भाग अ: लघुउत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा: 50 शब्द)
प्रश्न 1. भारतीय निर्वाचन आयोग की संवैधानिक स्थिति का वर्णन कीजिए।
50 शब्द
भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) संविधान के
भाग XV (अनुच्छेद 324) के तहत स्थापित एक स्वायत्त व स्थायी संवैधानिक निकाय है।
- मूल कार्य: यह संसद (लोकसभा, राज्यसभा), राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति पदों के निर्वाचनों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करता है।
- स्वतंत्रता के प्रावधान: मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान हटाने की कठिन प्रक्रिया, सुरक्षित कार्यकाल और संचित निधि पर भारित वेतन इसकी निष्पक्षता सुनिश्चित करते हैं।
प्रश्न 2. अनूप बरनवाल (Anoop Baranwal) मामले का निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव पड़ा?
50 शब्द
अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ वाद (2023) में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति में कार्यपालिका के एकाधिकार को समाप्त कर ऐतिहासिक निर्णय दिया:
- नियमन के तहत नियुक्ति हेतु एक त्रिसदस्यीय उच्चाधिकार समिति (प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता/सबसे बड़े दल के नेता, और भारत के मुख्य न्यायाधीश-CJI) की सिफारिश को अनिवार्य किया।
- प्रभाव: इसने चयन प्रक्रिया में संस्थागत पारदर्शिता, निष्पक्षता सुनिश्चित की तथा आयोग की स्वायत्तता को सुदृढ़ किया (हालाँकि बाद में संसद ने कानून द्वारा समिति में बदलाव किया)।
प्रश्न 3. आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct - MCC) का महत्व स्पष्ट कीजिए।
50 शब्द
आदर्श आचार संहिता (MCC) चुनाव घोषणा की तिथि से परिणामों तक राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के मार्गदर्शन हेतु बनाई गई एक
आम सहमति आधारित नियमावली है।
- महत्व: यह सत्ताधारी दल द्वारा सरकारी मशीनरी व संसाधनों के दुरुपयोग को रोकती है, सांप्रदायिक/जातीय अपीलों पर नियंत्रण लगाती है और सभी हितधारकों को 'समान अवसर' (Level Playing Field) प्रदान कर स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करती है।
प्रश्न 4. NOTA की अवधारणा एवं महत्व बताइए।
50 शब्द
NOTA (None of the Above) मतदाताओं को चुनावी मैदान में उतरे सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का विकल्प देता है।
- इसे PUCL बनाम भारत संघ वाद (2013) में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर शामिल किया गया, जिसका मुख्य आधार अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत 'अभिव्यक्ति की नकारात्मक स्वतंत्रता' है।
- महत्व: यह गुप्त मतदान के अधिकार की रक्षा करता है, राजनीतिक दलों को स्वच्छ छवि के योग्य उम्मीदवार उतारने हेतु बाध्य करता है और लोकतंत्र में जन-असंतोष को वैध अभिव्यक्ति देता है।
प्रश्न 5. चुनावी सुधारों में VVPAT की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
50 शब्द
VVPAT (Voter Verifiable Paper Audit Trail) ईवीएम (EVM) के साथ जुड़ी एक स्वतंत्र सत्यापन प्रणाली है, जो मत दर्ज होने पर मतदाता को 7 सेकंड के लिए एक पेपर पर्ची दृश्यमान कराती है।
- भूमिका: यह मतदाता को भौतिक रूप से आश्वस्त करती है कि उसका मत सही उम्मीदवार को गया है। यह ईवीएम की तकनीकी विश्वसनीयता पर उठने वाले विवादों को शांत करती है और विसंगति की स्थिति में पेपर ट्रेल ऑडिट (भौतिक गणना) का कानूनी विकल्प प्रदान करती है।
प्रश्न 6. Electoral Bonds योजना की प्रमुख विशेषताएँ एवं विवाद स्पष्ट कीजिए।
50 शब्द
इलेक्टोरल बॉन्ड योजना (2018) का उद्देश्य राजनीतिक चंदे को डिजिटल/बैंकिंग प्रणाली (SBI के माध्यम से) में लाकर काले धन पर रोक लगाना था।
