राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956
प्रशासनिक एवं न्यायिक संहिताओं के आधार पर तैयार संपूर्ण प्रामाणिक मास्टर नोट्स (Section-by-Section Complete Breakdown)
ब्लॉक 1: धारा 1, 2 और 3 — प्रारंभिक एवं निर्वचन खंड
धारा 1
संक्षिप्त नाम, प्रसार और प्रारंभ
इस अधिनियम का नाम "राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956" है। इसका प्रसार संपूर्ण राजस्थान राज्य में है और यह 1 जुलाई 1956 से विधिक रूप से प्रभावी हुआ।
धारा 2
निरसन और व्यावृत्तियां (Repeals and Savings)
यह धारा अधिनियम के लागू होने से पूर्व रियासतकालीन समय के सभी पृथक-पृथक भू-राजस्व नियमों, प्रथाओं और आदेशों को विधिक रूप से निरसित (Abolish) करती है, जिससे संपूर्ण राज्य में एक समान राजस्व कानून स्थापित हो सके।
धारा 3
निर्वचन (Definitions)
इस निर्वचन खंड में पाठ्यक्रम के अनुसार निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक शब्दों को परिभाषित किया गया है:
- धारा 3(1)(ia) 'भू-अभिलेख अधिकारी' (Land Records Officer): इसके अंतर्गत निदेशक भू-अभिलेख, अतिरिक्त निदेशक, बंदोबस्त अधिकारी, कलेक्टर, अतिरिक्त कलेक्टर, उपखंड अधिकारी और तहसीलदार आते हैं, जो भू-अभिलेखों (नक्शा, खसरा, जमाबंदी) के शुद्धिकरण और संधारण के लिए विधिक रूप से उत्तरदायी हैं।
- धारा 3(1)(ib) 'नजुल भूमि' (Nazul Land): राज्य सरकार के पूर्ण विधिक स्वामित्व वाली ऐसी अकृषि भूमि जो किसी नगरपालिका, नगर परिषद या नगर निगम की स्थानीय सीमा के भीतर स्थित होती है और जो सार्वजनिक या राजकीय उपयोग हेतु आरक्षित होती है।
- धारा 3(1)(ic) 'राजस्व अपील प्राधिकारी' (Revenue Appellate Authority - RAA): राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक उच्च न्यायिक पद, जो कलेक्टर, बंदोबस्त अधिकारी या उपखंड अधिकारी द्वारा पारित मूल निर्णयों के विरुद्ध विधिक अपीलों की सुनवाई करता है।
ब्लॉक 2: धारा 4 से 36 — राजस्व मण्डल का गठन, क्षेत्राधिकार एवं राजस्व अधिकारी
धारा 4
राजस्व मण्डल का गठन (Establishment of Board of Revenue)
संपूर्ण राजस्थान राज्य के लिए एक 'राजस्व मण्डल' होगा, जिसका मुख्यालय अजमेर में स्थापित है। इसमें एक अध्यक्ष और राज्य सरकार द्वारा विहित विधिक सदस्य होते हैं।
धारा 5
मण्डल के सदस्य
मण्डल के सदस्यों की विधिक योग्यताओं और नियुक्ति की शर्तों का निर्धारण, जिसमें प्रशासनिक सेवा (IAS/RAS) के वरिष्ठ अधिकारी और विधिक पृष्ठभूमि (अधिवक्ता/न्यायाधीश) के विशेषज्ञ शामिल होते हैं।
धारा 6
मण्डल का क्षेत्राधिकार
यह स्थापित करती है कि राजस्व मण्डल राज्य का सर्वोच्च राजस्व न्यायालय होगा। इसे भू-राजस्व, काश्तकारी मामलों और भूमि रिकॉर्ड से जुड़े सभी विधिक विवादों पर सर्वोच्च अपीलीय और पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार प्राप्त है।
धारा 7
मण्डल की प्रशासनिक शक्तियां
मण्डल को अपने अधीनस्थ सभी राजस्व न्यायालयों (कलेक्टर, तहसीलदार आदि) के कार्यों की निगरानी, निरीक्षण करने तथा राजस्व रिकॉर्ड्स के संधारण हेतु विधिक नियम और प्रपत्र (Forms) बनाने की पूर्ण प्रशासनिक शक्ति है।
