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भारत की जलवायु को समझने के लिए केवल "मानसून" को जानना पर्याप्त नहीं है। भारत की जलवायु अक्षांश, ऊँचाई, स्थल-जल वितरण, हिमालय, समुद्र से दूरी, स्थलाकृति, वायुदाब, पवन-परिसंचरण तथा महासागरीय-वायुमंडलीय घटनाओं की संयुक्त क्रिया का परिणाम है।
भारत लगभग 8°4′ से 37°6′ उत्तरी अक्षांश तक विस्तृत है। कर्क रेखा (23°30′ उ.) लगभग भारत के मध्य भाग से गुजरती है। इस कारण भारत की जलवायु में उष्णकटिबंधीय तथा उपोष्णकटिबंधीय दोनों विशेषताएँ दिखाई देती हैं।
सामान्यतः दक्षिण से उत्तर की ओर वार्षिक तापमान में मौसमीता बढ़ती है। लेकिन केवल अक्षांश से भारत की जलवायु को नहीं समझा जा सकता, क्योंकि समुद्र, ऊँचाई, स्थलाकृति और पवनें इस प्रभाव को संशोधित करती हैं।
कर्क रेखा भारत के 8 राज्यों से गुजरती है। उत्तर भारत में महाद्वीपीयता अक्षांशीय प्रभाव को और बढ़ाती है।
भारत की जलवायु को नियंत्रित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक कारक हिमालय है। यह भारत को उत्तर में स्थित विशाल महाद्वीपीय भूभाग से अलग करता है और मानसूनी पवनों के लिए एक महत्वपूर्ण भौगोलिक अवरोध बनाता है।
भारत तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ है — पश्चिम में अरब सागर, दक्षिण में हिंद महासागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी; उत्तर में विशाल स्थलभाग है।
इससे मौसम के अनुसार भारत और आसपास के महासागरों के बीच तापमान तथा वायुदाब का अंतर उत्पन्न होता है, जो मानसूनी पवनों के मौसमी उलटफेर का आधार बनता है।
समुद्र के निकट क्षेत्रों में समुद्र का तापमान-संतुलन प्रभाव अधिक होता है — इसे समुद्री प्रभाव कहते हैं। समुद्र से दूर आंतरिक क्षेत्रों में यह प्रभाव घटता जाता है और महाद्वीपीयता बढ़ती है।
| तटीय क्षेत्र | आंतरिक क्षेत्र |
|---|---|
| तापमान की वार्षिक सीमा कम जलवायु अपेक्षाकृत सम आर्द्रता अधिक |
तापमान की वार्षिक सीमा अधिक ग्रीष्म अधिक गर्म शीत अपेक्षाकृत अधिक ठंडा दैनिक/वार्षिक तापांतर अधिक |
| उदाहरण: मुंबई, चेन्नई | उदाहरण: दिल्ली, राजस्थान |
जब नम पवन किसी पर्वत से टकराती है तो उसे ऊपर उठना पड़ता है — इसे पर्वतीय/भौगोलिक वर्षा कहते हैं।
उदाहरण — अरब सागर शाखा की नम मानसूनी पवनें पश्चिमी घाट से टकराती हैं। पश्चिमी ढाल पर अधिक वर्षा, घाट के पीछे का दक्कन वर्षाछाया क्षेत्र। इसी कारण पश्चिमी घाट के पश्चिमी भाग और उसके पूर्वी आंतरिक भागों में वर्षा में बड़ा अंतर मिलता है।
भारत में मौसम के साथ स्थल और समुद्र के तापमान में बदलाव से वायुदाब बदलता है।
ग्रीष्म में समुद्र से स्थल की ओर नम पवनें, शीत में स्थल से समुद्र की ओर अपेक्षाकृत शुष्क पवनें। इसी मौसमी पवन-परिवर्तन के कारण भारतीय जलवायु को मानसूनी जलवायु कहा जाता है।
शीतकालीन पश्चिमी विक्षोभ से उत्तर-पश्चिम भारत में शीतकालीन वर्षा तथा पश्चिमी हिमालय में हिमपात होता है। यह वर्षा रबी फसलों, विशेषकर गेहूँ, के लिए महत्वपूर्ण है।
ग्रीष्म ऋतु में तिब्बती पठार के तीव्र गर्म होने से दक्षिण एशियाई मानसून पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। इसे भारतीय मानसून की तापीय तथा गतिशील व्याख्या में महत्वपूर्ण घटक माना जाता है।
वह क्षेत्र जहाँ उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों का अभिसरण होता है। ग्रीष्म में सूर्य के उत्तरगामी गमन के साथ यह उत्तर की ओर खिसकती है। दक्षिण एशिया के ऊपर निम्न दाब एवं ITCZ की स्थिति मानसूनी परिसंचरण को समर्थन देती है।
हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी उष्णकटिबंधीय भागों के बीच समुद्री सतह तापमान के अंतर से संबंधित। पश्चिमी हिंद महासागर अपेक्षाकृत गर्म तथा पूर्वी भाग अपेक्षाकृत ठंडा होने की स्थिति में यह भारतीय मानसून को सहारा दे सकता है। IOD को ENSO के साथ पढ़ना चाहिए।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पूर्व की ओर बढ़ने वाला वायुमंडलीय संवहन तंत्र। यह सामान्यतः लगभग 30–60 दिनों के समय-पैमाने पर मानसूनी वर्षा को प्रभावित कर सकता है।
बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर दोनों में बन सकते हैं। बंगाल की खाड़ी में ऐतिहासिक रूप से अधिक। प्रभाव — अत्यधिक वर्षा, तेज हवाएँ, तटीय बाढ़, कृषि एवं अवसंरचना को नुकसान।
तटीय तापमान एवं आर्द्रता को प्रभावित करती हैं। भारतीय मानसून की मुख्य व्याख्या केवल समुद्री धाराओं से नहीं की जा सकती, लेकिन हिंद महासागर की धाराएँ मानसून प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण हैं।
| क्रम | कारक | मुख्य प्रभाव |
|---|---|---|
| 1 | अक्षांश | तापमान |
| 2 | हिमालय | ठंडी हवाएँ + मानसून अवरोध |
| 3 | स्थल-जल वितरण | तापीय विषमता |
| 4 | समुद्र से दूरी | महाद्वीपीयता |
| 5 | ऊँचाई | तापमान |
| 6 | स्थलाकृति | वर्षा वितरण |
| 7 | वायुदाब | पवन परिसंचरण |
| 8 | पवन परिसंचरण | मानसून |
| 9 | ITCZ | मानसूनी स्थानांतरण |
| 10 | जेट धाराएँ | मानसून |
| 11 | ENSO / IOD / MJO | मानसून की परिवर्तनशीलता |
भारत की जलवायु उष्णकटिबंधीय, उपोष्णकटिबंधीय, मानसूनी तथा अत्यधिक क्षेत्रीय विविधता वाली है।
तटीय क्षेत्रों में समुद्री प्रभाव के कारण तापमान का वार्षिक उतार-चढ़ाव सामान्यतः कम होता है, जबकि आंतरिक क्षेत्रों में महाद्वीपीयता अधिक होती है।
हिमालय ठंडी महाद्वीपीय हवाओं के प्रभाव को सीमित करने तथा मानसूनी परिसंचरण को प्रभावित करने वाला प्रमुख भौगोलिक अवरोध है।
जनवरी भारत की प्रमुख शीतकालीन अवस्था का प्रतिनिधि महीना है। सामान्यतः दक्षिण भारत अधिक गर्म, उत्तर भारत अधिक ठंडा।
राजस्थान, पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई भागों में शीतकालीन तापमान दक्षिणी तटीय भारत की तुलना में काफी कम हो सकता है।
जुलाई दक्षिण-पश्चिम मानसून का प्रमुख महीना है। मानसूनी बादल, वर्षा, समुद्री हवाएँ, उच्च आर्द्रता, वाष्पीकरण तथा मानसूनी परिसंचरण तापमान को नियंत्रित करते हैं।
वार्षिक तापांतर = सबसे गर्म महीने का औसत तापमान − सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान।
किसी स्थान पर वायुमंडल द्वारा सतह पर लगाया गया दबाव वायुदाब कहलाता है। यह मुख्यतः तापमान और ऊँचाई से प्रभावित होता है।
शीत ऋतु में उत्तर-पश्चिम भारत, उत्तर भारत तथा तिब्बती क्षेत्र में उच्च दाब की स्थितियाँ विकसित होती हैं। अपेक्षाकृत गर्म समुद्री क्षेत्र निम्न दाब की दिशा में होते हैं।
राजस्थान, शुष्क क्षेत्र, पंजाब-हरियाणा के कुछ भाग तथा उत्तर-पश्चिम भारत में तीव्र तापीय निम्न दाब विकसित होता है।
ग्रीष्मकाल में उत्तर भारत के ऊपर निम्न दाब की एक विस्तृत पट्टी विकसित होती है, जिसे मानसून द्रोणी कहा जाता है। यह उत्तर-पश्चिम भारत से गंगा के मैदान होते हुए बंगाल की खाड़ी तक विस्तारित होती है। इसकी स्थिति मौसम के साथ बदलती रहती है।
मानसून द्रोणी वर्षा प्रणाली, मानसूनी अवदाबों की दिशा तथा वर्षा के वितरण को प्रभावित करती है।
| आधार | जनवरी | जुलाई |
|---|---|---|
| प्रमुख ऋतु | शीत | मानसून |
| स्थलभाग | अपेक्षाकृत ठंडा | अत्यधिक गर्म/मानसून से प्रभावित |
| उत्तर-पश्चिम | उच्च दाब की प्रवृत्ति | तापीय निम्न दाब |