- विवाद: इसमें दानदाताओं की पहचान गुप्त रखी गई थी, जिससे जनता/मतदाताओं को चंदे के स्रोत की जानकारी नहीं मिल पाती थी (क्रोनी कैपिटलिज्म का भय)।
- सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत 'मतदाताओं के सूचना के अधिकार' का उल्लंघन मानते हुए पूर्णतः असंवैधानिक घोषित कर दिया।
प्रश्न 7. 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' (One Nation One Election) की अवधारणा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
50 शब्द
इसका तात्पर्य लोकसभा, सभी राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनावों को एक साथ (एक ही चक्र में) आयोजित करने से है।
- पक्ष में तर्क: बार-बार आचार संहिता लागू होने से थपने वाले 'नीतिगत गतिरोध' (Policy Paralysis) से मुक्ति, विशाल चुनावी खर्च में कमी और प्रशासनिक/सुरक्षा बलों की दक्षता में सुधार।
- चुनौतियाँ: संघीय ढांचे को संभावित नुकसान, विधानसभाओं के समय-पूर्व विघटन की स्थिति में संवैधानिक संकट और व्यापक संविधान संशोधनों की आवश्यकता।
प्रश्न 8. परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का महत्व स्पष्ट कीजिए।
50 शब्द
संविधान के
अनुच्छेद 82 (संसद हेतु) तथा अनुच्छेद 170 (राज्यों हेतु) के तहत गठित यह एक उच्चाधिकार प्राप्त वैधानिक निकाय है, जो नवीनतम जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की क्षेत्रीय सीमाओं का पुनर्निर्धारण करता है।
- महत्व: यह जनसंख्या के बदलते अनुपात में समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है तथा लोकतांत्रिक सिद्धांत "एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य" को चरितार्थ करता है। इसके आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
प्रश्न 9. राजनीति के अपराधीकरण से लोकतंत्र को क्या चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं?
50 शब्द
विधायिका में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले जनप्रनिधियों के प्रवेश से निम्नलिखित गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं:
- संसदीय साख में गिरावट: कानून निर्माताओं के स्वयं कानून तोड़ने वाले होने से संस्थागत विश्वसनीयता घटती है।
- कुशासन: यह नीति-निर्माण को प्रभावित करता है, 'बाहुबल और धनबल' (Muscle & Money Power) को बढ़ावा देता है, जिससे कानून के शासन (Rule of Law) के स्थान पर कानून का दुरुपयोग शुरू हो जाता है।
प्रश्न 10. निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता बढ़ाने हेतु दो प्रमुख सुधार सुझाइए।
50 शब्द
- संवैधानिक समानता: अन्य दो चुनाव आयुक्तों (ECs) को भी मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के समान ही सुरक्षित कार्यकाल (हटाने की प्रक्रिया) प्रदान की जाए, ताकि वे कार्यपालिका के दबाव से मुक्त रह सकें।
- वित्तीय व प्रशासनिक स्वायत्तता: आयोग का स्वयं का एक 'स्वतंत्र सचिवालय' हो तथा उसका वार्षिक प्रशासनिक व्यय भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित (Charged) होना चाहिए, न कि संसद के मतदान के अधीन।
प्रश्न 11. निर्वाचन आयोग की अर्ध-न्यायिक शक्तियों का वर्णन कीजिए।
50 शब्द
भारतीय निर्वाचन आयोग को चुनावी विवादों के निपटारे हेतु
'सिविल कोर्ट' जैसी अर्ध-न्यायिक शक्तियाँ प्राप्त हैं:
- क्षेत्राधिकार: राजनीतिक दलों के विभाजन की स्थिति में असली दल की पहचान करना, चुनाव चिह्न संबंधी विवादों का निपटारा करना (जैसे हाल ही में शिवसेना व NCP मामले में किया गया), तथा सांसदों/विधायकों की अयोग्यता (दलबदल को छोड़कर) पर क्रमशः राष्ट्रपति व राज्यपाल को बाध्यकारी परामर्श देना।
प्रश्न 12. SVEEP कार्यक्रम का महत्व स्पष्ट कीजिए।
50 शब्द
SVEEP (Systematic Voters' Education and Electoral Participation) निर्वाचन आयोग का एक प्रमुख फ्लैगशिप मतदाता शिक्षा व जागरूकता कार्यक्रम है।