धारा 8
अधिवक्ताओं की मान्यता
राजस्व मण्डल और उसके मातहत न्यायालयों में वकीलों/अधिवक्ताओं के उपस्थित होने और पैरवी करने के विधिक अधिकार को मान्यता देती है।
धारा 9
अपील, निर्देश और पुनरीक्षण की शक्तियां
मण्डल को किसी भी कनिष्ठ राजस्व न्यायालय के आदेशों के विरुद्ध द्वितीय अपील सुनने, विधिक प्रश्नों पर निर्देश (Reference) लेने और मामलों के पुनरीक्षण (Revision) की सर्वोच्च न्यायिक शक्ति प्रदान करती है।
धारा 10
राजस्व न्यायालयों पर मण्डल का नियंत्रण
यह घोषित करती है कि राज्य के समस्त राजस्व न्यायालय और राजस्व अधिकारी विधिक रूप से राजस्व मण्डल के न्यायिक नियंत्रण और निर्देशों के अधीन कार्य करेंगे।
धारा 11
राज्य सरकार की नियंत्रण शक्ति
मण्डल की न्यायिक शक्तियों के अलावा, राजस्व प्रशासन के नीतिगत और गैर-न्यायिक मामलों पर राज्य सरकार का सर्वोच्च प्रशासनिक नियंत्रण रहेगा।
धारा 12
राजस्व क्षेत्रों का विभाजन
राज्य सरकार को संपूर्ण राजस्थान को प्रशासनिक दृष्टि से संभागों (Divisions), जिलों (Districts), उपखंडों (Sub-divisions), तहसीलों और पटवार हलकों में विभाजित करने की विधिक शक्ति देती है।
धारा 13
संभागीय आयुक्त की नियुक्ति
प्रत्येक संभाग में एक संभागीय आयुक्त की नियुक्ति, जो संभाग के समस्त राजस्व अधिकारियों का मुख्य प्रशासनिक पर्यवेक्षक होता है।
धारा 14
कलेक्टर की नियुक्ति
प्रत्येक जिले में राज्य सरकार द्वारा एक जिला कलेक्टर की नियुक्ति की जाएगी, जो जिले का मुख्य राजस्व अधिकारी (Chief Revenue Officer) होगा।
धारा 15
अतिरिक्त कलेक्टर की नियुक्ति
जिले में कलेक्टर के कार्यभार को कम करने और राजस्व न्यायालय के रूप में कलेक्टर के समान शक्तियों का उपयोग करने हेतु अतिरिक्त कलेक्टर की नियुक्ति का प्रावधान।
धारा 16
उपखण्ड अधिकारी (SDM) की नियुक्ति
प्रत्येक उपखंड में एक एसडीएम की नियुक्ति की जाएगी, जो सहायक कलेक्टर के रूप में उस क्षेत्र के समस्त विधिक राजस्व वादों की प्राथमिक सुनवाई करेगा।
धारा 17
सहायक कलेक्टर और राजस्व अधिकारी
उपखंड स्तर पर प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार अतिरिक्त सहायक कलेक्टरों और अन्य विहित राजस्व अधिकारियों की नियुक्ति।
धारा 18
तहसीलदार और नायब तहसीलदार
प्रत्येक तहसील में एक तहसीलदार और उसकी सहायता के लिए नायब तहसीलदारों की नियुक्ति, जो जमीनी स्तर पर प्राथमिक राजस्व न्यायालय और रिकॉर्ड संधारण के प्रभारी होते हैं।
धारा 19
भू-अभिलेख निरीक्षक (RI) / कानूनगो
पटवारियों के कार्यों के निरीक्षण, फसलों की गिरदावरी की भौतिक जांच और म्यूटेशन के सत्यापन में तहसीलदार की सहायता हेतु राजस्व निरीक्षकों की नियुक्ति।
धारा 20
पटवारी की नियुक्ति
प्रत्येक पटवार हलके में एक पटवारी की नियुक्ति, जो गाँव के स्तर पर भूमि अभिलेखों (जमाबंदी, खसरा, नक्शा) को अद्यतन रखने और प्रारंभिक राजस्व प्रविष्टियां दर्ज करने के लिए विधिक रूप से जिम्मेदार है।
⚖️ राजस्व विधिक प्रशासनिक पदानुक्रम (Hierarchy)
