भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं संवैधानिक विकास (1885-1950)

वरिष्ठ सिविल सेवा संकाय (IAS/RAS Faculty) द्वारा विश्लेषित सम्पूर्ण 24 क्रोनोलॉजिकल कड़ियों का अकादमिक ग्रंथ नोट्स

कड़ी 01 • 1885

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना एवं प्रारंभिक उदारवादी राष्ट्रवाद

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औपनिवेशिक आर्थिक शोषण, पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार और ब्रिटिश प्रशासनिक नीतियों के कारण भारत में एक समेकित राजनीतिक चेतना जागृत हो रही थी। क्षेत्रीय राजनीतिक संस्थाओं (जैसे पूना सार्वजनिक सभा, इंडियन एसोसिएशन) की सीमाओं को लांघकर एक अखिल भारतीय मंच के निर्माण की ऐतिहासिक आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इसी पृष्ठभूमि में 28 दिसंबर 1885 को बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में सेवानिवृत्त ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी ऐलन ऑक्टेवियन ह्यूम (ए.ओ. ह्यूम) के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना की गई।

इसके प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता प्रख्यात विधिक विद्वान व्योमेश चंद्र बनर्जी ने की, जिसमें देश के विभिन्न प्रांतों से आए 72 प्रबुद्ध प्रतिनिधियों ने भाग लिया। प्रारंभिक बीस वर्षों (1885-1905) में कांग्रेस पर उदारवादी नेताओं (दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता) का वैचारिक नियंत्रण रहा। इनकी कार्यप्रणाली ब्रिटिश न्यायप्रियता में अटूट विश्वास रखते हुए प्रार्थना पत्रों, याचिकाओं और प्रतिवाद (3Ps) के विधिक दायरे तक सीमित थी।

👁️ संकाय मूल्यांकन (Faculty Critique):

वामपंथी और राष्ट्रवादी इतिहासकारों में कांग्रेस की स्थापना को लेकर गहरा मतभेद है। जहाँ 'सेफ्टी वाल्व' (Safety Valve) का सिद्धांत यह मानता है कि डफरिन और ह्यूम ने भारतीयों के बढ़ते असंतोष को हिंसक विस्फोट में बदलने से रोकने के लिए इसका गठन किया, वहीं बिपिन चंद्र जैसे आधुनिक इतिहासकार इसे 'लाइटनिंग कंडक्टर' (Lightning Conductor) का सिद्धांत कहते हैं, जिसके अनुसार भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश अधिकारी का उपयोग औपनिवेशिक दमन से बचने के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में किया था।

कड़ी 02 • 1905

बंगाल का विभाजन एवं स्वदेशी आंदोलन का वैचारिक विस्फोट

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक बंगाल भारतीय राष्ट्रीय चेतना और ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियों का मुख्य गढ़ बन चुका था। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन का प्राथमिक साम्राज्यवादी उद्देश्य इस उभरती हुई राष्ट्रवादी धुरी को नष्ट करना था। जुलाई 1905 में कर्जन ने बंगाल विभाजन की आधिकारिक घोषणा की, जिसे 16 अक्टूबर 1905 को पूर्णतः प्रभावी कर दिया गया। यद्यपि औपनिवेशिक सरकार ने इसके पीछे 'प्रशासकीय असुविधा' का तर्क दिया, परंतु वास्तविक विभाजन धार्मिक आधार पर किया गया था, जिसमें पूर्वी भाग मुस्लिम बहुल और पश्चिमी भाग हिंदू बहुल बनाया गया था, ताकि फूट डालो और राज करो की नीति को संस्थागत रूप दिया जा सके।

इस विभाजन के विरोध में भारतीय राजनीति में प्रथम महान जन-आंदोलन 'स्वदेशी आंदोलन' और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का शंखनाद हुआ। विभाजन के दिन को पूरे बंगाल में 'शोक दिवस' के रूप में मनाया गया। रवींद्रनाथ टैगोर के आह्वान पर हिंदुओं और मुस्लिमों ने एक-दूसरे की कलाइयों पर राखियां बांधीं, जो ब्रिटिश विभाजनकारी नीतियों के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिरोध का प्रतीक था। स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय उद्योगों, राष्ट्रीय शिक्षा और आत्मनिर्भरता (आत्मशक्ति) को अभूतपूर्व प्रोत्साहन दिया।

कड़ी 03 • 1906

अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना एवं सांप्रदायिक तुष्टिकरण

स्वदेशी आंदोलन की राष्ट्रव्यापी सफलता और हिंदू-मुस्लिम जन-एकता से ब्रिटिश हुकूमत अत्यधिक चिंतित थी। औपनिवेशिक प्रशासकों ने राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए मुस्लिम संभ्रांत वर्ग (जमींदार और नवाब) को कांग्रेस के राष्ट्रवादी प्रभाव से दूर रखने की कूटनीति अपनाई। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिण्टो के प्रोत्साहन पर मुस्लिम अभिजात वर्ग का एक शिष्टमंडल आगा खाँ के नेतृत्व में शिमला में मिला, जहाँ उन्हें आश्वासन दिया गया कि ब्रिटिश सरकार मुस्लिमों के राजनीतिक हितों की पृथक रक्षा करेगी।

इसी संगठित तुष्टिकरण के परिणामस्वरूप 30 दिसंबर 1906 को ढाका के नवाब सलीमुल्लाह, आगा खाँ और नवाब मोहसिन-उल-मुल्क के नेतृत्व में 'अखिल भारतीय मुस्लिम लीग' की स्थापना की गई। लीग के प्रारंभिक उद्देश्यों में ब्रिटिश सरकार के प्रति पूर्ण निष्ठा प्रदर्शित करना और मुस्लिमों के लिए विशेष विधिक अधिकारों की मांग करना शामिल था। इस घटना ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर एक संस्थागत सांप्रदायिकता को जन्म दिया, जिसने राष्ट्रीय एकता को दीर्घकालिक रूप से खंडित किया।

कड़ी 04 • 1907

सूरत विभाजन: कांग्रेस का आंतरिक वैचारिक विखंडन

स्वदेशी आंदोलन की रणनीति और उसके भौगोलिक विस्तार को लेकर कांग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेद तीव्र हो गए थे। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल (लाल-बाल-पाल) के नेतृत्व वाला गरम दल (उग्र राष्ट्रवादी) इस आंदोलन को बंगाल से बाहर पूरे भारत में फैलाना चाहता था और केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से आगे बढ़कर ब्रिटिश हुकूमत के साथ पूर्ण असहयोग और 'पूर्ण स्वराज' की मांग कर रहा था। इसके विपरीत, फिरोजशाह मेहता और गोपाल कृष्ण गोखले का नरम दल (उदारवादी) इस आंदोलन को केवल बंगाल तक और विधिक प्रतिवाद तक ही सीमित रखने के पक्ष में था।

यह मतभेद वर्ष 1907 में ताप्ती नदी के तट पर आयोजित सूरत अधिवेशन में चरम पर पहुँच गया। अध्यक्ष पद के चयन को लेकर दोनों धड़ों के बीच तीखी झड़पें हुईं, जो अंततः खुले संघर्ष में बदल गईं। इसके परिणामस्वरूप गरम दल को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया और संगठन पर उदारवादियों का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया।

👁️ संकाय मूल्यांकन (प्रशासनिक निहितार्थ):

सूरत विभाजन राष्ट्रीय आंदोलन की एक ऐतिहासिक त्रासदी सिद्ध हुआ। कांग्रेस के बिखरने से राष्ट्रवादी ऊर्जा छिन्न-भिन्न हो गई, जिसका सीधा लाभ ब्रिटिश सरकार को मिला। अंग्रेजों ने दमन चक्र चलाते हुए तिलक को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर 6 वर्ष के लिए मांडले जेल (म्यांमार) भेज दिया। यह घटना सिद्ध करती है कि किसी भी आंदोलन में आंतरिक एकता का अभाव औपनिवेशिक दमन को आमंत्रण देता है।