- महत्व: यह मतदाता सूची में पंजीकरण को बढ़ावा देकर मतदान प्रतिशत में गुणात्मक वृद्धि करता है। इसका विशेष ध्यान युवाओं, महिलाओं, दिव्यांगजनों (PwDs) और हाशिए के वर्गों को जोड़कर भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी, सहभागी और वैध बनाना है।
प्रश्न 13. निर्वाचन आयोग (ECI) और राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) में अंतर स्पष्ट कीजिए।
50 शब्द
दोनों पूर्णतः स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएँ हैं, जिनमें मुख्य अंतर निम्नलिखित है:
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| आधार |
भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) |
राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) |
| अनुच्छेद |
अनुच्छेद 324 |
अनुच्छेद 243K तथा 243ZA |
| चुनावी क्षेत्राधिकार |
संसद, राज्य विधानमंडल, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति |
स्थानीय निकाय (पंचायती राज एवं नगरपालिकाएँ) |
प्रश्न 14. चुनाव चिह्नों का भारतीय चुनाव प्रणाली में महत्व स्पष्ट कीजिए।
50 शब्द
भारत जैसे विशाल, बहुभाषी और विविध लोकतंत्र में चुनाव चिह्न दृश्य पहचान के सशक्त माध्यम हैं।
- महत्व: ये निरक्षर या कम शिक्षित मतदाताओं को अपने पसंदीदा उम्मीदवार और दल को आसानी से पहचानने की सुविधा देकर मताधिकार को सरल बनाते हैं। आयोग Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के तहत इनका नियमन व आवंटन कर चुनावी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करता है।
प्रश्न 15. cVIGIL App की उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
50 शब्द
cVIGIL (Vigilant Citizen) निर्वाचन आयोग द्वारा विकसित एक अभिनव मोबाइल एप्लीकेशन है जो चुनावी सतर्कता में नागरिकों को भागीदार बनाता है।
- उपयोगिता: इसके माध्यम से आम नागरिक आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन या चुनावी कदाचार (जैसे धन/शराब वितरण) की लाइव फोटो/वीडियो बनाकर सीधे शिकायत दर्ज कर सकते हैं। यह ऐप Geotagging व ऑटो-लोकेशन ट्रैकिंग से युक्त है, जिसके कारण आयोग के उड़न दस्तों (Flying Squads) को 100 मिनट के भीतर त्वरित कार्रवाई करने में मदद मिलती है।
भाग ब: दीर्घउत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा: 150 शब्द)
प्रश्न 16. आदर्श आचार संहिता (MCC) की भूमिका एवं सीमाओं का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
150 शब्द
भूमिका और प्रभावशीलता:
आदर्श आचार संहिता (MCC) भारतीय चुनावी शुचिता को बनाए रखने का एक नैतिक और व्यावहारिक उपकरण है। इसकी मुख्य भूमिका निम्नलिखित है:
- समान अवसर (Level Playing Field): यह चुनाव घोषणा के बाद सत्तारूढ़ दल को नई कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा करने, सरकारी मशीनरी, वाहनों या विश्रामगृहों का चुनावी लाभ हेतु उपयोग करने से रोकती है।
- नैतिक आचरण का नियमन: यह संकीर्ण सांप्रदायिक, जातिगत दुष्प्रचार, व्यक्तिगत आक्षेपों और मतदाताओं को प्रलोभन/रिश्वत देने की प्रवृत्तियों पर प्रभावी अंकुश लगाती है।
सीमाएँ और चुनौतियाँ:
- विधिक शक्ति का अभाव: MCC को कोई वैधानिक (Statutory) समर्थन प्राप्त नहीं है। यह केवल एक आम सहमति का दस्तावेज है, इसलिए इसके उल्लंघन पर आयोग सीधे दंडात्मक कार्रवाई नहीं कर सकता (उसे IPC या RPA, 1951 की धाराओं पर निर्भर रहना पड़ता है)।
- डिजिटल युग की चुनौतियाँ: सोशल मीडिया पर छद्म प्रचार, एल्गोरिथमिक टारगेटेड विज्ञापन, डीपफेक (Deepfakes) तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा जनित भ्रामक सूचनाओं के दौर में सीमाओं से परे जाकर किए जाने वाले उल्लंघनों पर MCC के पारंपरिक नियम निष्प्रभावी साबित हो रहे हैं।