पटवारी (धारा 20)
➔
भू-अभिलेख निरीक्षक (धारा 19)
➔
तहसीलदार (धारा 18)
➔
उपखण्ड अधिकारी (धारा 16)
➔
जिला कलेक्टर (धारा 14)
➔
राजस्व मण्डल, अजमेर (धारा 4)
धारा 21
राजस्व अधिकारियों का पदानुक्रम और अधीनता
यह स्पष्ट करती है कि पटवारी गिरदावर के, गिरदावर तहसीलदार के, तहसीलदार एसडीएम के, एसडीएम कलेक्टर के और कलेक्टर संभागीय आयुक्त व राजस्व मण्डल के विधिक रूप से अधीन होंगे।
धारा 22
शक्तियों का संयोजन
राज्य सरकार किसी भी प्रशासनिक अधिकारी को आवश्यकता पड़ने पर एक से अधिक राजस्व पदों (जैसे बंदोबस्त अधिकारी के साथ कलेक्टर की शक्तियों) की विधिक शक्तियों का संयोजन कर सौंप सकती है।
धारा 23
रिक्तियों के दौरान शक्तियों का प्रयोग
यदि कलेक्टर या किसी राजस्व अधिकारी का पद अचानक रिक्त हो जाता है, तो कार्यवाहक अधिकारी को उस पद की समस्त विधिक और न्यायिक शक्तियां स्वतः प्राप्त हो जाएंगी।
धारा 24
शक्तियों का प्रतिनिधिमण्डल (Delegation)
राज्य सरकार या कलेक्टर अपने अधीनस्थ अधिकारियों को इस अधिनियम के तहत दी गई कतिपय प्रशासनिक शक्तियां विधिक रूप से डेलिगेट (सौंप) सकते हैं।
धारा 25
राजस्व न्यायालयों की बैठने की जगह
यह प्रावधान करती है कि राजस्व न्यायालय (जैसे बोर्ड, RAA, एसडीएम कोर्ट) अपने विहित मुख्यालयों पर बैठेंगे, परंतु न्याय के हित में वे अपने क्षेत्राधिकार के भीतर किसी भी स्थान पर (जैसे कैंप कोर्ट) न्यायिक सुनवाई कर सकते हैं।
धारा 26
शक्तियों का विखंडन और वापसी
राज्य सरकार या सक्षम प्राधिकारी द्वारा अधीनस्थ अधिकारियों को दी गई विवेकाधीन या डेलिगेट की गई शक्तियों को वापस लेने का विधिक अधिकार।
धारा 27
राजस्व अधिकारियों के स्थानांतरण के नियम
राजस्व अधिकारियों के प्रशासनिक और विधिक स्थानांतरण (Transfer) तथा पदस्थापन के नियम एवं शर्तें।
धारा 28
राजस्व न्यायालयों की मुहर
प्रत्येक राजस्व न्यायालय के पास एक विहित विधिक मुहर (Seal) होगी, जिसका उपयोग सभी समन, वारंट, आदेशों और डिक्रियों पर किया जाना अनिवार्य है।
धारा 29
न्यायिक कार्यों की प्रकृति
यह घोषित करती है कि इस अधिनियम के तहत राजस्व अधिकारियों द्वारा की जाने वाली समस्त कार्यवाहियां भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 193, 219 and 228 के तहत 'न्यायिक कार्यवाहियां' (Judicial Proceedings) मानी जाएंगी।
धारा 30
समन जारी करने की शक्ति
किसी भी राजस्व न्यायालय को किसी भी व्यक्ति को साक्ष्य देने या विधिक दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए समन (Smon) जारी कर विधिक रूप से बाध्य करने की Civil Court के समान शक्ति प्राप्त है।
धारा 31
समन की तामील की प्रक्रिया
समन को भौतिक रूप से तामील कराने, व्यक्ति न मिलने पर उसके घर पर चस्पा करने या डिजिटल माध्यम से भेजने की विधिक प्रक्रिया।
धारा 32
वारंट जारी करने की शक्ति
यदि कोई व्यक्ति बार-बार समन देने पर भी जानबूझकर राजस्व न्यायालय में उपस्थित नहीं होता, तो न्यायालय उसके विरुद्ध जमानती या गैर-जमानती वारंट (Warrant) जारी कर सकता है।
धारा 33