| पवन | स्थल से समुद्र | समुद्र से स्थल |
| नमी | सामान्यतः कम | अधिक |
| वर्षा | सीमित/क्षेत्रीय | व्यापक मानसूनी वर्षा |
पुरानी व्याख्या में गर्म स्थल → निम्न दाब → समुद्र से हवाएँ → मानसून को पर्याप्त माना जाता था। आधुनिक दृष्टिकोण में तिब्बती पठार, जेट धाराएँ, क्रॉस-इक्वेटोरियल प्रवाह तथा महासागरीय स्थितियों को भी शामिल करना आवश्यक है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) की पारंपरिक ऋतु-विभाजन प्रणाली के अनुसार भारत की जलवायु को चार प्रमुख ऋतुओं में समझा जाता है।
| ऋतु | अवधि |
|---|---|
| शीत ऋतु | दिसंबर – फरवरी |
| ग्रीष्म ऋतु | मार्च – मई |
| दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु | जून – सितंबर |
| मानसून की वापसी / उत्तर-पूर्व मानसून | अक्टूबर – नवंबर |
शीतकालीन वर्षा के स्रोत — पश्चिमी विक्षोभ से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के कुछ भाग, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वर्षा; हिमालय में हिमपात। यह उत्तर-पश्चिम भारत की रबी फसलों (गेहूँ) के लिए उपयोगी है।
उत्तर भारत में ग्रीष्म ऋतु की प्रसिद्ध स्थानीय जलवायु घटना। अत्यधिक गर्म एवं सामान्यतः शुष्क हवाएँ, मुख्यतः मई-जून में उत्तर-पश्चिमी और उत्तरी मैदानों में। प्रभाव — तापमान में तीव्र वृद्धि, मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव, जल की मांग में वृद्धि, कृषि एवं पशुधन पर तनाव।
पूर्वी भारत, विशेषकर पश्चिम बंगाल, असम तथा आसपास के पूर्वी क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु के दौरान गरज-चमक और तेज हवाओं वाले स्थानीय तूफान। प्रभाव — तेज हवाएँ, गरज-चमक, वर्षा, कभी-कभी ओलावृष्टि। कृषि — कुछ फसलों को लाभ, तीव्र तूफान से नुकसान भी।
दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में मानसून से पहले होने वाली स्थानीय वर्षा, विशेष रूप से केरल और कर्नाटक में। यह आमों के पकने में सहायक मानी जाती है।
दक्षिण भारत में, विशेषकर कर्नाटक के कॉफी उत्पादक क्षेत्रों में, मानसून-पूर्व वर्षा कॉफी के पौधों में पुष्पन के लिए महत्वपूर्ण होती है।
भारतीय जलवायु की सबसे महत्वपूर्ण ऋतु। भारत की वार्षिक वर्षा का बड़ा भाग इसी अवधि में प्राप्त होता है।
आगमन — सामान्यतः सबसे पहले केरल तट पर स्थापित होता है, फिर अन्य भागों की ओर। हर वर्ष बिलकुल एक ही तारीख को नहीं।
दो प्रमुख शाखाएँ —
सक्रिय मानसून — जब वर्षा गतिविधि मजबूत होती है। मानसून विराम — कुछ दिनों के लिए वर्षा गतिविधि में व्यापक कमी।
मानसूनी अवदाब — बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दाब तंत्र, जो पूर्व से पश्चिम/उत्तर-पश्चिम की ओर आगे बढ़ते हैं और आंतरिक भागों में वर्षा लाते हैं।
सितंबर के बाद सूर्य की स्थिति दक्षिण की ओर जाने लगती है, स्थलभाग धीरे-धीरे ठंडा होता है। मानसून की वापसी सामान्यतः उत्तर-पश्चिम भारत से प्रारंभ होकर दक्षिण-पूर्व की ओर आगे बढ़ती है।
अक्टूबर की गर्मी — तापमान अभी ऊँचा, आर्द्रता बनी रहती है, हवाएँ कमजोर, धूप एवं आर्द्रता का संयोजन असुविधाजनक मौसम उत्पन्न करता है।
उत्तर-पूर्व मानसून — स्थल से समुद्र की ओर चलने वाली हवाएँ बंगाल की खाड़ी से गुजरते समय नमी ग्रहण करती हैं। इससे तमिलनाडु एवं दक्षिण-पूर्वी तट को महत्वपूर्ण वर्षा प्राप्त होती है।
| विशेषता | शीत | ग्रीष्म | मानसून | वापसी मानसून |
|---|---|---|---|---|
| अवधि | दिस.-फर. | मार्च-मई | जून-सित. | अक्टू.-नव. |
| तापमान | कम | अधिक | वर्षा से नियंत्रित | पुनः ऊँचा/फिर घटता |
| प्रमुख दाब | उच्च दाब | तापीय निम्न | मानसूनी निम्न | संक्रमण |
| प्रमुख पवन | उत्तर-पूर्वी | परिवर्तनशील | दक्षिण-पश्चिमी | उत्तर-पूर्वी |
| वर्षा | सीमित/क्षेत्रीय | स्थानीय | मुख्य वर्षा | दक्षिण-पूर्व भारत |
| प्रमुख घटना | पश्चिमी विक्षोभ | लू/आँधी | सक्रिय/विराम | अक्टूबर की गर्मी/चक्रवात |
| घटना | क्षेत्र | समय |
|---|---|---|
| लू | उत्तर-पश्चिम/उत्तर भारत | ग्रीष्म |
| कालबैसाखी | बंगाल एवं पूर्वी भारत | ग्रीष्म/मानसून-पूर्व |
| आम्र वर्षा | दक्षिण भारत | मानसून-पूर्व |
| कॉफी पुष्प वर्षा | कर्नाटक | मानसून-पूर्व |
| पश्चिमी विक्षोभ | उत्तर-पश्चिम भारत एवं पश्चिमी हिमालय | शीत |
| अक्टूबर की गर्मी | मानसून वापसी क्षेत्र | अक्टूबर-नवंबर |
| उत्तर-पूर्व मानसून | दक्षिण-पूर्वी भारत, विशेषकर तमिलनाडु | अक्टूबर-दिसंबर |
भारतीय मानसून को समझना भूगोल का केंद्रीय भाग है। मानसून केवल मौसमी वर्षा का नाम नहीं है, बल्कि यह भूमि-समुद्र तापीय विषमता, वायुदाब वितरण, ITCZ का स्थानांतरण, पवनों का मौसमी परिवर्तन, तिब्बती पठार, जेट धाराओं, क्रॉस-इक्वेटोरियल प्रवाह तथा महासागरीय-वायुमंडलीय परिसंचरण की संयुक्त प्रणाली है।
मानसून शब्द का संबंध अरबी शब्द मौसिम से माना जाता है, जिसका अर्थ है — ऋतु या मौसम। भौगोलिक अर्थ में मानसून ऐसी मौसमी पवन-परिसंचरण है जिसमें वर्ष के विभिन्न समयों में पवनों की दिशा में उल्लेखनीय परिवर्तन होता है।
मानसून की मूल पहचान — मौसमी पवन-परिवर्तन, केवल वर्षा नहीं।
आधुनिक भूगोल में दोनों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है।
केवल "गर्म स्थल + निम्न दाब = मानसून" कहना आधुनिक दृष्टि से पर्याप्त नहीं है, क्योंकि भारतीय मानसून में पृथ्वी का घूर्णन, तिब्बती पठार, जेट धाराएँ, ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण, क्रॉस-इक्वेटोरियल प्रवाह तथा महासागरीय स्थितियाँ भी महत्वपूर्ण हैं।
वह क्षेत्र जहाँ उष्णकटिबंधीय व्यापारिक पवनों का अभिसरण होता है। यह स्थिर नहीं है। सूर्य के उत्तरगामी गमन के साथ गर्मियों में उत्तर की ओर खिसकता है। ग्रीष्म ऋतु में दक्षिण एशिया की ओर उत्तरवर्ती स्थानांतरण करती है। इसके साथ निम्न दाब और ITCZ का क्षेत्र भी उत्तर की ओर स्थानांतरित होता है।
भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर ग्रीष्म में व्यापक मानसून द्रोणी के रूप में दिखाई देती है। यह उत्तर-पश्चिम भारत, गंगा का मैदान, बंगाल की खाड़ी की दिशा में विस्तारित निम्न दाब पट्टी से जुड़ी होती है।
ग्रीष्म ऋतु में यह अत्यधिक गर्म होता है। इससे तिब्बती पठार का ऊष्मीकरण, ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण में परिवर्तन तथा दक्षिण एशियाई मानसून को अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं। इसे मानसून की आधुनिक गतिशील व्याख्या में महत्वपूर्ण घटक माना जाता है।
लेकिन तिब्बती पठार मानसून का अकेला कारण नहीं है।
दक्षिणी हिंद महासागर के उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में उच्च दाब की महत्वपूर्ण व्यवस्था, जिसे मास्करीन उच्च दाब कहा जाता है। यह दक्षिणी हिंद महासागर में क्रॉस-इक्वेटोरियल प्रवाह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जब दक्षिणी गोलार्ध की हवाएँ भूमध्यरेखा पार कर उत्तरी गोलार्ध में आती हैं, तो उनकी दिशा बदलती है। यही प्रक्रिया दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी पवनों के निर्माण में महत्वपूर्ण है।