निष्कर्ष: यद्यपि MCC ने भारतीय चुनाव प्रणाली में अभूतपूर्व सुचिता स्थापित की है, परंतु वर्तमान डिजिटल युग की जटिलताओं को देखते हुए इसके चुनिंदा प्रावधानों को वैधानिक मजबूती देने और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए कठोर आईटी-अधिनियमों के साथ समन्वित करने की महती आवश्यकता है।
प्रश्न 17. राजनीतिक दलों की मान्यता प्रणाली और इसके मानदंडों का मूल्यांकन कीजिए।
150 शब्द
भारत में राजनीतिक दलों का पंजीकरण जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत होता है, परंतु उन्हें 'राष्ट्रीय' या 'राज्य' स्तरीय दल की मान्यता देने का कार्य निर्वाचन आयोग Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के कड़े चुनावी मानदंडों के आधार पर करता है।
प्रणाली के सकारात्मक पक्ष (मूल्यांकन):
- चुनावी सुव्यवस्थीकरण: यह तंत्र गंभीर और बड़े राजनीतिक संगठनों को गैर-गंभीर/निष्क्रिय दलों से अलग करता है, जिससे मतदाताओं को स्पष्ट वैचारिक विकल्प मिलते हैं।
- विशेष विशेषाधिकार: मान्यता प्राप्त दलों को एक निश्चित आरक्षित चुनाव चिह्न, दिल्ली में कार्यालय हेतु भूमि, मतदाता सूची के मुफ्त सेट और दूरदर्शन/आकाशवाणी पर प्रचार हेतु मुफ्त समय (Airtime) मिलता है। यह राष्ट्रीय दलों को राष्ट्रीय मुद्दों पर और राज्य स्तरीय दलों को क्षेत्रीय आकांक्षाओं को मंच देने हेतु प्रोत्साहित करता है।
कमियाँ/समीक्षा की आवश्यकता:
- निष्क्रिय दलों की अधिकता: वर्तमान में देश में हजारों 'पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त' दल हैं जो चुनाव नहीं लड़ते, बल्कि कथित तौर पर टैक्स चोरी या धन शोधन (Money Laundering) के माध्यम के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
- मानदंडों की जटिलता: कई बार मजबूत क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले दलों को कड़े संख्यात्मक मानदंडों के कारण राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने में लंबा समय लग जाता है।
सुझाव: निर्वाचन आयोग को दलों की मान्यता के मानदंडों को अधिक व्यावहारिक बनाने के साथ-साथ ऐसे पंजीकृत दलों का पंजीकरण रद्द करने (Deregistration) की सीधी विधिक शक्ति मिलनी चाहिए जो लगातार चुनाव नहीं लड़ते।
प्रश्न 18. चुनावी वित्तपोषण (Election Funding) में पारदर्शिता की आवश्यकता और इस दिशा में सुधारों की चर्चा कीजिए।
150 शब्द
पारदर्शिता की आवश्यकता क्यों?
लोकतंत्र में पारदर्शी चुनावी वित्तपोषण अनिवार्य है क्योंकि राजनीतिक दलों को मिलने वाला गुप्त चंदा सीधे तौर पर देश की 'नीति-निर्माण और सुशासन' को प्रभावित करता है। यदि चंदे के स्रोत गुप्त हों, तो क्रोनी कैपिटलिज्म (साठगांठ वाले पूंजीवाद), नीतिगत पक्षपात (Policy Capture) और भ्रष्टाचार को संस्थागत बढ़ावा मिलता है। यह मतदाताओं के जानने के अधिकार पर कुठाराघात है।
इलेक्टोरल बॉन्ड योजना और न्यायिक हस्तक्षेप:
वर्ष 2018 में बैंकिंग चैनलों के माध्यम से चुनावी चंदे को वैध करने हेतु इलेक्टोरल बॉन्ड योजना लाई गई थी। परंतु, इसमें दानदाताओं की गोपनीयता (Anonymity) के कारण गंभीर सवाल उठे। वर्ष 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में इसे अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत नागरिकों के सूचना के अधिकार का हनन मानते हुए पूर्णतः असंवैधानिक घोषित कर दिया।
आगामी सुधारों की दिशा (भावी मार्ग):
- राज्य द्वारा वित्तपोषण (State Funding of Elections): इंद्रजीत गुप्त समिति की सिफारिशों के अनुरूप गैर-नकद रूप (जैसे समय, ईंधन, बुनियादी ढांचा) में राज्य द्वारा चुनाव फंडिंग की संभावना तलाशी जानी चाहिए।
- कठोर ऑडिटिंग: सभी राजनीतिक दलों के खातों की अनिवार्य रूप से कैग (CAG) या किसी स्वतंत्र पैनल द्वारा स्वीकृत चार्टर्ड अकाउंटेंट से जांच होनी चाहिए और प्रत्येक ₹1 के चंदे को सार्वजनिक डोमेन में ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