सुनवाई के स्थगन (Adjournment) की शक्ति
राजस्व न्यायालय को न्याय के हित में, लिखित कारणों के आधार पर, मुकदमे की सुनवाई को नियत समय के लिए स्थगित करने की शक्ति।
धारा 34
खर्चों (Costs) का अधिरोपण
मुकरमे के दौरान जानबूझकर देरी करने वाले या झूठे विधिक वाद दायर करने वाले पक्ष पर न्यायालय द्वारा न्यायिक खर्चा लगाने की शक्ति।
धारा 35
राजस्व अदालतों का सार्वजनिक होना
यह प्रावधान करती है कि सभी राजस्व न्यायालयों की कार्यवाही सामान्य जनता के लिए खुली (Open Court) होगी, जब तक कि किसी विशेष मामले में गोपनीयता अनिवार्य न हो।
धारा 36
कनिष्ठ न्यायालयों से मामले मँगाने की शक्ति
वरिष्ठ राजस्व न्यायालयों (कलेक्टर/संभागीय आयुक्त) को यह शक्ति है कि वे न्याय सुनिश्चित करने के लिए किसी भी कनिष्ठ न्यायालय (तहसीलदार/एसडीएम) में लंबित मुकदमे को अपने पास स्थानांतरित (Transfer) कर सकते हैं।
ब्लॉक 3: धारा 40A और धारा 74 से 87 — नजुल भूमि एवं लगान निर्धारण (Settlement)
धारा 40A
नजुल भूमि का विशेष प्रबंधन
यह धारा प्रावधान करती है कि नगरीय सीमाओं के भीतर स्थित राज्य सरकार की नजुल भूमि (Nazul Land) का प्रबंधन, नियमन और आवंटन राज्य सरकार की नीतियों के अधीन स्थानीय निकायों (जैसे जेडीए, नगर निगम, यूआईटी) द्वारा सार्वजनिक विकास परियोजनाओं के लिए किया जाएगा।
धारा 74
भूमि का बंदोबस्त (Settlement) हेतु अधिसूचना
जब राज्य सरकार को महसूस हो कि किसी जिले में भूमि रिकॉर्ड बहुत पुराने हो गए हैं या लगान में विधिक संशोधन आवश्यक है, तो वह उस क्षेत्र को 'बंदोबस्त के अधीन' (Under Settlement) घोषित करने की आधिकारिक अधिसूचना जारी करती है।
धारा 75
बंदोबस्त अधिकारी (Settlement Officer) की नियुक्ति
अधिसूचना जारी होने के बाद उस क्षेत्र में एक बंदोबस्त अधिकारी और सहायक बंदोबस्त अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है, जिन्हें भूमि के नए सिरे से सर्वेक्षण की विशेष विधिक शक्तियां प्राप्त होती हैं।
धारा 76
बंदोबस्त के दौरान कलेक्टर की शक्तियों का स्थगन
बंदोबस्त अभियान के दौरान भूमि रिकॉर्ड्स के संधारण और नक्शा शुद्धिकरण से जुड़ी जिला कलेक्टर की कतिपय प्रशासनिक शक्तियां बंदोबस्त अधिकारी में विधिक रूप से स्थानांतरित हो जाती हैं।
धारा 77
सर्वेक्षण और नक्शा निर्माण (Survey and Map Drafting)
बंदोबस्त अधिकारी संपूर्ण क्षेत्र का प्लॉट-वार वैज्ञानिक सर्वेक्षण करवाएगा, सीमाओं का निर्धारण करेगा और गाँव का नया त्रिकोणीय विधिक नक्शा (शजरा) तैयार करवाएगा।
धारा 78
सीमा चिन्हों की स्थापना
खेतों और गाँवों की विधिक सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए भौतिक रूप से पक्के पत्थर के सीमा चिन्ह (Boundary Marks) स्थापित करने का प्रावधान।
धारा 79
अधिकार अभिलेख (जमाबंदी) का नए सिरे से शुद्धिकरण
बंदोबस्त के दौरान प्रत्येक खातेदार के विधिक अधिकारों, मालिकाना हक और कब्जे की सघन जांच कर एक पूर्णतः शुद्ध 'अधिकार अभिलेख' (Record of Rights) तैयार किया जाता है।
धारा 80
भूमि का विधिक वर्गीकरण