अरब सागर क्षेत्र में एक शक्तिशाली निम्न-स्तरीय पवन प्रवाह विकसित होता है, जिसे सोमाली जेट या फाइंडलेटर जेट कहा जाता है। यह दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर से अरब सागर तथा भारतीय उपमहाद्वीप की ओर मजबूत निम्न-स्तरीय प्रवाह से संबंधित है। यह अरब सागर शाखा को नमी प्रदान करता है।
ग्रीष्म में उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट सामान्यतः हिमालय के उत्तर की ओर खिसकती है। इसके साथ भारतीय मानसून के विकास के लिए अनुकूल ऊपरी-वायुमंडलीय दशाएँ बनने लगती हैं।
भारतीय मानसून एक स्थिर पवन प्रणाली नहीं है। इसमें सक्रिय एवं विराम अवस्थाएँ होती हैं। इसे एक गतिशील वायुमंडलीय प्रणाली के रूप में समझना चाहिए।
परंतु प्रभाव = संभावना, निश्चित परिणाम नहीं।
सकारात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव कई परिस्थितियों में भारतीय मानसून को समर्थन दे सकता है, विशेषकर तब जब ENSO का प्रभाव प्रतिकूल हो। इसलिए ENSO + IOD को साथ पढ़ना अधिक वैज्ञानिक है।
मैडेन-जूलियन दोलन मानसून की अंतरा-मौसमी परिवर्तनशीलता को प्रभावित कर सकता है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत में एक समान दिशा से प्रवेश नहीं करता। भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक स्थिति, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की स्थिति तथा पर्वतीय अवरोधों के कारण इसका प्रवाह मुख्यतः दो प्रमुख शाखाओं में समझा जाता है।
मानसून के स्थापित होने के बाद हिंद महासागर से आने वाली नम दक्षिण-पश्चिमी पवनें भारत की ओर बढ़ती हैं। ये दो बिलकुल स्वतंत्र मानसून नहीं हैं, बल्कि एक ही व्यापक दक्षिण-पश्चिम मानसूनी परिसंचरण की प्रमुख शाखाएँ हैं।
प्रारंभिक मार्ग — अरब सागर → केरल तट → कर्नाटक/गोवा → महाराष्ट्र → गुजरात तथा पश्चिमी तट के अन्य भाग।
इस शाखा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है — पश्चिमी घाट से टकराव।
इसलिए पश्चिमी घाट के पवनाभिमुख भाग में भारी वर्षा होती है।
पश्चिमी घाट को पार करने के बाद हवा में नमी की मात्रा कम हो जाती है। इसलिए पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग में अपेक्षाकृत कम वर्षा वाले क्षेत्र मिलते हैं।
अरब सागर शाखा केवल पश्चिमी तट तक सीमित नहीं रहती। इसकी विभिन्न धाराएँ भारत के आंतरिक भागों की ओर बढ़ती हैं। एक व्यापक क्रम — केरल → पश्चिमी तट → पश्चिमी/मध्य भारत → उत्तर-पश्चिम भारत।
राजस्थान की जलवायु समझने में अरावली महत्वपूर्ण है। अरावली की सामान्य दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व है। दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनों की सामान्य दिशा से इसका अभिविन्यास ऐसा है कि यह पश्चिमी घाट की तरह एक निरंतर ऊँचा अवरोध बनाकर व्यापक पर्वतीय वर्षा उत्पन्न नहीं करती। इसी कारण राजस्थान के बड़े भाग में मानसूनी वर्षा सीमित रहती है।
बंगाल की खाड़ी से आने वाली नम हवाएँ पूर्वोत्तर भारत में पहुँचती हैं। मेघालय की पहाड़ियों के सामने आरोहण होता है।
इस क्षेत्र की भारी वर्षा को समझने में स्थलाकृति + मानसूनी नमी का संयुक्त प्रभाव महत्वपूर्ण है।
पूर्वोत्तर भारत में प्रवेश के बाद बंगाल की खाड़ी शाखा का एक प्रमुख प्रवाह गंगा के मैदान के साथ पश्चिम/उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ता है।
मार्ग — बंगाल की खाड़ी → पश्चिम बंगाल → बिहार → उत्तर प्रदेश → उत्तर-पश्चिम भारत।
वर्षा की मात्रा सामान्यतः पश्चिम की ओर घटने की प्रवृत्ति रखती है, क्योंकि मानसूनी पवनों की नमी क्रमशः कम होती जाती है।
| आधार | अरब सागर शाखा | बंगाल की खाड़ी शाखा |
|---|---|---|
| प्रमुख स्रोत | अरब सागर | बंगाल की खाड़ी |
| प्रारंभिक प्रभाव | पश्चिमी तट | पूर्वोत्तर एवं पूर्वी भारत |
| प्रमुख पर्वतीय प्रभाव | पश्चिमी घाट | मेघालय/पूर्वोत्तर की पहाड़ियाँ |
| प्रमुख वर्षा क्षेत्र | पश्चिमी तट | पूर्वोत्तर, गंगा मैदान |
| प्रमुख वर्षाछाया | दक्कन का आंतरिक भाग | क्षेत्रीय स्थलाकृति पर निर्भर |
| आगे की दिशा | मध्य/उत्तर-पश्चिम भारत | गंगा मैदान से पश्चिम/उत्तर-पश्चिम |
| राजस्थान पर प्रभाव | महत्वपूर्ण | उत्तर-पश्चिमी मानसूनी वर्षा में योगदान |
यह नहीं मानना चाहिए कि दोनों शाखाएँ भारत में पूरी तरह अलग-अलग चलती हैं। मानसून एक समेकित परिसंचरण प्रणाली है। दोनों शाखाएँ एक-दूसरे के पूरक हैं, मानसून द्रोणी से प्रभावित होती हैं, स्थलाकृति से प्रभावित होती हैं तथा मानसूनी अवदाबों के मार्ग से प्रभावित होती हैं।
इन तीनों का संयुक्त परिणाम वर्षा का वितरण बनाता है।
सामान्यतः नम मानसूनी पवन जब लंबी दूरी तक स्थल पर चलती है तो उसका जलवाष्प भंडार घटता जाता है। इसलिए नमी के स्रोत से दूरी बढ़ने पर वर्षा घटने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। लेकिन इसे पूर्ण नियम नहीं मानना चाहिए, क्योंकि स्थलाकृति तथा स्थानीय कारक इसे बदल सकते हैं।
राजस्थान में मानसूनी वर्षा अत्यधिक असमान है।
यह केवल मानसून शाखा का परिणाम नहीं, बल्कि अरावली, मरुस्थलीय परिस्थितियों, नमी के क्रमिक क्षय और स्थानीय कारकों की संयुक्त अभिव्यक्ति है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून का भारत में आगमन एक क्रमिक प्रक्रिया है। मानसून एक साथ पूरे देश में नहीं पहुँचता। इसी प्रकार मानसून की वापसी भी पूरे भारत से एक साथ नहीं होती, बल्कि सामान्यतः उत्तर-पश्चिम भारत से प्रारंभ होकर दक्षिण-पूर्व की ओर आगे बढ़ती है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून के भारत में प्रवेश करने के बाद उसका क्रमशः विभिन्न क्षेत्रों तक फैलना मानसून की प्रगति कहलाता है। इसे तीन प्रक्रियाओं से समझें — आगमन, प्रगति, देशव्यापी स्थापना।
दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्यतः सबसे पहले केरल तट पर स्थापित होता है। केरल में मानसून का सामान्य आगमन लगभग 1 जून के आसपास माना जाता है। लेकिन यह औसत सामान्य तिथि है, निश्चित वार्षिक तारीख नहीं।
केरल में स्थापित होने के बाद मानसून सामान्यतः कर्नाटक, तमिलनाडु के कुछ भाग, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य भारत, राजस्थान, पंजाब एवं हरियाणा आदि क्षेत्रों की ओर आगे बढ़ता है। लेकिन यह हर वर्ष बिलकुल समान नहीं होता।
बंगाल की खाड़ी शाखा के कारण पूर्वोत्तर भारत मानसून के प्रारंभिक प्रभाव वाले क्षेत्रों में आता है — असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश।
मानसून की बंगाल शाखा गंगा के मैदान के साथ आगे बढ़ती है — बंगाल → बिहार → उत्तर प्रदेश → उत्तर-पश्चिम भारत।
राजस्थान में मानसून का आगमन राज्य के सभी भागों में एक साथ नहीं होता। सामान्यतः दक्षिण-पूर्वी/पूर्वी राजस्थान से पश्चिमी राजस्थान की ओर मानसूनी प्रभाव बढ़ता है। राजस्थान में मानसून की प्रगति को केवल एक सीधी रेखा के रूप में नहीं समझना चाहिए।
जून के दौरान मानसून देश के विभिन्न भागों में फैलता है और सामान्यतः जुलाई के आरंभ तक भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से पर स्थापित हो जाता है। लेकिन पूर्ण मानसूनी स्थापना की तारीख हर वर्ष समान नहीं होती।
मानसून के दौरान स्थिति स्थिर नहीं रहती। इसमें सक्रिय चरण → विराम → पुनः सक्रिय चरण हो सकता है। इसलिए किसी क्षेत्र में मानसून आने के बाद भी कुछ दिनों की कम वर्षा संभव है।