कड़ी 05 • 1909

मॉर्ले-मिण्टो सुधार एवं पृथक निर्वाचन की विधिक विषबेल

सूरत विभाजन के कारण कमजोर पड़ चुके राष्ट्रीय आंदोलन और मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद, ब्रिटिश सरकार ने उदारवादियों को संतुष्ट करने और सांप्रदायिक विभाजन को विधिक रूप देने के लिए एक नया संवैधानिक अधिनियम प्रस्तुत किया, जिसे 'भारत परिषद अधिनियम 1909' या मॉर्ले-मिण्टो सुधार कहा जाता है। इस अधिनियम के निर्माण में भारत सचिव लॉर्ड मॉर्ले और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिण्टो की मुख्य भूमिका थी।

इस अधिनियम की सबसे विनाशकारी विशेषता इसके द्वारा मुस्लिमों के लिए लागू की गई पृथक निर्वाचन पद्धति (Separate Electorate) थी। इसके तहत मुस्लिम सीटों के लिए केवल मुस्लिम मतदाता ही मतदान कर सकते थे। इसने भारतीय राजव्यवस्था में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के उस बीज को बोया जिसने अंततः 1947 में भारत के विभाजन के रूप में फल दिया। लॉर्ड मिण्टो को इसी कारण 'भारत में सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक' कहा जाता है।

कड़ी 06 • 1915

महात्मा गांधी का भारत आगमन एवं जन-राष्ट्रवाद की वैचारिक पृष्ठभूमि

दक्षिण अफ्रीका की नस्लभेदी और दमनकारी औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ सत्याग्रह, अहिंसा और सविनय अवज्ञा के नवीन राजनीतिक हथियारों का सफल परीक्षण करने के बाद, मोहनदास करमचंद गांधी का भारतीय राजनीति के पटल पर अवतरण हुआ। 9 जनवरी 1915 को गांधी स्थाई रूप से भारत लौटे। उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें भारतीय समाज की जटिलताओं को समझने के लिए प्रारंभिक एक वर्ष तक सक्रिय राजनीति से दूर रहकर देश का भ्रमण करने की सलाह दी।

गांधी का आगमन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक युगपरिवर्तनीय घटना थी। अब तक जो आंदोलन केवल पश्चिमी शिक्षा प्राप्त शहरी वकीलों, बुद्धिजीवियों और संभ्रांत वर्ग तक सीमित था, गांधी की जीवनशैली, दर्शन और भाषा ने उसे ग्रामीण भारत के किसानों, श्रमिकों, निरक्षरों और अछूतों की चेतना से जोड़ दिया।

कड़ी 07 • 1916

लखनऊ अधिवेशन: राष्ट्रीय एकता का अल्पकालिक प्रयोग

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, तिलक की जेल से रिहाई और एनी बेसेंट द्वारा चलाए जा रहे होम रूल लीग आंदोलन ने कांग्रेस के भीतर और बाहर राष्ट्रीय एकता की पुनः आवश्यकता को जन्म दिया था। वर्ष 1916 में अंबिका चरण मजूमदार की अध्यक्षता में कांग्रेस का ऐतिहासिक लखनऊ अधिवेशन संपन्न हुआ। एनी बेसेंट और तिलक के अथक प्रयासों से नरम दल और गरम दल के बीच के पुराने मतभेद समाप्त हो गए और उग्र राष्ट्रवादियों की कांग्रेस में ससम्मान वापसी हुई।

इसी अधिवेशन के दौरान कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच एक विधिक समझौता हुआ, जिसे 'लखनऊ पैक्ट' या 'दिल्ली समझौता' कहा जाता है। बालगंगाधर तिलक और मोहम्मद अली जिन्ना इसके मुख्य सूत्रधार थे। इसके तहत दोनों दलों ने मिलकर सरकार के समक्ष संवैधानिक सुधारों की संयुक्त मांगें रखने का निश्चय किया। परंतु, इस तात्कालिक एकता को प्राप्त करने के लिए कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की 1909 की सांप्रदायिक पृथक निर्वाचन की मांग को आधिकारिक स्वीकृति दे दी, जिसे इतिहासकार भविष्य के विभाजन का विधिक मार्ग प्रशस्त करने वाली भूल मानते हैं।

कड़ी 08 • 1917

चम्पारण सत्याग्रह: भारतीय धरातल पर सत्याग्रह का प्रथम परीक्षण

बिहार के चम्पारण क्षेत्र के किसान औपनिवेशिक बागान मालिकों के क्रूर शोषण से त्रस्त थे। यहाँ 'तीनकठिया पद्धति' लागू थी, जिसके तहत प्रत्येक किसान को अपनी भूमि के 3/20 भाग पर अनिवार्य रूप से नील की खेती करनी पड़ती थी। जर्मनी में सिंथेटिक (रासायनिक) रंगों के आविष्कार के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में नील की मांग समाप्त हो गई, जिससे गोरे जमींदार नील की खेती बंद करने को तैयार तो हुए, परंतु इसके एवज में उन्होंने किसानों पर अवैध लगान, कर और मुआवजे के रूप में भारी आर्थिक बोझ लाद दिया।

स्थानीय कृषक नेता राजकुमार शुक्ल के निरंतर आमंत्रण पर महात्मा गांधी चम्पारण पहुँचे। स्थानीय प्रशासन ने उन्हें जिला छोड़ने का विधिक आदेश दिया, परंतु गांधी ने 'अंतरात्मा की आवाज' को सर्वोच्च मानते हुए सविनय अवज्ञा की और आदेश मानने से इनकार कर दिया। गांधी के इस दृढ़ संकल्प के सामने ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और एक आधिकारिक जांच समिति (Agrarian Committee) गठित की गई, जिसके सदस्य स्वयं गांधी भी थे। अंततः तीनकठिया पद्धति को अवैध घोषित कर समाप्त किया गया और किसानों से अवैध रूप से वसूले गए धन का 25% भाग वापस लौटाया गया। यह भारत में गांधीवादी अहिंसक सत्याग्रह की पहली महान और निर्णायक विजय थी।

कड़ी 09 • 1918

अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन: औद्योगिक विवाद और प्रथम भूख हड़ताल

चम्पारण की सफलता के तुरंत बाद गांधी जी को गुजरात के प्रमुख औद्योगिक केंद्र अहमदाबाद के सूती वस्त्र मिल मालिकों और स्थानीय मजदूरों के बीच उत्पन्न हुए गहरे तनाव को सुलझाने के लिए आमंत्रित किया गया। विवाद का मुख्य कारण 'प्लेग बोनस' था। प्रथम विश्व युद्ध के कारण उत्पन्न हुई अत्यधिक महंगाई के दौर में मिल मालिक महामारी के समाप्त होने का बहाना बनाकर मजदूरों को दिया जाने वाला प्लेग बोनस (जो उनके वेतन का एक बड़ा हिस्सा था) पूरी तरह बंद करना चाहते थे, जबकि श्रमिक इसे बुनियादी वेतन में शामिल करने की मांग कर रहे थे।

मिल मालिकों ने केवल 20% बोनस देने की घोषणा की, जबकि मजदूरों की मांग गांधी के परामर्श पर 35% की थी। गांधी ने श्रमिकों को अहिंसक हड़ताल पर जाने का निर्देश दिया। जब लंबे संघर्ष के कारण मजदूरों का मनोबल टूटने लगा, तब मिल मालिकों पर नैतिक दबाव बनाने और श्रमिकों में विश्वास जगाने हेतु गांधी ने भारत में अपनी पहली भूख हड़ताल (Hunger Strike) प्रारंभ की। गांधी के इस आत्म-बलिदान के कदम से मिल मालिक विवश हुए और मामला एक स्वतंत्र मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Tribunal) को सौंपा गया, जिसने श्रमिकों के पक्ष में 35% वेतन वृद्धि का विधिक निर्णय सुनाया।