लगान निर्धारण हेतु भूमि को उसकी उत्पादकता और सिंचाई के साधनों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है; जैसे—चाही (कुएं से सिंचित), नहरानी (नहर से सिंचित), बारानी (वर्षा पर निर्भर), बंजर आदि।
धारा 81
लगान की दरों का मूल्यांकन (Assessment of Revenue Rates)
बंदोबस्त अधिकारी पिछले 20 वर्षों की फसलों के औसत उत्पादन, बाजार मूल्य और कृषि लागत का वैज्ञानिक मूल्यांकन कर प्रति बीघा/हेक्टेयर भू-राजस्व की नई विधिक दरें (Revenue Rates) प्रस्तावित करता है।
धारा 82
प्रस्तावित दरों का प्रकाशन और आपत्तियां
प्रस्तावित लगान दरों को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया जाता है तथा स्थानीय किसानों को उस पर अपनी विधिक आपत्तियां (Objections) दर्ज कराने के लिए विहित समय दिया जाता है।
धारा 83
राज्य सरकार द्वारा लगान दरों की विधिक स्वीकृति
बंदोबस्त अधिकारी आपत्तियों के निस्तारण के बाद लगान दरों का अंतिम प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजता है, जिसकी विधिक स्वीकृति के बाद ही दरें कानूनन प्रभावी होती हैं।
धारा 84
स्वीकृत लगान दरों की घोषणा
स्वीकृत की गई भू-राजस्व दरों की आधिकारिक घोषणा की जाती है, जिसके बाद प्रत्येक काश्तकार की नई जमाबंदी में नया लगान दर्ज होता है।
धारा 85
लगान की अवधि
यह निर्धारित करती है कि बंदोबस्त के दौरान तय किया गया भू-राजस्व सामान्यतः आगामी 20 से 30 वर्षों की निश्चित अवधि के लिए स्थिर (Fixed) रहेगा, उससे पहले सरकार इसमें मनमानी वृद्धि नहीं कर सकती।
धारा 86
असाधारण परिस्थितियों में लगान में छूट
यदि बंदोबस्त की अवधि के दौरान कोई गंभीर प्राकृतिक आपदा (अकाल, बाढ़, टिड्डी दल का हमला) आती है, तो सरकार को यह विधिक शक्ति है कि वह लगान को अस्थाई रूप से माफ (Remit) या स्थगित (Suspend) कर सके।
धारा 87
विवादों का न्यायिक निस्तारण
बंदोबस्त के दौरान मालिकाना हक, सीमा विवाद या भूमि के वर्गीकरण को लेकर उत्पन्न होने वाले सभी विधिक विवादों का निस्तारण बंदोबस्त अधिकारी द्वारा एक राजस्व अदालत के रूप में किया जाएगा।
ब्लॉक 4: धारा 106 से 137 — भूमि अभिलेख (Land Records) एवं अधिकार अभिलेख
धारा 106
भू-अभिलेखों का संधारण (Maintenance of Land Records)
निदेशक भू-अभिलेख के नियंत्रण में प्रत्येक जिले का कलेक्टर अपने क्षेत्राधिकार के भीतर सभी गाँवों के नक्शे, खसरे और जमाबंदी को पूर्णतः अद्यतन (Update) रखने के लिए विधिक रूप से उत्तरदायी है।
धारा 107
गाँव के विधिक नक्शे का संधारण (Shajra Map)
पटवारी प्रतिवर्ष गाँव के नक्शे का भौतिक निरीक्षण (Field Inspection) करेगा और यदि खेतों के विभाजन या नए रास्तों के कारण नक्शे में कोई बदलाव आया है, तो लाल स्याही से उसमें प्रविष्टि दर्ज करेगा।
धारा 108
खसरा रजिस्टर (Field Book)
खेतों के भौतिक ब्यौरे को दर्ज करने वाली विहित विधिक पुस्तक, जिसमें प्रत्येक सर्वे नंबर (खसरा) का क्षेत्रफल, मिट्टी का प्रकार और सिंचाई के साधनों का विवरण संधारित होता है।
धारा 109
गिरदावरी (Focal Inspection Register)