सितंबर के बाद सूर्य की स्थिति दक्षिण की ओर जाने लगती है। भारतीय स्थलभाग धीरे-धीरे ठंडा होने लगता है। परिणाम — तापीय निम्न दाब कमजोर → मानसूनी परिसंचरण कमजोर → मानसून की वापसी प्रारंभ।
सामान्यतः उत्तर-पश्चिम भारत से दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी प्रारंभ होती है।
व्यापक रूप में — राजस्थान/उत्तर-पश्चिम भारत → पंजाब-हरियाणा एवं आसपास → उत्तर एवं मध्य भारत → गंगा का मैदान → पूर्वी एवं दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्र। लेकिन वास्तविक रेखा वर्ष-दर-वर्ष बदल सकती है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून के पीछे हटने के साथ भारतीय स्थलभाग पर उत्तर-पूर्वी पवनों का प्रभाव बढ़ता है। ये पवनें सामान्यतः स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। लेकिन बंगाल की खाड़ी पार करने पर इनमें नमी आ सकती है।
यह भारतीय मानसून प्रणाली का महत्वपूर्ण अपवाद है। उत्तर-पूर्वी पवनें भारत के स्थलभाग से बंगाल की खाड़ी की ओर जाती हैं। बंगाल की खाड़ी से नमी ग्रहण करने के बाद ये दक्षिण-पूर्वी भारत की ओर लौटती हैं। इससे तमिलनाडु तथा दक्षिण-पूर्वी तट में महत्वपूर्ण वर्षा होती है। इसे उत्तर-पूर्व मानसून से जोड़ा जाता है।
अक्टूबर-नवंबर में बंगाल की खाड़ी में चक्रवात विकसित हो सकते हैं। इसलिए मानसून वापसी की अवधि में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल के तटीय क्षेत्रों में चक्रवाती वर्षा महत्वपूर्ण हो सकती है।
| आधार | आगमन | वापसी |
|---|---|---|
| मुख्य अवधि | मई-अंत/जून | सितंबर से |
| प्रारंभिक क्षेत्र | केरल | उत्तर-पश्चिम भारत |
| पवन | दक्षिण-पश्चिमी | उत्तर-पूर्वी |
| नमी | समुद्र से भारत | भारत से समुद्र, फिर बंगाल की खाड़ी से नमी |
| मुख्य वर्षा | दक्षिण-पश्चिम मानसून | दक्षिण-पूर्वी भारत में उत्तर-पूर्व मानसून |
| महत्वपूर्ण घटना | मानसून का प्रस्फोट | अक्टूबर की गर्मी |
मानसून की समय पर प्रगति और पर्याप्त वर्षा खरीफ कृषि, जलाशय, सिंचाई, भूजल, जलविद्युत, पशुपालन तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। विशेषकर वर्षा-आधारित कृषि क्षेत्रों में मानसून की मात्रा + समय + वितरण — तीनों महत्वपूर्ण हैं।
भारत में वर्षा का स्वरूप केवल मानसून से निर्धारित नहीं होता, बल्कि वायु के ऊपर उठने की प्रक्रिया, स्थलाकृति, चक्रवाती गतिविधि, वायुदाब तथा मौसमी पवनों के संयुक्त प्रभाव से अलग-अलग प्रकार की वर्षा होती है। भारत में वर्षा को मुख्यतः तीन प्रक्रियाओं के आधार पर समझना उपयोगी है —
जब पृथ्वी की सतह तीव्रता से गर्म होती है, तो उसके संपर्क में आने वाली नम हवा गर्म होकर हल्की हो जाती है और ऊपर उठती है। ऊँचाई बढ़ने पर उसका तापमान घटता है, जिससे संघनन होता है और वर्षा हो सकती है।
आवश्यक परिस्थितियाँ —
भारत में — पूर्वी भारत, उत्तर-पूर्वी भारत, गंगा के मैदानी क्षेत्रों के कुछ हिस्से, गर्म एवं नम परिस्थितियों वाले अन्य क्षेत्र। विशेषकर दोपहर के बाद तीव्र गर्मी से उत्पन्न ऊर्ध्वाधर संवहन स्थानीय गरजन-तूफान और वर्षा को जन्म दे सकता है।
स्थानीय तूफानों से संबंध — कालबैसाखी, आम्र वर्षा, कॉफी पुष्प वर्षा।
जब नम हवा किसी पर्वत या ऊँचे भू-भाग से टकराकर ऊपर उठने के लिए बाध्य होती है, तब उसके ऊपर उठने से शीतलन और संघनन होता है तथा वर्षा होती है।
इसी कारण पवनविमुख क्षेत्र में वर्षाछाया विकसित हो सकती है।
पश्चिमी घाट — अरब सागर से आने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाएँ पश्चिमी घाट से टकराती हैं।
इसी कारण पश्चिमी तटीय क्षेत्र अधिक वर्षा प्राप्त करता है, जबकि पश्चिमी घाट के पूर्व में स्थित दक्कन का पठार अपेक्षाकृत कम वर्षा प्राप्त करता है।
मेघालय — बंगाल की खाड़ी शाखा की नम हवाएँ उत्तर-पूर्वी भारत में पहुँचकर पर्वतीय भू-आकृति से प्रभावित होती हैं। मेघालय के खासी, जयंतिया तथा गारो पर्वतीय क्षेत्र वर्षा को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
राजस्थान में अरावली पर्वतमाला का अभिविन्यास मानसून के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अरावली की सामान्य दिशा लगभग दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व है। दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं की दिशा भी दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर होती है। इसलिए अरावली पर्वतमाला मानसूनी हवाओं के लिए पश्चिमी घाट जैसी प्रभावी लंबवत बाधा नहीं बनती। फलतः राजस्थान में अरावली के कारण व्यापक स्तर पर पश्चिमी घाट जैसा अत्यधिक पर्वतीय वर्षा प्रभाव उत्पन्न नहीं होता।
जब निम्न दाब की ओर वायु का अभिसरण होता है और वायु ऊपर उठती है, तो उससे संबंधित वर्षा को व्यापक अर्थ में चक्रवाती वर्षा कहा जा सकता है।
पश्चिमी विक्षोभ सामान्यतः मध्य अक्षांशों की पश्चिमी पवन पट्टी से जुड़े बहिरुष्णकटिबंधीय चक्रवाती तंत्र हैं। भारत में इनके कारण जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के कुछ भाग, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शीतकालीन वर्षा हो सकती है। हिमालय में यही प्रणाली हिमपात के लिए भी महत्वपूर्ण है।
| आधार | पश्चिमी विक्षोभ | उष्णकटिबंधीय चक्रवात |
|---|---|---|
| प्रकृति | बहिरुष्णकटिबंधीय तंत्र | उष्णकटिबंधीय चक्रवाती तंत्र |
| मुख्य क्षेत्र | पश्चिमी/मध्य एशिया से भारत की ओर | उष्णकटिबंधीय महासागर |
| भारत में प्रभाव | मुख्यतः शीतकाल | मुख्यतः ग्रीष्म/पोस्ट मानसून तथा अन्य मौसमी स्थितियाँ |
| प्रमुख प्रभाव | उत्तर-पश्चिमी भारत में वर्षा, हिमपात | तेज हवाएँ, भारी वर्षा, तूफानी ज्वार |
| स्रोत क्षेत्र | भूमध्यसागरीय-पश्चिम एशियाई क्षेत्र से जुड़े तंत्र | गर्म समुद्री जल |
| आधार | संवहनीय | पर्वतीय/भौगोलिक | चक्रवाती |
|---|---|---|---|
| मुख्य कारण | सतह का गर्म होना | पर्वत द्वारा हवा का आरोहण | निम्न दाब/अभिसरण |
| हवा का उठना | संवहन से | स्थलाकृति से | चक्रवाती अभिसरण से |
| प्रमुख क्षेत्र | गर्म एवं नम क्षेत्र | पर्वतीय क्षेत्र | चक्रवाती प्रणालियों के मार्ग |
| भारत में उदाहरण | कालबैसाखी, आम्र वर्षा | पश्चिमी घाट, मेघालय | पश्चिमी विक्षोभ, चक्रवात |
| वर्षा का स्वरूप | अक्सर तीव्र एवं स्थानीय | पर्वत के अनुसार स्थानिक | प्रणाली के आकार के अनुसार विस्तृत |
| प्रमुख मौसम | ग्रीष्म/मानसून-पूर्व | मानसून में प्रमुख | प्रणाली पर निर्भर |
भारत में वर्षा का वितरण अत्यंत असमान है। इसका कारण केवल मानसूनी पवनों की दिशा नहीं, बल्कि समुद्र से दूरी, पर्वतीय अवरोध, पवनों की दिशा, स्थलाकृति, वर्षाछाया, मानसून की शाखाएँ तथा स्थानीय निम्न दाब/चक्रवाती प्रणालियाँ हैं।
पूर्व और उत्तर-पूर्व में अधिक वर्षा से पश्चिम और उत्तर-पश्चिम में घटती वर्षा की ओर। विशेषकर गंगा के मैदान में बंगाल की खाड़ी शाखा पश्चिम की ओर बढ़ते हुए क्रमशः नमी खोती जाती है।
इसलिए सामान्यतः पूर्वी गंगा मैदान, पश्चिमी गंगा मैदान की तुलना में अधिक आर्द्र होता है।
इसलिए पश्चिमी तटीय पट्टी भारत के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में शामिल है।
इस क्षेत्र को वर्षाछाया क्षेत्र कहा जाता है।