प्रश्न 19. निर्वाचन आयोग के समक्ष उभरती डिजिटल चुनौतियों का गंभीर विश्लेषण कीजिए।
150 शब्द
समकालीन डिजिटल क्रांति ने जहाँ एक ओर चुनावी प्रबंधन को सुगम बनाया है, वहीं दूसरी ओर निष्पक्ष चुनावों के समक्ष अभूतपूर्व और अदृश्य संकट भी खड़े किए हैं:
प्रमुख डिजिटल चुनौतियाँ:
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डीपफेक तकनीक: वर्तमान में उम्मीदवारों के जाली/फेक वीडियो और ऑडियो (Deepfakes) बनाकर मतदान से ठीक पहले सोशल मीडिया पर वायरल कर दिए जाते हैं। जब तक उनकी सत्यता प्रमाणित होती है, तब तक जनमत को प्रभावित (Manipulate) किया जा चुका होता है।
- एल्गोरिथमिक ध्रुवीकरण और हेट स्पीच: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के 'टारगेटेड विज्ञापन' और प्रोपेगैंडा एल्गोरिदम समाज में ध्रुवीकरण बढ़ाते हैं। 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' और अन्य माध्यमों से फर्जी खबरों (Fake News) का तीव्र प्रसार लोकतांत्रिक विमर्श को विषाक्त कर रहा है।
- चुनावी व्यय की निगरानी में विफलता: डिजिटल विज्ञापनों, इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग और परदे के पीछे से की जाने वाली डिजिटल पीआर (PR) गतिविधियों पर होने वाले वास्तविक खर्च को ट्रैक करना पारंपरिक चुनावी पर्यवेक्षकों के लिए लगभग असंभव हो गया है।
- विदेशी हस्तक्षेप और साइबर सुरक्षा: मतदाता डेटा में सेंधमारी और विदेशी बॉट्स (Bots) के माध्यम से घरेलू राजनीति और चुनावों को प्रभावित करने का राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा खतरा।
समाधान: आयोग को बिग-टेक कंपनियों (Meta, Google आदि) के साथ मिलकर 'स्वैच्छिक आचार संहिता' को कानूनी बाध्यता में बदलना होगा, सोशल मीडिया पर कड़ा 'फैक्ट-चेक' इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना होगा और स्वयं की तकनीकी विंग (AI-Cell) को सुदृढ़ करना होगा।
प्रश्न 20. भारतीय लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग की भूमिका का एक समग्र और आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
150 शब्द
भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को देश में लोकतंत्र का 'रक्षक और केंद्रीय स्तंभ' माना जाता है। 1950 से लेकर अब तक आयोग ने भारत की विशाल विविधता, निरक्षरता और भौगोलिक विषमताओं के बावजूद दुनिया के सबसे बड़े चुनावी अभ्यासों को सफलतापूर्वक संचालित कर वैश्विक मंच पर भारतीय लोकतंत्र की साख को स्थापित किया है।
सकारात्मक और ऐतिहासिक योगदान:
- तकनीकी समावेशन और नवाचार: ईवीएम (EVM) और वीवीपीएटी (VVPAT) के सफल क्रियान्वयन से बूथ कैप्चरिंग का अंत हुआ। cVIGIL ऐप ने नागरिकों को सशक्त किया है तथा SVEEP कार्यक्रम के जरिए मतदान को एक जन-उत्सव का रूप दिया गया है।
- संवैधानिक मर्यादा: संकट के समय (जैसे टी.एन. शेषन के कार्यकाल में या आपातकाल के बाद) आयोग ने कार्यपालिका के सामने घुटने टेकने के बजाय अपनी रीढ़ की हड्डी और स्वायत्तता का परिचय दिया है।
आलोचनात्मक बिंदु/विद्यमान चिंताएं:
- संस्थागत स्वायत्तता पर सवाल: नियुक्ति प्रक्रिया में हालिया विधायी बदलावों (जिसमें मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर किया गया) से कार्यपालिका के प्रभाव की चिंता बढ़ी है।
- प्रवर्तन की कमियां: घृणा भाषण (Hate Speech) और आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के बड़े मामलों में कई बार आयोग पर सत्तारूढ़ दल के प्रति 'नरम रवैया' अपनाने के आरोप विपक्ष द्वारा लगाए जाते हैं।
निष्कर्ष: कुल मिलाकर, निर्वाचन आयोग की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही है। इसे भविष्य में 'सच्चा लोकतंत्र का प्रहरी' बनाए रखने के लिए इसकी वित्तीय स्वायत्तता सुनिश्चित करना और इसकी नियुक्ति प्रक्रिया को पूर्णतः निष्पक्ष व सर्वदलीय सहमति पर आधारित रखना अनिवार्य है।