पटवारी द्वारा प्रतिवर्ष वर्ष में दो बार (रबी और खरीफ की फसल के समय) खेतों में मौके पर जाकर बोई गई फसल, पेड़ों की संख्या और वास्तविक काश्तकार का नाम दर्ज करने का विधिक भौतिक संकलन। (अद्यतन 2026: वर्तमान में जियो-टैग्ड ई-गिरदावरी मान्य है)
धारा 110
अधिकार अभिलेख / जमाबंदी (Record of Rights)
प्रत्येक गाँव के लिए एक 'अधिकार अभिलेख' संधारित किया जाएगा। यह वह सर्वोच्च विधिक दस्तावेज है जिसमें प्रत्येक खातेदार का नाम, उसके विधिक अधिकार, सह-काश्तकारों का हिस्सा, देय लगान तथा भूमि पर कोई विधिक भार (जैसे बैंक बंधक/लोन) दर्ज होता है।
धारा 111
जमाबंदी का आवधिक नवीनीकरण
प्रत्येक गाँव की जमाबंदी का प्रत्येक पांच वर्ष में नए सिरे से विधिक नवीनीकरण (Five-Yearly Revision) किया जाता है, जिसे 'पंचाला जमाबंदी' भी कहते हैं।
धारा 112
नामांतरण रजिस्टर (Mutation Register)
पटवारी के पास एक विहित नामांतरण रजिस्टर होगा, जिसमें भूमि के विधिक स्वामित्व में होने वाले सभी परिवर्तनों की प्रारंभिक प्रविष्टियां दर्ज की जाएंगी।
धारा 113
स्वामित्व परिवर्तन की विधिक सूचना
यदि किसी भूमि का विधिक स्वामित्व क्रय-विक्रय, उत्तराधिकार, दान, वसीयत या न्यायालय की डिक्री द्वारा बदलता है, तो नए स्वामी का यह विधिक दायित्व है कि वह 3 महीने के भीतर इसकी लिखित सूचना पटवारी या तहसीलदार को दे।
धारा 114
नामांतरण की विधिक प्रक्रिया (Mutation Procedure)
पटवारी सूचना प्राप्त होने पर नामांतरण रजिस्टर में प्रविष्टि करेगा, गाँव के सार्वजनिक स्थान पर नोटिस चस्पा करेगा तथा 7 दिन के भीतर मामले को विधिक तस्दीक के लिए राजस्व अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करेगा।
धारा 115
अविवादित नामांतरण की तस्दीक
यदि नामांतरण पर किसी पक्ष को कोई विधिक आपत्ति नहीं है, तो तहसीलदार, नायब तहसीलदार या विहित राजस्व निरीक्षक (RI) ग्राम सभा या पटवार मुख्यालय पर उस नामांतरण को विधिक रूप से तस्दीक (Sanction) कर देगा।
धारा 116
विवादित नामांतरण की न्यायिक सुनवाई
यदि नामांतरण को लेकर सह-वारिसों या क्रेता-विक्रेता में कोई विधिक विवाद उत्पन्न होता है, तो तहसीलदार उसे 'विवादित नामांतरण' (Disputed Mutation) के रूप में दर्ज कर दोनों पक्षों को समन जारी करेगा और साक्ष्यों के आधार पर न्यायिक निर्णय पारित करेगा।
धारा 117
राजस्व रिकॉर्ड्स की विधिक प्रामाणिकता (Presumption as to Entries)
यह घोषित करती है कि इस अधिनियम के नियमों के तहत जमाबंदी और नामांतरण में दर्ज सभी विधिक प्रविष्टियों को तब तक शत-प्रतिशत सत्य और शुद्ध (Presumed to be True) माना जाएगा, जब तक कि न्यायालय में साक्ष्यों द्वारा उन्हें गलत साबित न कर दिया जाए।
धारा 118
रिकॉर्ड्स में त्रुटियों का शुद्धिकरण (Correction of Errors)
यदि जमाबंदी या नक्शे में कोई स्पष्ट लिपिकीय, गणितीय या तकनीकी त्रुटि रह गई है, तो पीड़ित व्यक्ति शुद्धिकरण हेतु तहसीलदार या कलेक्टर के समक्ष आवेदन कर सकता है।
धारा 119
पटवारी की विधिक जवाबदेही