कड़ी 10 • 1918

खेड़ा सत्याग्रह: किसानों का विधिक प्रतिरोध एवं पटेल का राजनीतिक उदय

गुजरात के खेड़ा जिले के किसान वर्ष 1918 में भीषण अकाल, अतिवृष्टि और प्लेग की महामारी के कारण फसल बर्बादी की मार झेल रहे थे। तत्कालीन ब्रिटिश राजस्व आचार संहिता (Revenue Code) के नियमों के अनुसार, यदि किसी वित्त वर्ष में कुल कृषि उत्पादन सामान्य का केवल 25% या उससे कम हो, तो उस वर्ष का भूमि लगान पूर्णतः माफ किया जाना विधिक रूप से अनिवार्य था। इसके बावजूद औपनिवेशिक अधिकारी अपनी वित्तीय आय को कम न करने की हठधर्मिता के कारण किसानों पर लगान चुकाने का भारी दमनकारी दबाव बना रहे थे और कर न देने पर संपत्ति कुर्क करने की धमकियाँ दे रहे थे।

गांधी ने सर्वप्रथम सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी के सदस्यों के साथ स्वयं जाकर ग्राउंड रियलिटी की जांच की। तथ्यों की पुष्टि होने के बाद, उन्होंने किसानों को संगठित कर लगान न देने (टैक्स असहयोग) की शपथ दिलाई। सरकार ने मवेशियों और कृषि भूमि की कुर्की करके आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया, परंतु किसानों की अहिंसक दृढ़ता के सामने ब्रिटिश प्रशासन को झुकना पड़ा। अंततः सरकार ने एक गुप्त आदेश जारी किया कि लगान की वसूली केवल उन्हीं किसानों से की जाए जो इसे चुकाने में पूर्णतः सक्षम हैं।

🧠 प्रशासनिक नेतृत्व विश्लेषण (Faculty Focus on Patel):

खेड़ा सत्याग्रह इतिहास में इसलिए स्मरणीय है क्योंकि इसी आंदोलन के दौरान बैरिस्टर वल्लभभाई पटेल ने गांधी के विचारों से प्रभावित होकर अपनी चमकती हुई वकालत और सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया। उन्होंने गाँव-गाँव घूमकर किसानों का जो अद्वितीय सांगठनिक ढाँचा तैयार किया, उसी ने उन्हें भविष्य में 'सरदार' और भारत के लौह पुरुष के रूप में स्थापित करने की नींव रखी।

कड़ी 11 • 1919

रॉलेट एक्ट एवं जलियांवाला बाग नरसंहार: औपनिवेशिक क्रूरता का चरमोत्कर्ष

प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर भारतीयों को उम्मीद थी कि सरकार दमनकारी कानूनों को हटाकर उत्तरदायी शासन की दिशा में कदम बढ़ाएगी। परंतु, इसके विपरीत ब्रिटिश सरकार ने युद्धकालीन प्रतिबंधों को स्थाई बनाने और क्रांतिकारी गतिविधियों को कुचलने के लिए सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में एक काला कानून पारित किया, जिसे 'रॉलेट एक्ट' कहा जाता है। इस कानून के तहत औपनिवेशिक पुलिस को यह असीमित विधिक शक्ति दी गई कि वह किसी भी भारतीय को बिना कोई कारण बताए, बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती थी और बिना मुकदमा चलाए 2 वर्ष तक जेल में रख सकती थी। भारतीय जनता ने इसे "बिना अपील, बिना वकील, बिना दलील" का दमनकारी कानून कहा।

इस काले कानून के विरोध में पंजाब के दो सर्वप्रिय राष्ट्रवादी नेताओं—डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी के विरोध में 13 अप्रैल 1919 (वैशाखी का पावन दिन) को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक अत्यंत शांतिपूर्ण और निहत्थी जनसभा आयोजित की गई थी। अमृतसर के सैन्य कमांडर जनरल रेजिनल्ड डायर ने बख्तरबंद गाड़ियों के साथ बाग के एकमात्र संकरे निकास द्वार को अवरुद्ध कर दिया और बिना किसी पूर्व चेतावनी के निहत्थी, मासूम भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलाने का क्रूर आदेश दे दिया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 379 और वास्तविक रूप से एक हजार से अधिक देशभक्त इस नरसंहार में शहीद हो गए।

इस अमानवीय कृत्य के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई अपनी सर्वोच्च नागरिक उपाधि 'नाइटहुड' (Knighthood) को हमेशा के लिए त्याग दिया। इस घटना ने ब्रिटिश न्यायप्रियता के भ्रम को पूरी तरह समाप्त कर दिया और भावी राष्ट्रव्यापी असहयोग आंदोलन की बारूद तैयार कर दी।

कड़ी 12 • 1920

असहयोग आंदोलन: प्रथम अखिल भारतीय जन-विद्रोह का दर्शन

जलियांवाला बाग के गहरे घाव, हंटर कमेटी की लीपापोती वाली रिपोर्ट और प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन द्वारा तुर्की के सुल्तान (जिन्हें वैश्विक मुस्लिम समाज अपना धार्मिक प्रमुख 'खलीफा' मानता था) की शक्तियों को छीनने से उत्पन्न हुए 'खिलाफत आंदोलन' के तीव्र असंतोष को महात्मा गांधी ने एक अद्वितीय अवसर के रूप में देखा। उनका मानना था कि हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित कर ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक व्यापक जन-संघर्ष खड़ा करने का ऐसा अवसर आगामी सौ वर्षों में भी प्राप्त नहीं होगा। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में 1 अगस्त 1920 को औपचारिक रूप से 'असहयोग आंदोलन' का शंखनाद किया गया। संयोगवश, इसी दिन महान उग्र राष्ट्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक का निधन हुआ, जिसके बाद गांधी राष्ट्रीय आंदोलन के निर्विवाद केंद्र बन गए।

दिसंबर 1920 के कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में असहयोग के प्रस्ताव को पूर्ण वैधानिक स्वीकृति दी गई। इस अधिवेशन में कांग्रेस के सांगठनिक ढांचे में क्रांतिकारी प्रशासनिक सुधार किए गए; सदस्यता शुल्क को घटाकर मात्र 4 आना (25 पैसे) कर दिया गया ताकि देश का अत्यंत गरीब नागरिक भी इससे जुड़ सके, और प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों का गठन भाषाई आधार पर किया गया। आंदोलन की कार्यप्रणाली दो आयामी थी: नकारात्मक मोर्चा (सरकारी उपाधियों, न्यायालयों, सरकारी स्कूलों, विधान परिषदों और विदेशी वस्त्रों का पूर्ण व स्वैच्छिक बहिष्कार) तथा सकारात्मक मोर्चा (स्वदेशी वस्तुओं का निर्माण, खादी का प्रचार, चरखे का वितरण, अस्पृश्यता उन्मूलन और राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं जैसे काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ व जामिया मिलिया की स्थापना)। यह आंदोलन भारतीय इतिहास का पहला वास्तविक 'मास मूवमेंट' बना जिसने औपनिवेशिक शासन की नींव हिला दी।