इस प्रकार हिमालय मानसून + वर्षा + तापमान — तीनों की भारतीय जलवायु में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
दक्षिण-पूर्वी/दक्षिणी राजस्थान अधिक वर्षा की ओर; पश्चिमी/उत्तर-पश्चिमी राजस्थान कम वर्षा प्राप्त करता है।
कारण —
अरावली पर्वतमाला की सामान्य दिशा — दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व। दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं की प्रमुख दिशा भी व्यापक रूप से दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व होती है। इसलिए अरावली हवाओं के मार्ग में पश्चिमी घाट जैसी लगभग लंबवत दीवार नहीं बनाती। परिणाम — अरब सागर शाखा से आने वाली हवाओं को अरावली द्वारा बड़े पैमाने पर ऊपर उठाने की क्षमता सीमित रहती है। यह राजस्थान के पश्चिमी भाग की शुष्कता समझने में महत्वपूर्ण है।
गंगा मैदान में वर्षा सामान्यतः पूर्व से पश्चिम दिशा में घटती है। क्योंकि बंगाल की खाड़ी शाखा की मानसूनी हवाएँ पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ती हैं और मार्ग में क्रमशः वर्षा करती हुई अपनी नमी खोती जाती हैं।
समुद्र से दूरी बढ़ने पर सामान्यतः महाद्वीपीयता बढ़ती है, लेकिन केवल समुद्र से दूरी के आधार पर भारत में वर्षा की मात्रा निर्धारित नहीं की जा सकती।
भारत की वर्षा का एक महत्वपूर्ण गुण अंतर-वार्षिक परिवर्तनशीलता है। अर्थात एक ही स्थान पर अलग-अलग वर्षों में वर्षा की मात्रा काफी बदल सकती है। इसके कारणों में हिंद महासागर द्विध्रुव, मानसून की सक्रियता एवं विराम, मानसूनी अवदाब, चक्रवात, समुद्री सतह तापमान तथा जेट धाराओं में परिवर्तन महत्वपूर्ण हैं।
केवल कुल वार्षिक वर्षा पर्याप्त नहीं है। किसी क्षेत्र की कृषि और जल संसाधनों के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि वर्षा कब हुई। यदि कुल वार्षिक वर्षा पर्याप्त हो, लेकिन लंबा मानसूनी विराम हो या वर्षा का असमान वितरण हो, तो फसल पर जल तनाव उत्पन्न कर सकता है। इसलिए परीक्षा में "वर्षा की मात्रा" और "वर्षा की विश्वसनीयता/समयगत वितरण" को अलग-अलग अवधारणाओं के रूप में लिखना अधिक प्रभावी है।
| पट्टी | क्षेत्र |
|---|---|
| पट्टी 1 — अत्यधिक वर्षा | पश्चिमी तट + उत्तर-पूर्व भारत |
| पट्टी 2 — मध्यम से अधिक | पूर्वी एवं मध्य भारत + गंगा मैदान के पूर्वी भाग |
| पट्टी 3 — मध्यम से कम | दक्कन का आंतरिक भाग + गंगा मैदान के पश्चिमी भाग के कई क्षेत्र |
| पट्टी 4 — अत्यल्प | पश्चिमी राजस्थान + लद्दाख के शुष्क क्षेत्र |
भारत में जलवायु की क्षेत्रीय विविधता अत्यधिक है। अक्षांश, ऊँचाई, समुद्र से दूरी, स्थलाकृति, हिमालय, मानसूनी पवनों तथा वर्षा के वितरण के कारण भारत में अलग-अलग जलवायु प्रदेश पाए जाते हैं।
किसी बड़े क्षेत्र में यदि तापमान की प्रवृत्ति, वर्षा की मात्रा एवं ऋतु, आर्द्रता, मौसमी परिवर्तन में पर्याप्त समानता हो, तो उस क्षेत्र को एक जलवायु प्रदेश के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
भारत के संदर्भ में व्लादिमीर कोपेन का वर्गीकरण अत्यंत प्रसिद्ध है। इसमें जलवायु का वर्गीकरण मुख्यतः तापमान + वर्षा + वनस्पति के साथ उनके संबंध पर आधारित है। कोपेन ने बड़े अक्षरों से प्रमुख जलवायु समूहों को दर्शाया।
| समूह | जलवायु |
|---|---|
| A | उष्णकटिबंधीय आर्द्र |
| B | शुष्क |
| C | उष्ण/समशीतोष्ण वर्षा वाली |
| D | शीत/महाद्वीपीय |
| E | ध्रुवीय |
भारत मुख्यतः A, B, C और H समूहों में आता है, जबकि ऊँचे हिमालय में E प्रकार की परिस्थितियाँ भी मिल सकती हैं।
यह अध्ययन हेतु व्यापक क्रम है, कोई एकमात्र आधिकारिक सामान्य प्रशासनिक जलवायु-वर्गीकरण नहीं।
प्रमुख क्षेत्र — उत्तर-पूर्व भारत, पश्चिमी तटीय पर्वतीय क्षेत्र के अत्यधिक वर्षा वाले भाग।
विशेषताएँ — अधिक वर्षा, उच्च आर्द्रता, घने वन, मानसून की मजबूत भूमिका, कई क्षेत्रों में वर्षा का लंबा मौसम।
कारण — नम मानसूनी पवन + पर्वतीय आरोहण + समुद्र से नमी + संवहनीय गतिविधि।
पूर्वी भारत, गंगा मैदान के पूर्वी भाग, पश्चिमी तट के अनेक क्षेत्र। पर्याप्त वर्षा, लेकिन अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों की तुलना में कुछ कम।
मध्य भारत और गंगा मैदान के अनेक क्षेत्रों में ऐसी परिस्थितियाँ मिल सकती हैं जहाँ वर्षा पर्याप्त है, लेकिन शुष्क अवधि भी स्पष्ट रहती है। विशेषताएँ — मानसून पर उच्च निर्भरता, वर्षा का मौसमी संकेंद्रण, गर्म ग्रीष्म, अपेक्षाकृत शुष्क शीतकाल।
प्रमुख क्षेत्र — दक्कन के आंतरिक भाग, गुजरात के कुछ भाग, राजस्थान के पूर्वी एवं मध्य भागों के कुछ क्षेत्र, वर्षाछाया क्षेत्र।
विशेषताएँ — वर्षा कम एवं अनिश्चित, वाष्पीकरण की अपेक्षाकृत अधिक दर, सूखे की संभावना, सिंचाई का कृषि में महत्वपूर्ण योगदान।
भारत में प्रमुख क्षेत्र — पश्चिमी राजस्थान।
विशेषताएँ — अत्यल्प वर्षा, वर्षा की उच्च अनिश्चितता, उच्च तापीय चरम, उच्च दैनिक तापांतर, प्राकृतिक वनस्पति का विरल होना, वाष्पीकरण की उच्च क्षमता।
हिमालय तथा अन्य ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु मुख्यतः ऊँचाई से नियंत्रित होती है। ऊँचाई बढ़ने पर सामान्यतः तापमान घटता है, हिमपात की संभावना बढ़ती है, वनस्पति में ऊँचाई के साथ परिवर्तन दिखाई देता है।
ऊर्ध्वाधर क्रम — उपोष्णकटिबंधीय → समशीतोष्ण → उप-अल्पाइन → अल्पाइन → हिम एवं शैल प्रदेश।
तटीय क्षेत्रों में समुद्र का प्रभाव महत्वपूर्ण होता है। समुद्र की उच्च ऊष्मा धारिता के कारण तटीय क्षेत्रों में तापमान का वार्षिक एवं दैनिक उतार-चढ़ाव सामान्यतः आंतरिक क्षेत्रों की तुलना में कम होता है।
| आधार | पश्चिमी तट | आंतरिक दक्कन |
|---|---|---|
| समुद्री प्रभाव | अधिक | कम |
| आर्द्रता | अधिक | अपेक्षाकृत कम |
| मानसूनी वर्षा | अधिक | वर्षाछाया के कारण कम |
| तापीय उतार-चढ़ाव | कम | अधिक |
| पश्चिमी घाट का प्रभाव | प्रत्यक्ष | वर्षाछाया प्रभाव |
दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में अक्षांशीय स्थिति तथा समुद्री प्रभाव के कारण वर्षभर तापमान अपेक्षाकृत ऊँचा रहता है। लेकिन वर्षा का वितरण अत्यंत विविध है — पश्चिमी तट दक्षिण-पश्चिम मानसून से, जबकि तमिलनाडु का पूर्वी तट उत्तर-पूर्व मानसून से विशेष रूप से प्रभावित होता है।
भारत की जलवायु की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक मानसून की परिवर्तनशीलता है। मानसून हर वर्ष समान समय, समान तीव्रता और समान स्थानिक वितरण के साथ सक्रिय नहीं रहता।
मानसून की सामान्य स्थिति से वर्ष-दर-वर्ष या एक ही मानसूनी ऋतु के भीतर होने वाले परिवर्तन को मानसून की परिवर्तनशीलता कहते हैं।
ENSO प्रशांत महासागर तथा वायुमंडलीय परिसंचरण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण महासागरीय-वायुमंडलीय घटना है। इसके दो प्रमुख चरण हैं — एल नीनो और ला नीना।
पश्चिमी और पूर्वी हिंद महासागर के समुद्री सतह तापमान के बीच असमान अंतर से संबंधित घटना।
मान लें — एल नीनो मानसून के लिए नकारात्मक प्रभाव, लेकिन साथ में सकारात्मक IOD मानसून को समर्थन देता है, तो एल नीनो का प्रभाव कुछ हद तक कमजोर हो सकता है। इसलिए भारतीय मानसून को समझने के लिए किसी एक महासागरीय सूचकांक पर निर्भर करना उचित नहीं है।
