्राधिकारी पर **बाध्यकारी (Binding) होगा**।" इसका अर्थ यह है कि सरकारी विभाग आयोग के आदेश को सीधे खारिज या निरस्त नहीं कर सकता; उसे आदेश का पालन करते हुए सूचना आवेदक को देनी ही होगी, जब तक कि वह उच्च न्यायालय से उस आदेश पर स्थगन (Stay) प्राप्त न कर ले।
Q36. आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 23 के विधिक प्रावधानों के अनुसार, लोक सूचना अधिकारी (PIO) या आयोग के प्रशासनिक आदेशों के विरुद्ध देश के 'निचले दीवानी न्यायालयों' (Lower Civil Courts) के क्षेत्राधिकार पर क्या प्रतिबंध लगाया गया है?
सही उत्तर: (A)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 23** न्यायालयों के क्षेत्राधिकार के वर्जन (Bar of Jurisdiction of Courts) से संबंधित है। आरटीआई मुकदमों के त्वरित निस्तारण और अनावश्यक मुक़दमेबाज़ी से बचने के लिए यह कड़ा नियम बनाया गया है कि कोई भी निचली दीवानी अदालत (Civil Court) जन सूचना अधिकारी या अपीलीय अधिकारियों द्वारा की गई किसी भी कार्रवाई या जारी आदेश के विरुद्ध कोई मुकदमा, आवेदन या निषेधाज्ञा (Injunction) स्वीकार नहीं करेगी। (ध्यान दें: यह रोक निचली अदालतों पर है, उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक रिट शक्तियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता)।
Q37. आरटीआई अधिनियम की धारा 10 के विधिक प्रावधानों के अनुसार, यदि मांगी गई विस्तृत सूचना का कोई एक छोटा सा हिस्सा धारा 8 के तहत प्रकट करने से वर्जित (Exempted) है, तो पीआईओ द्वारा अपनाई जाने वाली विधिक प्रक्रिया को क्या कहा जाता है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 10** 'पृथक्करणीयता' (Severability) के सिद्धांत को विधिक रूप से लागू करती है। यदि किसी बड़ी रिपोर्ट में कुछ नाम या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील तथ्य शामिल हैं जो धारा 8 के तहत छुपाने योग्य हैं, तो पीआईओ पूरे आवेदन को खारिज नहीं करेगा। वह उस फाइल/दस्तावेज़ में से केवल उतने हिस्से (जैसे नाम या आंकड़े) को छुपा या ब्लैक-आउट (Black-out) कर देगा जो वर्जित है, और दस्तावेज़ का शेष बचा हुआ वैध हिस्सा आवेदक को **पृथक करके प्रदान कर देगा**।
Q38. राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) के सुचारू और पारदर्शी प्रशासनिक संचालन हेतु, आयोग का सर्वोच्च कार्यकारी विंग अधिकारी अर्थात् 'मुख्य सचिव' (Secretary) तथा प्रशासनिक स्टाफ की नियुक्ति का विधिक अधिकार अधिनियम की किस धारा के तहत विनियमित होता है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 16(4)** के विधिक प्रावधानों के अनुसार, राज्य सरकार राज्य सूचना आयोग को उतने कर्मचारी और अधिकारी (सचिवालय स्टाफ) उपलब्ध कराएगी जो इस अधिनियम के अधीन उसके कार्यों के कुशल संपादन के लिए आवश्यक हों। इसी कोटे के तहत राज्य सरकार प्रतिनियुक्ति पर एक वरिष्ठ आईएएस या आरएएस अधिकारी को **आयोग सचिव (Secretary)** के रूप में तैनात करती है जो आयोग के प्रशासनिक और बजटीय मामलों का नियमन करता है।
Q39. आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 21 के विधिक प्रावधानों के अनुसार, इस कानून के उपबंधों के अनुसरण में नेकनियती या 'सद्भावनापूर्वक की गई कार्रवाई' (Protection of action taken in good faith) के संदर्भ में आयोग के अधिकारियों को कौन-सा विधिक कवच प्राप्त होता है?
सही उत्तर: (A)गहन व्याख्या: अधिनियम की **धारा 21** लोक सेवकों और आयोग के सदस्यों को शासकीय कार्यों के संपादन के दौरान अत्यंत महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच देती है जिसे 'सद्भावनापूर्वक की गई कार्रवाई का संरक्षण' (Protection of action taken in good faith) कहा जाता है। इसके अनुसार, यदि किसी अधिकारी ने इस अधिनियम के नियमों के तहत पूरी ईमानदारी और नेकनियती से कोई आदेश जारी किया है या सूचना प्रकट की है, तो उस कृत्य के कारण भविष्य में उसके विरुद्ध किसी भी अदालत में कोई दीवानी या आपराधिक मुकदमा दायर नहीं किया जा सकता।
Q40. राजस्थान राज्य सूचना आयोग (RIC) द्वारा आरटीआई के मामलों और प्रथम अपीलों की ऑनलाइन मॉनिटरिंग व पारदर्शी त्वरित निस्तारण हेतु विकसित किया गया आधुनिक डिजिटल 'ई-पोर्टल' निम्नलिखित में से कौन-सा है?
सही उत्तर: (B)गहन व्याख्या: डिजिटल गवर्नेंस और ई-पारदर्शिता के विधिक सिद्धांतों को धरातल पर उतारने के उद्देश्य से, राजस्थान सरकार और राज्य सूचना आयोग ने संयुक्त रूप से **RTI Portal Rajasthan** (rti.rajasthan.gov.in) का विकास किया है। इस अत्याधुनिक डिजिटल पोर्टल के माध्यम से राजस्थान का कोई भी नागरिक घर बैठे ऑनलाइन आरटीआई आवेदन दर्ज कर सकता है, ऑनलाइन फीस का भुगतान कर सकता है, तथा पीआईओ के निर्णयों के विरुद्ध सीधे आयोग के समक्ष डिजिटल रूप से प्रथम व द्वितीय अपील दायर करके अपने मुक़दमे का रीअल-टाइम स्टेटस ट्रैक कर सकता है।