कड़ी 13 • 1922

चौरी-चौरा कांड एवं असहयोग आंदोलन की आकस्मिक वापसी का रणनीतिक संकट

वर्ष 1922 के प्रारंभ तक असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था और गांधी जी ने बारडोली से 'कर न दो' (टैक्स असहयोग) का राष्ट्रव्यापी सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने की घोषणा कर दी थी। पूरा देश स्वतंत्रता की तीव्र आकांक्षा में उद्वेलित था। इसी बीच 5 फरवरी 1922 को संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक कस्बे में एक ऐतिहासिक मोड़ आया। यहाँ असहयोग प्रदर्शनकारियों के एक शांतिपूर्ण जुलूस पर स्थानीय पुलिस ने बर्बर बल प्रयोग किया। पुलिस के दमन से क्रुद्ध होकर अनियंत्रित और उत्तेजित भीड़ ने पुलिसकर्मियों को खदेड़ दिया। पुलिसकर्मी अपनी जान बचाने हेतु थाने के भीतर छिप गए, जिसके बाद भीड़ ने पूरे थाने को बाहर से बंद कर आग लगा दी। इस हिंसक घटना में 22 पुलिसकर्मी जिंदा जलकर मर गए

सत्य और अहिंसा को अपने जीवन और आंदोलन का सर्वोच्च विधिक व नैतिक मापदंड मानने वाले महात्मा गांधी इस हिंसा की खबर से गहरे सदमे में आ गए। उन्होंने माना कि भारतीय जनता अभी अहिंसा के कठिन सिद्धांतों के अनुपालन हेतु पूर्णतः प्रशिक्षित नहीं है और इस घटना को अपनी "हिमालय जैसी भूल" स्वीकार करते हुए 12 फरवरी 1922 को बारडोली में कांग्रेस कार्यसमिति की आपात बैठक बुलाकर असहयोग आंदोलन को तत्काल प्रभाव से वापस लेने की घोषणा कर दी।

👁️ समालोचनात्मक विश्लेषण (The Great Debate):

गांधी के इस आकस्मिक निर्णय से पूरे देश में घोर निराशा और वैचारिक विद्रोह फैल गया। युवा सुभाष चंद्र बोस ने अपनी पुस्तक में इसे "राष्ट्रीय संकट" (National Calamity) की संज्ञा दी क्योंकि जनता का उत्साह सातवें आसमान पर था। जेल में बंद मोतीलाल नेहरू और सी.आर. दास ने भी इस पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया। परंतु एक इतिहासकार के दृष्टिकोण से, गांधी की यह एक दीर्घकालिक रणनीति थी; वे जानते थे कि यदि आंदोलन हिंसक मार्ग पर बढ़ता, तो ब्रिटिश सरकार को अपनी आधुनिक सैन्य शक्ति और बंदूकों के बल पर आंदोलन को कुचलने का विधिक बहाना मिल जाता। आंदोलन को वापस लेकर उन्होंने राष्ट्रवादी ऊर्जा को बिखरने और दमित होने से बचा लिया।

कड़ी 14 • 1923

स्वराज पार्टी की स्थापना: विधायी मोर्चे पर एक नवीन कूटनीतिक संघर्ष

असहयोग आंदोलन की आकस्मिक समाप्ति और गांधी जी की गिरफ्तारी (मार्च 1922 में 6 वर्ष की सजा) के बाद राष्ट्रीय आंदोलन में एक गहरी रणनीतिक शून्यता उत्पन्न हो गई थी। इस शून्यता को भरने और औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष को जिंदा रखने के लिए कांग्रेस के भीतर दो भिन्न वैचारिक दृष्टिकोण उभरे। प्रथम गुट 'नो-चेंजर्स' (परिवर्तन विरोधी) कहलाया, जिसमें वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी शामिल थे; इनका मानना था कि परिषदों और चुनावों से दूर रहकर केवल ग्रामीण क्षेत्रों में रचनात्मक कार्यों (खादी, शिक्षा, नशामुक्ति) के माध्यम से भावी संघर्ष हेतु जनता को तैयार किया जाए।

द्वितीय गुट 'प्रो-चेंजर्स' (परिवर्तन समर्थक) कहलाया, जिनका तर्क था कि राजनीतिक निष्क्रियता के इस दौर में हमें 1919 के सुधारों के तहत होने वाले विधान परिषद के चुनावों में भाग लेना चाहिए और संसद के भीतर प्रवेश कर ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों और बजटों को विधिक रूप से रोकना चाहिए। उनका प्रसिद्ध सूत्र था—"परिषदों के भीतर घुसकर व्यवस्था को नष्ट करना"। दिसंबर 1922 के गया अधिवेशन में इस प्रस्ताव के गिर जाने के बाद, देशबंधु चित्तरंजन दास (सी.आर. दास) और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस के भीतर ही 1 जनवरी 1923 को 'कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी' की स्थापना की।

स्वराज पार्टी ने नवंबर 1923 के चुनावों में केंद्रीय और प्रांतीय परिषदों में भारी सफलता प्राप्त की। इस पार्टी की सबसे बड़ी प्रशासनिक और ऐतिहासिक सफलता तब सिद्ध हुई जब वर्ष 1925 में विख्यात स्वराजवादी नेता विट्ठलभाई पटेल को केंद्रीय विधान सभा का प्रथम भारतीय अध्यक्ष (स्पीकर) चुनने में सफलता मिली। स्वराजवादियों ने संसद के भीतर बजटों को रोककर, दमनकारी विधिक प्रस्तावों को परास्त करके औपनिवेशिक सरकार की निरंकुशता को दुनिया के सामने संवैधानिक रूप से बेनकाब किया।

कड़ी 15 • 1927

साइमन कमीशन का गठन: औपनिवेशिक अहंकार एवं श्वेत आयोग का संकट

वर्ष 1919 के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार अधिनियम में यह स्पष्ट विधिक अधिदेश था कि इस अधिनियम के लागू होने के ठीक दस वर्ष पश्चात (अर्थात 1929 में) ब्रिटिश क्राउन द्वारा एक वैधानिक आयोग का गठन किया जाएगा, जो भारत की संवैधानिक प्रगति और उत्तरदायी शासन की दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा करेगा। परंतु ब्रिटेन की आंतरिक राजनीति में तत्कालीन सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी को यह भय सता रहा था कि यदि आगामी आम चुनावों में लेबर पार्टी की सरकार बन गई, तो वह भारतीयों के प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाते हुए उन्हें अधिक राजनीतिक शक्तियां सौंप सकती है। अपनी इसी साम्राज्यवादी चिंताओं के कारण कंजर्वेटिव सरकार ने निर्धारित समय से दो वर्ष पूर्व ही, 8 नवंबर 1927 को 'साइमन कमीशन' के गठन की घोषणा कर दी।

इस आयोग का नेतृत्व सर जॉन साइमन कर रहे थे। इस आयोग की सबसे विवादास्पद और अपमानजनक विशेषता यह थी कि इसके सभी 7 सदस्य ब्रिटिश सांसद थे, अर्थात इसमें एक भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया था। भारत के संवैधानिक भविष्य का निर्धारण करने वाले आयोग में किसी भी भारतीय का न होना औपनिवेशिक अहंकार का चरम प्रदर्शन था, जिसे भारत के सभी राजनीतिक दलों ने अपने आत्मसम्मान और संप्रभुता पर सीधा आघात माना। इसके विरोध में मद्रास अधिवेशन (1927) में कांग्रेस ने साइमन कमीशन के पूर्ण और सर्वव्यापी बहिष्कार का विधिक संकल्प पारित किया।