मैडेन-जूलियन दोलन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पूर्व की ओर बढ़ने वाली वायुमंडलीय संवहन एवं वर्षा की प्रमुख अंतरा-मौसमी प्रणाली है। इसका समयमान सामान्यतः कुछ सप्ताह से लगभग 30–60 दिन के स्तर पर महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि हिंद महासागर क्षेत्र में अनुकूल स्थिति बनाती है, तो संवहन, मानसूनी गतिविधि तथा वर्षा में वृद्धि हो सकती है।
जब मानसून सामान्य से अधिक सक्रिय रहता है और कई क्षेत्रों में अच्छी वर्षा होती है, तो उसे सक्रिय मानसून कहा जाता है। इसमें मानसून ट्रफ की अनुकूल स्थिति, पर्याप्त नमी, संवहनीय गतिविधि तथा मानसूनी अवदाब/निम्न दाब प्रणालियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
जब मानसून ऋतु में कुछ दिनों तक वर्षा की गतिविधि काफी कमजोर हो जाती है, तो इसे मानसून विराम कहा जाता है।
यदि विराम लंबा हो जाए तो वर्षा में कमी, मिट्टी की नमी में कमी, फसल पर जल तनाव, सिंचाई की मांग बढ़ सकती है। लेकिन यदि विराम के बीच भारी वर्षा होती है, तो कुल मौसमी वर्षा सामान्य रह सकती है। इसलिए केवल कुल वर्षा नहीं, बल्कि वर्षा का समयगत वितरण भी कृषि के लिए महत्वपूर्ण है।
बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में बनने वाले निम्न दाब एवं मानसूनी अवदाब भारत में वर्षा वितरण के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनकी सामान्य गति — बंगाल की खाड़ी → पूर्वी भारत → मध्य भारत → उत्तर-पश्चिम/पश्चिम की ओर। इनकी संख्या, मार्ग और तीव्रता में परिवर्तन मानसून की वर्षा को प्रभावित करता है।
| कथन | स्थिति |
|---|---|
| एल नीनो भारतीय मानसून को प्रभावित कर सकता है। | सही |
| हर एल नीनो वर्ष में भारत में सूखा पड़ता है। | गलत |
| ला नीना सामान्यतः भारतीय मानसून के लिए अनुकूल हो सकती है। | सामान्यतः सही |
| सकारात्मक IOD भारतीय मानसून को कुछ परिस्थितियों में समर्थन दे सकता है। | सही |
| MJO मुख्यतः दशकीय परिवर्तनशीलता की घटना है। | गलत |
| मानसून विराम का अर्थ मानसून की वापसी है। | गलत |
| मानसून की कुल वर्षा सामान्य होने पर भी बाढ़ संभव है। | सही |
मानसून की परिवर्तनशीलता का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम वर्षा की अनिश्चितता है। भारत में समस्या केवल यह नहीं है कि किसी वर्ष कुल वर्षा कम या अधिक हुई, बल्कि यह भी है कि वर्षा कब, कहाँ, कितनी तीव्रता से और कितने अंतराल पर हुई। इसी कारण एक ही वर्ष में कुछ क्षेत्रों में सूखा और अन्य क्षेत्रों में बाढ़ जैसी विपरीत स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
जब मानसून के आगमन, वापसी, वर्षा की मात्रा, समय, तीव्रता तथा स्थानिक वितरण में सामान्य स्थिति से पर्याप्त विचलन होता है, तो इसे मानसूनी अनिश्चितता के व्यापक संदर्भ में समझा जाता है।
मान लें किसी क्षेत्र में पूरे मानसून में कुल वर्षा सामान्य रही। फिर भी दो स्थितियाँ संभव हैं —
दोनों की कुल वर्षा समान हो सकती है, लेकिन कृषि, जल संचयन और बाढ़ का प्रभाव बिलकुल अलग होगा।
जब किसी क्षेत्र में मानसूनी अवधि के दौरान सामान्य अपेक्षा से पर्याप्त कम वर्षा होती है और उसका जल, कृषि तथा पारिस्थितिकी पर प्रभाव पड़ता है, तो मानसूनी सूखे की स्थिति बन सकती है।
विशेष रूप से — पश्चिमी राजस्थान, गुजरात के कुछ भाग, दक्कन का आंतरिक पठार, वर्षाछाया क्षेत्र, वर्षा-आश्रित कृषि वाले क्षेत्र।
इसलिए राजस्थान में जल संरक्षण + सूखा-रोधी कृषि + सिंचाई दक्षता विशेष महत्व रखते हैं।
जब किसी क्षेत्र में उपलब्ध जल निकासी क्षमता से अधिक हो जाता है और पानी भूमि पर फैल जाता है, तो बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। मानसून भारत में बाढ़ का सबसे महत्वपूर्ण मौसमी कारण है। लेकिन बाढ़ केवल अधिक वर्षा से नहीं होती।
प्राकृतिक कारण —
मानवजनित कारण —
गंगा का मैदान, ब्रह्मपुत्र घाटी, पूर्वी भारत, डेल्टाई क्षेत्र, तटीय क्षेत्र।
ब्रह्मपुत्र घाटी — भारी मानसूनी वर्षा + तीव्र प्रवाह + नदी का ब्रेडेड स्वरूप + तट कटाव बाढ़ की समस्या को बढ़ा सकते हैं।
विशेषकर कोसी, गंडक, घाघरा और गंगा तंत्र बाढ़ की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
कोसी नदी को लंबे समय से "बिहार का शोक" कहा जाता है। मुख्य कारक — हिमालयी ढाल से भारी अवसाद, मैदान में ढाल का तीव्र कम होना, अवसाद का निक्षेपण, नदी चैनल की अस्थिरता/स्थानांतरण, बाढ़ का जोखिम।
अचानक बहुत कम समय में अत्यधिक वर्षा होने पर तेजी से जलप्लावन उत्पन्न हो सकता है। पर्वतीय क्षेत्रों में तीव्र वर्षा + तीव्र ढाल + संकीर्ण घाटियाँ अचानक बाढ़ के जोखिम को बढ़ा सकती हैं। इसे आकस्मिक बाढ़ कहा जाता है।
मान लें — जून में मानसून कमजोर रहा, जुलाई में लंबा विराम रहा, अगस्त में कुछ दिनों में अत्यधिक वर्षा हुई। तो जून-जुलाई में कृषि जल तनाव और अगस्त में अचानक बाढ़ — दोनों एक ही मानसूनी मौसम में संभव हैं।
लंबे मानसून विराम के दौरान वर्षा रुकना, मिट्टी की नमी कम होना, फसल में जल तनाव हो सकता है। विशेषकर वर्षा-आश्रित क्षेत्रों में इसका प्रभाव अधिक होता है।
वर्षा की तीव्रता बढ़ने पर अधिक जल थोड़े समय में गिरता है। इससे सतही अपवाह बढ़ता है, मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है, शहरी जलभराव बढ़ता है, नदी में अचानक प्रवाह बढ़ सकता है, बाढ़ का जोखिम बढ़ता है।
| सूखा प्रबंधन | बाढ़ प्रबंधन |
|---|---|
|
वर्षा जल संचयन जलग्रहण क्षेत्र विकास सूखा-सहिष्णु फसलें सूक्ष्म सिंचाई भूजल पुनर्भरण फसल विविधीकरण जल उपयोग दक्षता |
बाढ़ पूर्वानुमान नदी क्षेत्र का वैज्ञानिक प्रबंधन आर्द्रभूमि संरक्षण प्राकृतिक जल निकासी की रक्षा शहरी जल निकासी सुधार बाढ़ मैदान का नियमन स्थानीय आपदा तैयारी |
| संरचनात्मक | गैर-संरचनात्मक |
|---|---|
|
बाँध तटबंध जलाशय जल निकासी प्रणाली चेक डैम जल संचयन संरचनाएँ |
पूर्व चेतावनी प्रणाली भूमि उपयोग नियोजन बाढ़ जोखिम मानचित्रण आपदा तैयारी सामुदायिक जागरूकता मौसम पूर्वानुमान |
जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न में परिवर्तन, अत्यधिक वर्षा की घटनाओं तथा तापमान वृद्धि जैसी प्रवृत्तियाँ जल प्रबंधन को अधिक चुनौतीपूर्ण बना सकती हैं। लेकिन किसी एक बाढ़ या सूखे की घटना को केवल जलवायु परिवर्तन के कारण बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
| कथन | स्थिति |
|---|---|
| मानसून में सामान्य कुल वर्षा होने पर सूखा संभव नहीं। | गलत |
| कम वर्षा वाले कृषि क्षेत्र में ही बाढ़ होती है। | गलत |
| शहरीकरण सतही अपवाह बढ़ा सकता है। | सही |
| बाढ़ का एकमात्र कारण अत्यधिक वर्षा है। | गलत |
| मानसून विराम कृषि को प्रभावित कर सकता है। | सही |
| मौसमीय सूखा और जलवैज्ञानिक सूखा समान है। | गलत |
| अत्यधिक वर्षा की अल्पकालिक घटना भी बाढ़ पैदा कर सकती है। | सही |
भारत की कृषि, जल उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मानसून का गहरा प्रभाव है। भारत में वर्षा का अधिकांश भाग सीमित मानसूनी अवधि में प्राप्त होने के कारण मानसून की मात्रा, समय, वितरण और परिवर्तनशीलता कृषि तथा जल संसाधनों की स्थिति निर्धारित करती है।
खरीफ फसलें मुख्यतः मानसून के आगमन के साथ बोई जाती हैं — धान, मक्का, बाजरा, कपास, सोयाबीन, मूंगफली, अरहर।