यदि पटवारी जानबूझकर भूमि रिकॉर्ड में गलत प्रविष्टि दर्ज करता है या नामांतरण को छुपाता है, तो उसे सेवा से बर्खास्त करने और आपराधिक मुकदमा दर्ज करने का विधिक प्रावधान।
धारा 120 से 130
सीमा विवाद और सीमांकन (Boundary Disputes)
खेतों या गाँवों के मध्य मेड़/सीमा को लेकर होने वाले विवादों की स्थिति में तहसीलदार या भू-अभिलेख अधिकारी को सरकारी नक्शे के अनुसार भौतिक 'सीमा ज्ञान' (Demarcation) करने और सीमा चिन्हों को पुनः स्थापित करने की अनन्य विधिक शक्तियां।
धारा 131 से 137
कृषि सांख्यिकी और निरीक्षण के नियम
कृषि गणना, सिंचाई के आंकड़ों का संधारण, कुओं की गणना तथा राजस्व अभिलेखों की प्रतियां (Copy/नकल) काश्तकारों को विहित शुल्क पर समयबद्ध उपलब्ध कराने के प्रशासनिक नियम।
ब्लॉक 5: धारा 142 से 183 — भू-राजस्व की वसूली एवं कड़े दंडात्मक प्रावधान
धारा 142
भू-राजस्व का प्रथम प्रभार (First Charge on Land)
यह स्पष्ट घोषणा करती है कि किसी भी कृषि भूमि पर होने वाली फसल और वह भूमि स्वयं, उस पर देय वार्षिक भू-राजस्व के भुगतान के लिए राज्य सरकार का 'प्रथम विधिक प्रभार' (First Charge) होगी। किसी भी बैंक लोन या निजी ऋण से पहले सरकारी राजस्व चुकाना विधिक रूप से अनिवार्य है।
धारा 143
लगान चुकाने का विधिक दायित्व
खतौनी में दर्ज सभी सह-काश्तकार संयुक्त और पृथक रूप से (Jointly and Severally liable) राज्य को भू-राजस्व चुकाने के लिए विधिक रूप से उत्तरदायी हैं।
धारा 144
देय तिथि और चूक (Default)
यदि विहित तिथि (फसल कटने के तुरंत बाद) तक भू-राजस्व जमा नहीं कराया जाता, तो उसे 'राजस्व बकाया' (Arrears) और संबंधित भूमि धारक को विधिक रूप से 'चूककर्ता' (Defaulter) घोषित कर दिया जाता है।
धारा 145
चूककर्ता के विरुद्ध विधिक कार्यवाही की शुरुआत
लगान बकाया होने पर पटवारी और तहसीलदार चूककर्ता के विरुद्ध वसूली की विधिक फाइल सक्रिय करते हैं।
धारा 146
वसूली की कड़ी विधिक कड़ियाँ (Modes of Recovery)
चूककर्ता से भू-राजस्व की प्रभावी वसूली हेतु इस अधिनियम के तहत प्रशासनिक अधिकारियों को निम्नलिखित छह अत्यंत कठोर विधिक उपाय क्रमिक रूप से अपनाने की शक्ति प्राप्त है, जिनका वर्णन धारा 147 से 152 में है।
धारा 147
मांग पत्र जारी करना (Writ of Demand)
वसूली का प्रथम चरण। चूककर्ता को एक आधिकारिक विधिक नोटिस (Demand Notice) जारी किया जाता है, जिसमें उसे 15 दिन के भीतर बकाया राशि ब्याज सहित जमा कराने की विधिक चेतावनी दी जाती है।
धारा 148
गिरफ्तारी और सिविल निरुद्धता (Arrest and Civil Detention)
यदि मांग पत्र के बाद भी चूककर्ता भुगतान नहीं करता, तो तहसीलदार विधिक वारंट जारी कर चूककर्ता को गिरफ्तार करवा सकता है और उसे तहसील के सिविल कारागार (Civil Jail) में अधिकतम 15 दिन के लिए निरुद्ध (Detain) कर सकता है। (अपवाद: महिलाओं, अवयस्कों और वरिष्ठ नागरिकों पर यह लागू नहीं होता)।
धारा 149
चल संपत्ति की जब्ती और कुर्की (Attachment and Sale of Movable Property)
चूककर्ता के घर पर जाकर उसके विधिक उपकरणों, कृषि उत्पादों (खड़ी फसल को छोड़कर), व्यावसायिक वाहनों और अन्य चल संपत्तियों को विधिक रूप से कुर्क (Seize) कर उनकी सार्वजनिक नीलामी करने की शक्ति।