कड़ी 16 • 1928

नेहरू रिपोर्ट: भारत सचिव की चुनौती एवं प्रथम स्वदेशी संवैधानिक ढाँचा

जब 3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन भारत (बंबई बंदरगाह) पहुँचा, तो पूरे देश में अभूतपूर्व हड़तालें, प्रदर्शन और आकाश गूंजा देने वाले "Simon Go Back" (साइमन वापस जाओ) के नारे लगे। देशव्यापी काले झंडों के प्रदर्शन के दौरान लाहौर में साइमन विरोधी जुलूस का शांतिपूर्ण नेतृत्व कर रहे वयोवृद्ध नेता लाला लाजपत राय पर ब्रिटिश पुलिस कैप्टन सॉन्डर्स और कमिश्नर स्कॉट के आदेश पर क्रूरतापूर्वक लाठियां बरसाई गईं। गंभीर रूप से घायल लाला जी ने अस्पताल में दम तोड़ने से पहले ऐतिहासिक गर्जना की थी: "मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की अंतिम कील साबित होगी"। इस शहादत का प्रतिशोध लेने के लिए ही भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने लाहौर कोतवाली के सामने सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी थी।

इस राष्ट्रव्यापी जनाक्रोश के बीच, तत्कालीन भारत सचिव लॉर्ड बर्कनहेड ने भारतीयों के स्वाभिमान को चुनौती देते हुए ब्रिटिश संसद में कहा कि "भारतीय केवल विरोध करना जानते हैं, उनमें स्वयं मिलकर एक सर्वसम्मत संविधान बनाने की न तो क्षमता है और न ही आपसी सहमति"। इस साम्राज्यवादी चुनौती को स्वीकार करते हुए फरवरी और मई 1928 में देश के सभी राजनीतिक दलों का एक सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित किया गया। संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक 9-सदस्यीय समिति का गठन किया गया, जिसने अगस्त 1928 में अपनी ऐतिहासिक 'नेहरू रिपोर्ट' प्रस्तुत की।

इस रिपोर्ट में पहली बार भारत के लिए विस्तृत मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) (जैसे भाषण, प्रेस, सभा बनाने और धार्मिक स्वतंत्रता), भाषाई आधार पर प्रांतों के गठन, केंद्र में पूर्ण उत्तरदायी द्विसदनीय शासन व्यवस्था और एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की रूपरेखा प्रस्तुत की गई, जो आगे चलकर स्वतंत्र भारत के संविधान की आत्मा बनी। परंतु, रिपोर्ट की मुख्य मांग 'डोमिनियन स्टेटस' (अधिराज्य का दर्जा) पर कांग्रेस की युवा समाजवादी पीढ़ी (जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस) पूरी तरह असहमत थे, वे 'पूर्ण स्वतंत्रता' से कम कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। साथ ही, पृथक निर्वाचन को समाप्त करने की सिफारिश के विरोध में मोहम्मद अली जिन्ना ने लीग की तरफ से असहमति दर्ज की और अपने '14 सूत्र' प्रस्तुत किए, जिससे सांप्रदायिक दूरी पुनः बढ़ गई।

कड़ी 17 • 1929

लाहौर अधिवेशन: 'पूर्ण स्वराज' का ऐतिहासिक उद्घोष एवं वैचारिक क्रांति

नेहरू रिपोर्ट द्वारा डोमिनियन स्टेटस स्वीकार करने के लिए ब्रिटिश सरकार को दी गई एक वर्ष की समय-सीमा दिसंबर 1929 में समाप्त हो रही थी। वायसराय लॉर्ड इरविन की घोषणाओं से यह स्पष्ट हो चुका था कि ब्रिटिश हुकूमत वास्तविक सत्ता हस्तांतरण के मूड में नहीं है। देश में क्रांतिकारी गतिविधियों (भगत सिंह द्वारा असेंबली में बम फेंकना) और वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण युवाओं और मजदूरों में भारी उबाल था। इसी ऐतिहासिक और गत्यात्मक मोड़ पर, दिसंबर 1929 में रावी नदी के तट पर पंजाब की ऐतिहासिक धरती लाहौर में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन आयोजित किया गया। महात्मा गांधी के पूर्ण समर्थन से युवा समाजवादी नेता जवाहरलाल नेहरू को इस अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया, जो भारतीय नेतृत्व में एक युगांतकारी पीढ़ीगत और वैचारिक बदलाव का प्रतीक था।

इस अधिवेशन में कांग्रेस ने नेहरू रिपोर्ट के 'डोमिनियन स्टेटस' के पुराने लक्ष्य को हमेशा के लिए दफनाते हुए ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया, जिसके अनुसार अब राष्ट्रीय आंदोलन का एकमात्र और अंतिम लक्ष्य "पूर्ण स्वराज" (Complete Independence) प्राप्त करना था। 31 दिसंबर 1929 की कड़कड़ाती ठंड की मध्यरात्रि को रावी के तट पर इंकलाब जिंदाबाद के नारों के बीच नेहरू ने स्वतंत्र भारत का तिरंगा झंडा फहराया। इस अधिवेशन में विधिक घोषणा की गई कि आगामी 26 जनवरी 1930 को पूरे भारत में प्रथम 'स्वतंत्रता दिवस' के रूप में मनाया जाएगा और प्रत्येक नागरिक पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने की शपथ लेगा। इस घटना ने स्वाधीनता संग्राम की पूरी दशा और दिशा बदल दी। इसी पवित्र 26 जनवरी की स्मृति को भारतीय इतिहास में अमर बनाए रखने के लिए ही, ठीक 20 वर्ष बाद 26 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत का संविधान पूर्णतः लागू कर देश को गणतंत्र घोषित किया गया था।

कड़ी 18 • 1930

दांडी यात्रा एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन: नमक सत्याग्रह का राजनीतिक अर्थशास्त्र

लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का संकल्प पारित करने के बाद, देश की आम जनता को औपनिवेशिक कानून के खिलाफ सीधी जंग में उतारने के लिए एक अत्यंत व्यावहारिक, सरल और सर्वव्यापी मुद्दे की आवश्यकता थी। महात्मा गांधी ने अपनी अद्वितीय रणनीतिक सूझबूझ के साथ इसके लिए 'नमक' को चुना। नमक जैसी बुनियादी मानवीय आवश्यकता पर ब्रिटिश सरकार का पूर्ण विधिक एकाधिकार था और इस पर भारी टैक्स (नमक कर) लगाया गया था, जिसके कारण गरीब से गरीब भारतीय को भी प्रकृति द्वारा दिए गए नमक के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ती थी। गांधी ने समझा कि नमक अमीर, गरीब, हिंदू, मुस्लिम, शाकाहारी, मांसाहारी सभी के भोजन का अनिवार्य हिस्सा है, अतः यह पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने और ब्रिटिश शोषण को प्रतीकात्मक रूप से उजागर करने का सबसे अचूक साधन है।

वायसराय इरविन को अपनी 11 सूत्री मांगें भेजने और कोई सकारात्मक उत्तर न मिलने पर, गांधी जी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से अपने 78 परम अनुशासित स्वयंसेवकों के साथ समुद्रतटीय गाँव दांडी के लिए अपनी विश्वप्रसिद्ध पदयात्रा प्रारंभ की। 24 दिनों की इस मैराथन यात्रा में लगभग 390 किलोमीटर की दूरी तय की गई, जिसके दौरान रास्ते में पड़ने वाले हजारों गाँवों में अभूतपूर्व देशभक्ति का ज्वार उमड़ पड़ा। 6 अप्रैल 1930 की पवित्र सुबह, गांधी ने दांडी के समुद्र तट पर बिखरे हुए नमक को मुट्ठी में उठाकर प्रतीकात्मक रूप से औपनिवेशिक नमक कानून को भंग कर दिया।