इसलिए मानसून की शुरुआत में अत्यधिक देरी या लंबा प्रारंभिक विराम खरीफ कृषि को प्रभावित कर सकता है।
रबी फसलों की बुवाई सामान्यतः मानसून के बाद होती है — गेहूँ, चना, सरसों, जौ। रबी कृषि के लिए मानसून का प्रभाव मुख्यतः मृदा नमी तथा जलाशय/भूजल पुनर्भरण के माध्यम से पड़ता है। इसके अतिरिक्त उत्तर-पश्चिम भारत में पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली शीतकालीन वर्षा गेहूँ सहित रबी फसलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
मानसून आने के बाद यदि लंबा विराम हो जाए — वर्षा रुकना, मिट्टी की नमी घटना, फसल में जल तनाव, उत्पादन प्रभावित। विशेषकर वर्षा-आश्रित क्षेत्रों में इसका प्रभाव अधिक होता है।
सिंचाई मानसून की अनिश्चितता के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण सुरक्षा तंत्र है। भारत में सिंचाई के प्रमुख स्रोत — नहरें, कुएँ, नलकूप, जलाशय, अन्य स्थानीय स्रोत।
मानसून भूजल पुनर्भरण का महत्वपूर्ण स्रोत है।
लेकिन सारी वर्षा भूजल में नहीं जाती। यह निर्भर करता है — मिट्टी, चट्टान, भूमि ढाल, वनस्पति, वर्षा की तीव्रता, भूमि उपयोग पर।
यदि बहुत कम समय में बहुत अधिक वर्षा हो — वर्षा की तीव्रता अधिक, सतही अपवाह अधिक, अंत:स्रवण का अनुपात घट सकता है। इससे बाढ़ तो बढ़ सकती है, लेकिन हर स्थान पर भूजल पुनर्भरण उसी अनुपात में नहीं बढ़ता।
कमजोर मानसून का प्रभाव सिंचाई, पेयजल, जलविद्युत उद्योग तक पहुँच सकता है।
जलविद्युत उत्पादन नदी एवं जलाशय के जल प्रवाह पर निर्भर करता है। हालाँकि वास्तविक उत्पादन जलाशय प्रबंधन, बिजली की मांग और अन्य तकनीकी कारकों पर भी निर्भर करता है।
ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में मानसून जल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। यदि लगातार कमजोर मानसून हो तो जलाशय स्तर + भूजल पुनर्भरण घट सकता है और पेयजल संकट का जोखिम बढ़ सकता है।
जलग्रहण क्षेत्र वह क्षेत्र है जहाँ से जल किसी सामान्य निकास या नदी तंत्र की ओर प्रवाहित होता है।
जलग्रहण प्रबंधन का उद्देश्य —
वर्षा जल संचयन मानसून की मौसमी प्रकृति को जल सुरक्षा में बदलने का महत्वपूर्ण साधन है। उदाहरण — छत से जल संचयन, तालाब, टांक, कुएँ, जोहड़, चेक डैम, पुनर्भरण संरचनाएँ।
राजस्थान में कम एवं अनिश्चित वर्षा के कारण पारंपरिक जल संरचनाओं का विशेष महत्व रहा है — जोहड़, टांक, नाडी, कुंड, खड़ीन।
किसान क्षेत्र की जलवायु एवं वर्षा के अनुसार फसल चुनते हैं। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कम जल-आवश्यकता वाली फसलों का महत्व बढ़ सकता है, अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अधिक जल उपलब्धता वाली फसलों की संभावनाएँ। लेकिन फसल चयन केवल वर्षा से निर्धारित नहीं होता — मिट्टी + तापमान + बाजार + सिंचाई + परंपरा + तकनीक भी महत्वपूर्ण हैं।
अनिश्चित मानसून वाले क्षेत्रों में फसल विविधीकरण जोखिम कम करने में सहायता कर सकता है। उदाहरण — अनाज + दलहन + तिलहन + चारा जैसी विविध कृषि व्यवस्था जल एवं आय जोखिम को कम कर सकती है।
कम जल उपलब्धता वाले क्षेत्रों में ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकें जल उपयोग दक्षता बढ़ा सकती हैं।
भारत में जल सुरक्षा का अर्थ केवल पर्याप्त जल होना नहीं है। इसमें शामिल हैं —
और यदि मानसून कमजोर हो —
| कथन | स्थिति |
|---|---|
| अच्छा मानसून हमेशा अच्छी कृषि सुनिश्चित करता है। | गलत |
| अत्यधिक वर्षा कृषि के लिए हमेशा लाभकारी है। | गलत |
| कम मानसून वर्षा से सिंचाई की मांग बढ़ सकती है। | सही |
| वर्षा का कुछ भाग भूजल पुनर्भरण में योगदान देता है। | सही |
| सारी वर्षा भूजल में चली जाती है। | गलत |
| वर्षा जल संचयन मानसूनी जल को भविष्य के उपयोग के लिए संरक्षित करने में सहायता कर सकता है। | सही |
भारत की जलवायु में मानसून के साथ अनेक स्थानीय एवं क्षेत्रीय मौसमी घटनाएँ देखने को मिलती हैं। इनमें कुछ वर्षा से संबंधित हैं, कुछ तापमान से और कुछ पश्चिमी विक्षोभ अथवा चक्रवाती गतिविधियों से।
कालबैसाखी पूर्वी भारत में गर्मी के मौसम के दौरान आने वाले तीव्र गरजन-तूफानों के लिए प्रसिद्ध स्थानीय नाम है।
प्रमुख क्षेत्र — पश्चिम बंगाल, असम के कुछ भाग, बिहार तथा आसपास के पूर्वी क्षेत्र।
विशेषताएँ — मानसून-पूर्व अवधि, तीव्र संवहनीय गतिविधि, तेज हवाएँ, गरजन एवं बिजली, अल्प अवधि की तेज वर्षा, कभी-कभी ओलावृष्टि।
कृषि महत्व — जूट, चाय तथा अन्य ग्रीष्मकालीन/मानसून-पूर्व फसलों के लिए उपयोगी, लेकिन अत्यधिक तेज हवाएँ और ओलावृष्टि नुकसान भी पहुँचा सकती है।
दक्षिणी भारत के कुछ क्षेत्रों में मानसून-पूर्व होने वाली वर्षा को आम्र वर्षा कहा जाता है। इस वर्षा से आम के पकने की प्रक्रिया में सहायता मिलने के कारण इसे यह नाम मिला। यह मुख्यतः गर्म एवं नम वातावरण + स्थानीय संवहनीय गतिविधि से संबंधित है। इसे पूरे भारत में समान रूप से होने वाली वर्षा नहीं माना जाना चाहिए।
कर्नाटक के कॉफी उत्पादक क्षेत्रों में मानसून-पूर्व होने वाली वर्षा को कॉफी पुष्प वर्षा कहा जाता है। यह कॉफी पौधों में पुष्पन की प्रक्रिया के लिए अनुकूल मानी जाती है।
| आधार | आम्र वर्षा | कॉफी पुष्प वर्षा |
|---|---|---|
| मुख्य क्षेत्र | दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्र | मुख्यतः कर्नाटक के कॉफी क्षेत्र |
| मौसम | मानसून-पूर्व | मानसून-पूर्व |
| नाम का संबंध | आम | कॉफी पुष्पन |
| प्रकृति | स्थानीय वर्षा | स्थानीय वर्षा |
लू उत्तर भारत में ग्रीष्म ऋतु के दौरान चलने वाली अत्यधिक गर्म और शुष्क हवाएँ हैं।
प्रमुख क्षेत्र — राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली क्षेत्र, उत्तर प्रदेश, बिहार के कुछ भाग।
प्रमुख समय — मुख्यतः मई-जून के आसपास।
प्रभाव — निर्जलीकरण, हीट स्ट्रोक, स्वास्थ्य जोखिम, कृषि पर तापीय तनाव।
लू और मानसून का संबंध — ग्रीष्म में उत्तर-पश्चिम भारत का अत्यधिक गर्म होना वहाँ तापीय निम्न दाब के विकास में योगदान देता है। इस प्रकार लू केवल स्वास्थ्य संबंधी घटना नहीं, बल्कि व्यापक ग्रीष्मकालीन तापीय परिसंचरण की अभिव्यक्ति भी है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी के समय भारत के अनेक भागों में अक्टूबर के दौरान गर्म और उमस भरी परिस्थितियाँ अनुभव की जाती हैं।
प्रमुख कारण —
पश्चिमी विक्षोभ उत्तर-पश्चिम भारत के शीतकालीन मौसम की एक प्रमुख विशेषता है। इनका संबंध मध्य अक्षांशीय बहिरुष्णकटिबंधीय चक्रवाती तंत्रों से है।
भारत में प्रभाव — जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के कुछ भाग, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वर्षा/हिमपात।
कृषि महत्व — उत्तर-पश्चिम भारत में शीतकालीन वर्षा रबी फसलों, विशेषकर गेहूँ, के लिए उपयोगी हो सकती है।
हिमालय में पश्चिमी विक्षोभ शीतकालीन हिमपात के महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक हैं। इससे हिमालयी हिमावरण एवं जल संसाधनों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
मानसून के दौरान बंगाल की खाड़ी तथा आसपास के क्षेत्रों में निम्न दाब एवं अवदाब बन सकते हैं। इनका भारत के आंतरिक भागों में वर्षा वितरण में महत्वपूर्ण योगदान होता है।
सामान्य मार्ग — बंगाल की खाड़ी → पूर्वी भारत → मध्य भारत → पश्चिम/उत्तर-पश्चिम की ओर।