धारा 150
कृषि भूमि/होल्डिंग की कुर्की
यदि चल संपत्ति से भी बकाया पूरा नहीं होता, तो कलेक्टर चूककर्ता की संपूर्ण कृषि भूमि को अपने विधिक नियंत्रण (कुर्की) में ले सकता है और उसके प्रबंधन के लिए एक सरकारी रिसीवर नियुक्त कर सकता है।
धारा 151
कृषि भूमि का विधिक स्थानांतरण
चूककर्ता की भूमि को किसी अन्य इच्छुक कृषक को एक निश्चित अवधि (अधिकतम 15 वर्ष) के लिए पट्टे पर देकर, उससे प्राप्त अग्रिम लगान से सरकारी बकाया वसूल करने की प्रशासनिक शक्ति।
धारा 152
कृषि भूमि की सार्वजनिक नीलामी (Sale of Holding)
सर्वोच्च और अंतिम विधिक उपाय। कलेक्टर चूककर्ता की कृषि भूमि का आवंटन/खातेदारी विधिक रूप से निरस्त कर उसकी सार्वजनिक नीलामी (Public Auction) का आदेश जारी कर सकता है।
धारा 153 से 160
नीलामी के कड़े विधिक नियम
नीलामी की सार्वजनिक उद्घोषणा, बोली लगाने के नियम, बयाना राशि (Earnest Money) जमा कराने की प्रक्रिया तथा नीलामी को विधिक रूप से पुख्ता (Confirm) करने की कलेक्टर की शक्तियां।
धारा 161
नीलामी को निरस्त करने का विधिक आवेदन
यदि चूककर्ता नीलामी की तिथि से 30 दिन के भीतर संपूर्ण बकाया राशि और नीलामी का 5% हर्जाना सरकारी खजाने में जमा करा देता है, तो कलेक्टर उस नीलामी को विधिक रूप से निरस्त कर भूमि वापस किसान को सौंप सकता है।
धारा 162
क्रेता को विधिक प्रमाण पत्र
नीлаमी सफल होने पर कलेक्टर खरीदार को 'बिक्री प्रमाण पत्र' (Sale Certificate) जारी करेगा, जो उस भूमि पर उसके पूर्ण विधिक स्वामित्व का अकाट्य साक्ष्य होगा।
धारा 163 से 170
अतिक्रमण हटाना और धारा 91 की दंडात्मक प्रक्रिया
शासकीय, नजुल या चारागाह भूमि पर अवैध कब्जा करने वाले अतिक्रमियों (Trespassers) को बिना किसी लंबे मुकदमे के, तुरंत पुलिस बल की सहायता से बेदखल करने, उनका निर्माण ध्वस्त करने तथा उन पर राजस्व का कई गुना प्रशासनिक अर्थदण्ड (Penalty) लगाने की तहसीलदार की तीव्र विधिक शक्तियाँ।
धारा 171
रिसीवर की नियुक्ति
विवादित या बकाया वाली भूमियों के वित्तीय प्रबंधन और फसलों की सुरक्षा के लिए अंतरिम रूप से एक विधिक रिसीवर नियुक्त करने की न्यायालय की शक्ति।
धारा 172
सरकारी ऋणों की भू-राजस्व की भांति वसूली
यह राज्य सरकार को यह शक्ति देती है कि वह काश्तकारों को दिए गए कृषि ऋणों (जैसे तकावी लोन) या अन्य विधिक सरकारी देयताओं को भी 'भू-राजस्व के बकाया की भांति' (As Arrears of Land Revenue) इसी अध्याय की कठोर दंडात्मक प्रक्रियाओं (कुर्की/नीलामी) द्वारा वसूल कर सके।
धारा 173 से 183
प्रक्रियात्मक और विधिक संरक्षण उपबंध (मानवीय सुरक्षा कवच)
इनमें राजस्व वसूली के दौरान काश्तकारों के न्यूनतम जीवन निर्वाह हेतु विहित विधिक सुरक्षाएं शामिल हैं; जैसे—चूककर्ता के रहने का एकमात्र आवासीय मकान, उसकी पत्नी और बच्चों के पहनने के वस्त्र, भोजन पकाने के बर्तन, आगामी फसल के लिए आवश्यक बीज और न्यूनतम दो जोड़ी बैल/कृषि उपकरण विधिक रूप से कुर्क या नीलाम नहीं किए जा सकते (Absolutely Exempted)।