इस एक मुट्ठी नमक ने पूरे देश में 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' (Civil Disobedience Movement) की दावानल सुलझा दी। देश भर में कानून तोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया; महिलाओं ने शराब और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरने दिए, दक्षिण भारत में सी. राजगोपालाचारी ने तंजौर तट पर वेदारण्यम नमक यात्रा की, और उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी) के 'खुदाई खिदमतगार' (लाल कुर्ती दल) ने अहिंसक प्रतिरोध का अद्भुत उदाहरण पेश किया। जब गांधी जी को गिरफ्तार किया गया, तो सरोजिनी नायडू और गांधी के पुत्र मणिलाल के नेतृत्व में धरसाना नमक कारखाने पर हुए अहिंसक सत्याग्रह पर ब्रिटिश पुलिस ने बर्बरतापूर्वक लाठियां बरसाईं। अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने जब इस वीभत्स दमन की आंखों देखी रिपोर्ट वैश्विक मीडिया में प्रकाशित की, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर ब्रिटिश साम्राज्य की नैतिक साख पूरी तरह मटियामेट हो गई।

कड़ी 19 • 1931

गांधी-इरविन समझौता: साम्राज्य का आत्मसमर्पण एवं कराची अधिवेशन का द्वंद्व

सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण ब्रिटिश प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह पंगु हो चुका था, विदेशी वस्तुओं के आयात में रिकॉर्ड गिरावट आई थी और सरकारी राजस्व को भारी क्षति पहुँच रही थी। लंदन में आयोजित प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) का कांग्रेस द्वारा पूर्ण बहिष्कार किए जाने के कारण वह पूरी तरह बेअसर और विफल सिद्ध हुआ था। ब्रिटिश हुकूमत और नए वायसराय यह भली-भांति समझ चुके थे कि महात्मा गांधी और कांग्रेस के सहयोग के बिना भारत में किसी भी संवैधानिक सुधार की रूपरेखा तैयार करना असंभव है। इसी प्रशासनिक विवशता के कारण जनवरी 1931 में गांधी जी को बिना शर्त जेल से रिहा किया गया और वायसराय पैलेस में वार्ता हेतु आमंत्रित किया गया।

कई दिनों की गहन और मैराथन वार्ताओं के बाद 5 मार्च 1931 को दिल्ली में ऐतिहासिक 'गांधी-इरविन समझौता' (दिल्ली पैक्ट) संपन्न हुआ। इतिहास में पहली बार ब्रिटिश साम्राज्य के सर्वोच्च प्रतिनिधि वायसराय को झुककर कांग्रेस के नेता के साथ 'बराबरी के स्तर' (Equal Footing) पर बैठकर विधिक समझौते पर हस्ताक्षर करने पड़े, जिसने कांग्रेस को भारतीय जनता की एकमात्र सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था के रूप में स्थापित कर दिया। इसके तहत कांग्रेस ने आंदोलन स्थगित करना और लंदन में होने वाले द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेना स्वीकार किया, जबकि सरकार ने सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई और तटीय क्षेत्रों में निजी उपयोग हेतु नमक बनाने की विधिक छूट प्रदान की।

👁️ ऐतिहासिक समालोचना (The Bhagat Singh Question):

यह समझौता भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास का सबसे विवादास्पद अध्याय भी माना जाता है। देश के युवा और क्रांतिकारी धड़े में गांधी जी के प्रति भारी आक्रोश था, क्योंकि इस समझौते में गांधी जी ब्रिटिश सरकार से भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने की विधिक शर्त मनवाने में असफल रहे। अंग्रेजों ने चालाकी से केवल उन्हीं कैदियों को छोड़ने की बात कही जिन पर हिंसा का विधिक आरोप नहीं था। इसके ठीक 18 दिन बाद, 23 मार्च 1931 को इन राष्ट्रनायकों को फांसी दे दी गई। यही कारण था कि मार्च 1931 के अंत में आयोजित कांग्रेस के कराची अधिवेशन में भाग लेने जाते समय युवाओं ने गांधी जी को काले झंडे दिखाए और "गांधीवाद का नाश हो" के नारे लगाए। इस अधिवेशन की अध्यक्षता सरदार पटेल ने की, जिसमें युवाओं को शांत करने के लिए पहली बार 'मूल अधिकारों और आर्थिक नीति' का ऐतिहासिक संकल्प पारित किया गया।

कड़ी 20 • 1932

कम्युनल अवॉर्ड एवं पूना पैक्ट: सामाजिक न्याय बनाम राष्ट्रीय एकता का महासंकट

लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में डॉ. बी.आर. आंबेडकर द्वारा दलितों (Depressed Classes) के लिए पृथक निर्वाचन की मांग पर अड़ जाने और ब्रिटिश सरकार द्वारा सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देने के कारण गांधी जी अत्यंत निराश होकर भारत लौटे और उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन का द्वितीय चरण शुरू कर दिया, जिसके बाद उन्हें पुनः यरवदा जेल (पुणे) में बंद कर दिया गया। इसी बीच ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने भारत में राष्ट्रीय एकता को अंतिम रूप से छिन्न-भिन्न करने के उद्देश्य से 16 अगस्त 1932 को अपने कुख्यात 'कम्युनल अवॉर्ड' (साम्प्रदायिक पंचाट) की घोषणा कर दी। इस घोषणा के तहत मुस्लिमों और सिखों की तरह ही दलितों को भी हिंदू समाज से पृथक मानते हुए उनके लिए 'पृथक निर्वाचन पद्धति' लागू कर दी गई

जेल में बंद महात्मा गांधी ने इसे हिंदू समाज को स्थाई रूप से विभाजित करने और भारत में अस्पृश्यता उन्मूलन की सामाजिक सुधार प्रक्रिया को हमेशा के लिए दफन करने की ब्रिटिश साम्राज्य की एक गहरी चाल माना। उन्होंने इसके विरोध में 20 सितंबर 1932 से जेल के भीतर ही अपना ऐतिहासिक आमरण अनशन (Fast unto Death) प्रारंभ कर दिया। पूरे देश में भारी सामाजिक और राजनीतिक तनाव व्याप्त हो गया, क्योंकि गांधी के जीवन पर संकट गहरा रहा था। अंततः पंडित मदन मोहन मालवीय, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के कड़े प्रयासों और मध्यस्थता से डॉ. बी.आर. आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच 24 सितंबर 1932 को यरवदा जेल के भीतर ऐतिहासिक 'पूना पैक्ट' (Poona Accord) संपन्न हुआ।

⚖️ विधिक एवं संवैधानिक प्रभाव (The Bedrock of Reservation):

पूना पैक्ट का भारतीय राजव्यवस्था पर अत्यंत दूरगामी और ऐतिहासिक प्रभाव पड़ा। इसके तहत दलितों के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई 'पृथक निर्वाचन पद्धति' को पूर्णतः निरस्त कर दिया गया (जिससे हिंदू समाज का विखंडन और राष्ट्रीय आंदोलन की कमजोरी रुक गई), परंतु इसके बदले प्रांतीय विधानसभाओं में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या को पूर्व निर्धारित 71 से बढ़ाकर 148 कर दिया गया (जिससे उनका वास्तविक विधायी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ) और केंद्रीय असेंबली में भी 18% सीटें आरक्षित की गईं। इस पैक्ट ने 'संयुक्त निर्वाचन पद्धति' (Joint Electorate) को अपनाया। हमारे वर्तमान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के तहत जो लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए राजनीतिक आरक्षण की व्यवस्था है, उसकी विधिक और वैधानिक नींव इसी पूना पैक्ट में रखी गई थी।