भारत के तटीय क्षेत्रों में उष्णकटिबंधीय चक्रवात महत्वपूर्ण मौसमी घटनाएँ हैं।
मुख्य समुद्री क्षेत्र — बंगाल की खाड़ी, अरब सागर।
प्रभाव — अत्यधिक वर्षा, तेज हवाएँ, तूफानी ज्वार, तटीय बाढ़, फसल एवं अवसंरचना को क्षति।
अरब सागर में भी उष्णकटिबंधीय चक्रवात बनते हैं। इनका प्रभाव गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिमी तट तथा अरब सागर के आसपास के क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
| घटना | प्रमुख क्षेत्र | समय/ऋतु | मुख्य प्रकृति |
|---|---|---|---|
| कालबैसाखी | पूर्वी भारत | ग्रीष्म/मानसून-पूर्व | गरजन-तूफान |
| आम्र वर्षा | दक्षिण भारत के कुछ भाग | मानसून-पूर्व | स्थानीय वर्षा |
| कॉफी पुष्प वर्षा | कर्नाटक | मानसून-पूर्व | स्थानीय वर्षा |
| लू | उत्तर एवं उत्तर-पश्चिम भारत | ग्रीष्म | गर्म शुष्क हवा |
| पश्चिमी विक्षोभ | उत्तर-पश्चिम भारत | शीत ऋतु | बहिरुष्णकटिबंधीय तंत्र |
| मानसूनी अवदाब | पूर्वी/मध्य भारत सहित व्यापक क्षेत्र | मानसून | निम्न दाब प्रणाली |
| अक्टूबर की गर्मी | भारत के अनेक उत्तरी/मध्य भाग | मानसून वापसी | गर्म व उमस |
| उष्णकटिबंधीय चक्रवात | तटीय भारत | विभिन्न मौसम, विशेषकर संक्रमण ऋतुएँ | तेज हवा + भारी वर्षा |
जेट धाराएँ, मानसून ट्रफ, ITCZ और क्रॉस-इक्वेटोरियल प्रवाह — इनका मूल परिचय पिछले भागों में आ चुका है। यहाँ इन्हें दोबारा परिभाषा के रूप में नहीं, बल्कि परीक्षा के लिए सटीक स्थान, दिशा, ऋतु, भूमिका और आपसी संबंध के रूप में व्यवस्थित किया जा रहा है।
मानसून ट्रफ ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान उत्तर भारत में विकसित होने वाली विस्तृत निम्न-दाब अक्षीय पट्टी है।
यह उत्तर-पश्चिम भारत → गंगा के मैदान → बंगाल की खाड़ी की दिशा में फैली होती है। यह स्थिर रेखा नहीं है; इसकी स्थिति समय-समय पर उत्तर-दक्षिण दिशा में बदलती रहती है।
महत्व — इसके आसपास निम्न दाब + अभिसरण + ऊपर उठती हवा + संवहन मानसूनी वर्षा को प्रभावित करते हैं। विशेषकर मानसूनी अवदाबों के मार्ग तथा वर्षा वितरण से इसका संबंध महत्वपूर्ण है।
मानसून विराम की स्थिति में मानसून ट्रफ की स्थिति में परिवर्तन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। विशेष रूप से ट्रफ का हिमालय की तलहटी की ओर स्थानांतरण मैदानी क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा की गतिविधि को कमजोर कर सकता है।
वह क्षेत्र है जहाँ उत्तर-पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों का अभिसरण होता है। यह स्थिर नहीं है। सूर्य की आभासी गति के साथ इसकी स्थिति मौसमी रूप से उत्तर-दक्षिण स्थानांतरित होती है।
गर्मियों में उत्तरी गोलार्ध के स्थल भाग के अधिक गर्म होने के साथ सामान्यतः उत्तर की ओर खिसकती है। भारत के संदर्भ में ITCZ का उत्तर की ओर स्थानांतरण मानसूनी निम्न दाब क्षेत्र के विकास में सहायता तथा दक्षिण-पश्चिम मानसूनी परिसंचरण को समर्थन प्रदान करता है। भारतीय मानसून में इसकी स्थिति को अक्सर मानसून ट्रफ के विकास से जोड़ा जाता है।
| आधार | ITCZ | मानसून ट्रफ |
|---|---|---|
| व्यापक अर्थ | व्यापारिक पवनों का अभिसरण क्षेत्र | भारतीय ग्रीष्मकालीन निम्न-दाब अक्षीय पट्टी |
| स्तर | वैश्विक/क्षेत्रीय | भारतीय मानसून से विशेष रूप से संबंधित |
| स्थिति | मौसमी रूप से उत्तर-दक्षिण स्थानांतरित | मानसून के दौरान भारत में महत्वपूर्ण |
| संबंध | मानसून की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण | भारतीय मानसूनी वर्षा के वितरण में प्रत्यक्ष महत्व |
दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध की ओर भूमध्य रेखा पार करने वाली हवाओं को व्यापक रूप से क्रॉस-इक्वेटोरियल प्रवाह कहा जाता है। भारतीय मानसून के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।
दक्षिणी हिंद महासागर में विकसित उच्च दाब क्षेत्र — मास्करीन उच्च — इस प्रवाह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दक्षिणी गोलार्ध से हवा निम्न दाब वाले एशियाई क्षेत्र की ओर प्रवाहित होती है।
भूमध्य रेखा पार करने के बाद हवा उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करती है। उत्तरी गोलार्ध में कोरिओलिस बल के कारण प्रवाह की दिशा दाईं ओर मुड़ती है। फलतः दक्षिण से आने वाली हवाएँ दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं का रूप ग्रहण करती हैं।
मास्करीन उच्च दक्षिणी हिंद महासागर में स्थित उपोष्णकटिबंधीय उच्च-दाब क्षेत्र है। ग्रीष्मकालीन भारतीय मानसून के संदर्भ में यह दाब प्रवणता + दक्षिणी गोलार्ध से नमी-युक्त वायु के प्रवाह के लिए महत्वपूर्ण है।
इसलिए यह पश्चिमी तट की मानसूनी वर्षा की गतिशीलता समझने में महत्वपूर्ण है।
ऊपरी क्षोभमंडल में पश्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली तेज पवन पट्टी। शीत ऋतु में इसका भारत के मौसम पर महत्वपूर्ण प्रभाव रहता है।
शीत ऋतु में उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट दक्षिण एशिया के ऊपर अधिक दक्षिणी स्थिति में होती है। यह पश्चिमी विक्षोभों के मार्ग एवं उत्तर-पश्चिम भारत के शीतकालीन मौसम से संबंधित है।
ग्रीष्मकाल में दक्षिण एशिया के ऊपर ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण में महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है। उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट सामान्यतः हिमालय के उत्तर की ओर खिसकती है। इसके साथ भारतीय मानसून के विकास के लिए अनुकूल ऊपरी-वायुमंडलीय दशाएँ बनने लगती हैं।
ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान ऊपरी क्षोभमंडल में विकसित होने वाली पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली तेज पवन पट्टी। इसका विकास भारतीय मानसून की ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण व्यवस्था से जुड़ा है।
गर्मियों में तिब्बती पठार के तीव्र ताप से ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है।
| आधार | उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट | उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट |
|---|---|---|
| सामान्य दिशा | पश्चिम → पूर्व | पूर्व → पश्चिम |
| मानसून से संबंध | शीतकालीन स्थिति एवं मानसून-पूर्व बदलाव | ग्रीष्मकालीन मानसून |
| ग्रीष्मकाल | हिमालय के उत्तर की ओर | उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में महत्वपूर्ण |
| प्रमुख संबंध | पश्चिमी विक्षोभ | मानसूनी परिसंचरण |
| कथन | स्थिति |
|---|---|
| मास्करीन उच्च भारत के ऊपर स्थित निम्न दाब है। | गलत |
| मानसून ट्रफ स्थायी भौगोलिक रेखा है। | गलत |
| ITCZ वर्षभर एक ही अक्षांश पर रहती है। | गलत |
| उत्तरी गोलार्ध में कोरिओलिस प्रभाव हवा को दाईं ओर मोड़ता है। | सही |
| सोमाली जेट मानसून के नमी परिवहन से संबंधित है। | सही |
| उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट पश्चिम से पूर्व बहती है। | सही |
| उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट पूर्व से पश्चिम बहती है। | सही |
| पश्चिमी विक्षोभ और उष्णकटिबंधीय चक्रवात समान प्रणाली हैं। | गलत |