कड़ी 21 • 1935

भारत शासन अधिनियम, 1935: आधुनिक भारतीय राजव्यवस्था का आधारभूत ढाँचा

तीनों गोलमेज सम्मेलनों के मंथन, साइमन कमीशन की रिपोर्ट और श्वेत पत्र के प्रकाशन के पश्चात ब्रिटिश संसद ने भारत में औपनिवेशिक नियंत्रण को दीर्घकालिक स्थायित्व देने और भारतीयों के प्रशासनिक असंतोष को शांत करने के उद्देश्य से ब्रिटिश इतिहास का सबसे बड़ा, जटिल और विस्तृत विधिक दस्तावेज पारित किया, जिसे 'भारत शासन अधिनियम 1935' कहा जाता है। इस विशाल अधिनियम में कुल 321 धाराएं और 10 अनुसूचियां शामिल थीं। इसकी तीन मुख्य और युगांतकारी विशेषताएं थीं: प्रथम, प्रांतीय स्तर पर 1919 से चले आ रहे द्वैध शासन (Diarchy) को पूर्णतः समाप्त कर प्रांतों को स्वायत्तता प्रदान की गई (प्रांतीय स्वायत्तता - Provincial Autonomy), जिसके तहत प्रांतों को स्वतंत्र बजटीय और प्रशासनिक अधिकार मिले। द्वितीय, केंद्र के स्तर पर द्वैध शासन को लागू किया गया, जिसमें विषयों को आरक्षित (Reserved) और हस्तांतरित (Transferred) में बांटा गया। तृतीय, एक अखिल भारतीय संघ (Federal System) और एक संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना का प्रावधान किया गया।

यद्यपि कांग्रेस और पंडित नेहरू ने इस अधिनियम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे "अनेक ब्रेकों वाली परंतु इंजन-रहित कार" और "दास्ता का नया चार्टर" कहा, क्योंकि गवर्नर-जनरल के पास वीटो की निरंकुश शक्तियां बरकरार थीं, फिर भी कांग्रेस ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने हेतु इसके तहत वर्ष 1937 में होने वाले प्रांतीय विधानसभा चुनावों में भाग लेने का व्यावहारिक निर्णय लिया। 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त करते हुए 11 में से 8 प्रांतों में अपने मंत्रिमंडलों का गठन किया और 28 माह तक शासन चलाकर भारतीयों की प्रशासनिक सक्षमता को सिद्ध किया।

🧠 प्रशासनिक संकाय विश्लेषण (The Constitutional Blueprint):

आरएएस मुख्य परीक्षा राजव्यवस्था खंड के लिए यह तथ्य सर्वोपरि है कि हमारे वर्तमान भारतीय संविधान का लगभग 65% से अधिक हिस्सा ढांचागत और प्रशासनिक रूप से इसी 1935 के अधिनियम से हूबहू या आंशिक संशोधनों के साथ लिया गया है। राज्यपाल की आपातकालीन शक्तियां, लोक सेवा आयोगों का ढाँचा (UPSC & RPSC), केंद्र-राज्य के मध्य शक्तियों का विभाजन (संघ, राज्य और समवर्ती सूचियां), और न्यायपालिका की संरचना सीधे इसी अधिनियम की देन हैं। अतः यह अधिनियम आधुनिक भारतीय राजव्यवस्था का वास्तविक माता-पिता (ब्लूप्रिंट) माना जाता है।

कड़ी 22 • 1940

अगस्त प्रस्ताव: द्वितीय विश्व युद्ध का भू-राजनीतिक संकट एवं औपनिवेशिक रियायत

सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध का विस्फोट हुआ। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय केंद्रीय विधानमंडल और निर्वाचित प्रांतीय मंत्रिमंडलों की पूर्व सहमति और विमर्श के बिना भारत को नाजी जर्मनी के खिलाफ युद्ध में शामिल घोषित कर दिया। कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र का उपहास और संप्रभुता का उल्लंघन माना और इसके विरोध में अक्टूबर-नवंबर 1939 में सभी 8 प्रांतों के कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने सामूहिक रूप से विधिक त्यागपत्र दे दिया। वर्ष 1940 तक आते-आते युद्ध में हिटलर की नाजी सेना के सामने ब्रिटेन और फ्रांस की स्थिति अत्यंत नाजुक हो गई, फ्रांस का पतन हो चुका था। इस भू-राजनीतिक संकट के दौर में भारतीय सेना का विस्तार करने और भारतीयों का वित्तीय व सैन्य सहयोग प्राप्त करना ब्रिटिश सरकार की रणनीतिक मजबूरी बन गया था।

इसी संकट के समाधान हेतु वायसराय लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को भारतीय नेताओं के समक्ष एक आधिकारिक प्रस्ताव रखा, जिसे इतिहास में 'अगस्त प्रस्ताव' कहा जाता है। इस प्रस्ताव का भारतीय संवैधानिक इतिहास में यह महत्व है कि इसके द्वारा ब्रिटिश सरकार ने पहली बार आधिकारिक रूप से और लिखित में यह स्वीकार किया कि "भारत का नया संविधान बनाना मुख्य रूप से स्वयं भारतीयों का ही अधिकार और जिम्मेदारी है"। इसके तहत युद्ध के बाद एक प्रतिनिधि संविधान सभा के गठन और भारत को 'डोमिनियन स्टेटस' देने का वादा किया गया। कांग्रेस और पंडित नेहरू ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया, क्योंकि वे अब डोमिनियन स्टेटस से बहुत आगे पूर्ण स्वतंत्रता की मांग पर अड़े थे। नेहरू ने टिप्पणी की कि डोमिनियन स्टेटस की अवधारणा "दरवाजे में जड़ी जंग लगी कील की तरह मृत" हो चुकी है। इसके विरोध में ही गांधी जी ने 'व्यक्तिगत सत्याग्रह' शुरू किया, जिसके प्रथम सत्याग्रही आचार्य विनोबा भावे बने।

कड़ी 23 • 1942

क्रिप्स मिशन एवं भारत छोड़ो आंदोलन: 'करो या मरो' का अंतिम निर्णायक जन-संग्राम

वर्ष 1942 के प्रारंभ तक द्वितीय विश्व युद्ध भारत के दरवाजों तक पहुँच चुका था। जापानी सेना ने दक्षिण-पूर्वी एशिया (सिंगापुर, म्यांमार) में ब्रिटिश सेना को बुरी तरह परास्त कर दिया था और वे असम व बंगाल की सीमाओं की ओर बढ़ रहे थे। इस गंभीर सैन्य संकट के समय अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट और चीनी नेता च्यांग काई शेक ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल पर भारी कूटनीतिक दबाव बनाया कि वे भारतीय गतिरोध को तुरंत सुलझाकर युद्ध में भारत की विशाल जनशक्ति का सक्रिय सहयोग प्राप्त करें। इस अंतरराष्ट्रीय दबाव में मार्च 1942 में ब्रिटिश कैबिनेट मंत्री सर स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में 'क्रिप्स मिशन' भारत भेजा गया। परंतु इसके प्रस्तावों में युद्ध के बाद के अस्पष्ट वादे थे और प्रांतों को संघ से अलग होने की छूट दी गई थी, जिसमें पाकिस्तान की मांग के बीज छिपे थे। महात्मा गांधी ने इसके खोखले वादों की आलोचना करते हुए इसे "एक ढहते हुए बैंक का उत्तर-तिथीय चेक" (Post-Dated Cheque on a failing bank) कहकर पूरी तरह खारिज कर दिया।

क्रिप्स मिशन की विफलता से देश में फैली घोर हताशा, आवश्यक वस्तुओं की आसमान छूती कीमतों और जापानी आक्रमण के भय के बीच, महात्मा गांधी ने साम्राज्यवादी हुकूमत के खिलाफ अपने जीवन के अंतिम और सबसे बड़े निर्णायक महासंग्राम का आह्वान किया। 8 अगस्त 1942 को बंबई के ऐतिहासिक गवालिया टैंक मैदान (जिसे अब क्रांति मैदान कहा जाता है) में कांग्रेस कार्यसमिति ने 'भारत छोड़ो' (Quit India) के ऐतिहासिक प्रस्ताव को विधिक रूप से पारित किया। इसी मंच से गांधी जी ने राष्ट्र को अपना अमर और ओजस्वी मंत्र दिया: "करो या मरो" (Do or Die), अर्थात या तो हम भारत को आज़ाद कराएंगे या इस प्रयास में अपनी जान न्योछावर कर देंगे। ब्रिटिश सरकार ने अत्यधिक घबराकर उसी रात 'ऑपरेशन थंडरबोल्ट' लागू किया और 9 अगस्त 1942 की सुबह सूरज उगने से पहले गांधी, नेहरू, पटेल, आज़ाद सहित कांग्रेस के संपूर्ण शीर्ष नेतृत्व को एक साथ गिरफ्तार कर अज्ञात जेलों में बंद कर दिया।

नेतृत्व की इस अचानक अनुपस्थिति (Leadership Vacuum) के बाद यह आंदोलन थमा नहीं, बल्कि एक स्वतःस्फूर्त जनविद्रोह (Spontaneous Mass Revolution) में बदल गया। देश की युवा पीढ़ी, छात्रों, श्रमिकों और महिलाओं ने आंदोलन की कमान संभाल ली। जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन और अरुणा आसफ अली ने भूमिगत रहकर संघर्ष का संचालन किया; उषा मेहता ने गुप्त रूप से 'आज़ाद हिंद रेडियो' का प्रसारण कर आंदोलन को वैचारिक ऊर्जा दी। देश के कई हिस्सों में ब्रिटिश प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो गया और बलिया में चित्तू पांडे, सतारा में वाई.बी. चव्हाण और तामलुक में समानांतर सरकारों (Parallel Governments) का गठन किया गया। इसी वैश्विक उथल-पुथल के बीच 1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिन्द फौज (INA) की कमान संभाली और "दिल्ली चलो" व "जय हिंद" के नारों के साथ सैन्य मोर्चे पर अंग्रेजों को हिला दिया। यद्यपि आंदोलन को क्रूर सैन्य बल से दबा दिया गया, परंतु इसने स्पष्ट कर दिया कि अब अंग्रेजों के दिन भारत में गिनती के बचे हैं।

कड़ी 24 • 1946-1950

कैबिनेट मिशन, स्वतंत्रता, रियासतों का एकीकरण एवं संविधान का विधिक निर्माण

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका था। ब्रिटेन की आर्थिक और सैन्य शक्ति का क्षरण हो चुका था, और वहाँ लेबर पार्टी के नए प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली सत्ता में आए, जो भारत को स्वतंत्रता सौंपने के विधिक पक्ष में थे। भारत के भीतर आजाद हिंद फौज के अफसरों (शाहनवाज खान, प्रेम सहगल, गुरबख्श सिंह ढिल्लों) पर लाल किले में चले मुकदमे के विरोध में उमड़े राष्ट्रव्यापी जनाक्रोश और 1946 के शाही नौसेना विद्रोह (Royal Indian Navy Mutiny) ने ब्रिटिश सरकार को यह अकाट्य रूप से समझा दिया था कि अब भारतीय सैनिकों और बंदूकों के बल पर भारत को गुलाम बनाए रखना सर्वथा असंभव है। सत्ता के शांतिपूर्ण और संवैधानिक हस्तांतरण हेतु मार्च 1946 में ब्रिटिश कैबिनेट के तीन मंत्रियों (लॉर्ड पैथिक लॉरेंस, सर स्टैफोर्ड क्रिप्स, ए.वी. अलेक्जेंडर) का उच्च-स्तरीय 'कैबिनेट मिशन' भारत भेजा गया।

कैबिनेट मिशन की सिफारिशों के आधार पर ही भारत के भविष्य का संविधान बनाने के लिए संविधान सभा (Constituent Assembly) का गठन अप्रत्यक्ष प्रांतीय चुनावों द्वारा किया गया। 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की प्रथम ऐतिहासिक बैठक संसद भवन के केंद्रीय कक्ष (Central Hall) में आयोजित की गई, जिसकी अस्थायी अध्यक्षता वरिष्ठतम सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने की। 11 दिसंबर को डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसके स्थायी अध्यक्ष चुने गए और 13 दिसंबर 1946 को पंडित नेहरू द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक 'उदेश्य प्रस्ताव' (Objective Resolution) ने संविधान निर्माण के नैतिक और दार्शनिक सिद्धांतों को तय किया। इसी बीच मोहम्मद अली जिन्ना की हठधर्मिता और लीग द्वारा शुरू की गई क्रूर 'प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस' (Direct Action Day) के कारण देश भीषण सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस गया। अंततः विवश होकर माउंटबेटन योजना के तहत देश का विभाजन स्वीकार करना पड़ा और 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, परंतु विभाजन के गहरे मानवीय घावों के साथ। इसी संक्रमण काल में सरदार वल्लभभाई पटेल ने अद्वितीय कूटनीति और 'गाजर व छड़ी' (Carrot and Stick) की प्रशासनिक नीति का उपयोग कर देश की 562 देसी रियासतों का भारत संघ में ऐतिहासिक विलय सुनिश्चित कर अखंड भारत का निर्माण किया।

संविधान सभा द्वारा संविधान के मसौदे को अंतिम विधिक रूप देने के लिए 29 अगस्त 1947 को महान कानूनविद डॉ. भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता में 7-सदस्यीय 'प्रारूप समिति' (Drafting Committee) का गठन किया गया। डॉ. आंबेडकर ने विश्व के प्रमुख संविधानों के प्रशासनिक अनुभवों का सूक्ष्म अध्ययन कर भारतीय परिस्थितियों के सर्वथा अनुकूल एक संप्रभु और विस्तृत संविधान का खाका तैयार किया, इसलिए उन्हें 'आधुनिक मनु' और भारतीय संविधान का मुख्य निर्माता (Chief Architect) कहा जाता है। कुल 2 वर्ष, 11 माह और 18 दिन के कड़े परिश्रम, 11 विस्तृत सत्रों, 165 कार्य दिवसों और व्यापक लोकतान्त्रिक बहसों के पश्चात निर्मित भारतीय संविधान को 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत और अधिनियमित किया गया। अंततः, लाहौर अधिवेशन की पूर्ण स्वराज की पावन स्मृति को अक्षुण्ण रखने हेतु 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान पूरे राष्ट्र में पूर्णतः लागू कर दिया गया और भारत विश्व का सबसे बड़ा संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य बना।

🏆 वरिष्ठ सिविल सेवा संकाय अंतिम समीक्षा पत्र (Senior Faculty Master Sheet):

आरएएस और आईएएस मुख्य परीक्षा के अभ्यर्थियों के लिए इतिहास खंड का यह अंतिम निष्कर्ष सर्वोपरि है: 1885 की स्थापना से लेकर 1950 के गणतंत्र बनने तक का यह सफर कोई आकस्मिक या बिखरा हुआ घटनाक्रम नहीं था। यह औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ क्रमिक रूप से विकसित हुई एक महान **वैधानिक और लोकतांत्रिक विकास यात्रा (Evolutionary Constitutional Process)** थी। उदारवादियों ने जहाँ विधिक संस्थाओं का ढाँचा खड़ा किया, उग्र राष्ट्रवादियों ने उसमें आत्मसम्मान और स्वदेशी की भावना भरी, क्रांतिकारियों ने अपने सर्वोच्च बलिदान से शासकों को भयभीत किया, और गांधीवादी जन-आंदोलनों ने देश के अंतिम व्यक्ति (कृषक, मजदूर, महिला) को इस राष्ट्रीय यज्ञ की समिधा बना दिया। इसी सांगठनिक और नैतिक परिपक्वता का अंतिम कानूनी और संहिताबद्ध रूप हमारा संविधान बना। मुख्य परीक्षा में उत्तर लिखते समय इतिहास की इस वैचारिक निरंतरता (Cause and Effect Hierarchy) को रेखांकित करना ही आपको शीर्ष रैंक (Topper Merit) दिलाएगा।