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लोकतंत्र की सफलता स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों पर निर्भर करती है। यदि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं होगी तो लोकतांत्रिक शासन केवल औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाएगा। इसी कारण संविधान निर्माताओं ने चुनाव प्रक्रिया को सरकार के सीधे नियंत्रण से अलग रखते हुए एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था की स्थापना की, जिसे भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India-ECI) कहा जाता है।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। 2024 के लोकसभा चुनाव में लगभग 96 करोड़ से अधिक मतदाता पंजीकृत थे। इतनी विशाल चुनावी प्रक्रिया का संचालन किसी सामान्य प्रशासनिक विभाग द्वारा संभव नहीं था। अतः संविधान सभा ने निर्वाचन आयोग को एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित किया।
संविधान सभा में डॉ. भीमराव अम्बेडकर, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर तथा अन्य सदस्यों ने इस बात पर बल दिया कि यदि चुनाव सरकार के नियंत्रण में होंगे तो सत्ताधारी दल चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इसलिए चुनावों का संचालन एक स्वतंत्र निकाय द्वारा होना चाहिए।
निर्वाचन आयोग का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग XV (Part XV) में किया गया है। यह भाग भारतीय चुनाव प्रणाली की संवैधानिक नींव प्रदान करता है।
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| अनुच्छेद 324 | निर्वाचन आयोग (स्थापना, शक्तियाँ और कार्य) |
| अनुच्छेद 325 | धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति का निर्वाचक नामावली में सम्मिलित होने के लिए अपात्र न होना और उसके द्वारा किसी विशेष निर्वाचक नामावली में सम्मिलित किए जाने का दावा न किया जाना (एक सामान्य निर्वाचक सूची) |
| अनुच्छेद 326 | लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के लिए निर्वाचनों का वयस्क मताधिकार के आधार पर होना |
| अनुच्छेद 327 | विधानमंडलों के लिए निर्वाचनों के संबंध में उपबंध करने की संसद की शक्ति |
| अनुच्छेद 328 | किसी राज्य के विधानमंडल के लिए निर्वाचनों के संबंध में उपबंध करने की उस विधानमंडल की शक्ति |
| अनुच्छेद 329 | निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन |
अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग की संवैधानिक आत्मा माना जाता है। यह आयोग को चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण प्रदान करता है।
लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधान परिषद, राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित होगा।
निर्वाचन आयोग में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित संख्या में अन्य निर्वाचन आयुक्त हो सकते हैं।
यदि अन्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किए जाते हैं तो मुख्य निर्वाचन आयुक्त आयोग का अध्यक्ष होगा।
राष्ट्रपति क्षेत्रीय आयुक्तों की नियुक्ति कर सकता है।
यह आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण उपबंध है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान होगी।
राष्ट्रपति एवं राज्यपाल आयोग को आवश्यक कर्मचारी उपलब्ध कराएंगे।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 25 जनवरी 1950 |
| मुख्यालय | निर्वाचन सदन, नई दिल्ली |
| प्रकृति | स्थायी संवैधानिक संस्था |
| राष्ट्रीय मतदाता दिवस | 25 जनवरी (शुरुआत वर्ष 2011 से) |
25 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य मतदाता जागरूकता बढ़ाना तथा नए मतदाताओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ना है।
वर्तमान में निर्वाचन आयोग में निम्न सदस्य शामिल होते हैं:
निर्णय प्रक्रिया: आयोग में सभी निर्णय सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास अन्य आयुक्तों की तुलना में कोई विशेष वीटो शक्ति नहीं होती है।
T.N. Seshan बनाम भारत संघ मामला निर्वाचन आयोग की संरचना और आंतरिक शक्तियों से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय है।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त समान संवैधानिक दर्जा और शक्तियाँ रखते हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त केवल समकक्षों में प्रथम यानी "First Among Equals" है।
संविधान का अनुच्छेद 324(2) कहता है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी, किन्तु यह नियुक्ति संसद द्वारा बनाए गए कानून के प्रावधानों के तहत होगी।
1950 से 2023 तक इस नियुक्ति प्रक्रिया के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं था। व्यवहार में राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद (प्रधानमंत्री) की सलाह पर ही नियुक्तियाँ करते थे, जिसे कार्यपालिका का एकाधिकार माना जाता था।
यह निर्णय निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता से संबंधित आधुनिक भारत का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक निर्णय है।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: संविधान पीठ ने ऐतिहासिक आदेश देते हुए कहा कि जब तक संसद इस विषय पर कोई स्पष्ट कानून नहीं बना लेती, तब तक आयुक्तों की नियुक्ति एक उच्चस्तरीय समिति की सिफारिश पर होगी, जिसमें शामिल होंगे:
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद संसद ने वर्ष 2023 में नियुक्ति प्रक्रिया को विनियमित करने हेतु एक नया कानून पारित किया।
| पद | स्थिति |
|---|---|
| प्रधानमंत्री | अध्यक्ष |
| प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री | सदस्य |
| लोकसभा में विपक्ष का नेता (या सबसे बड़े दल का नेता) | सदस्य |
खोज समिति (Search Committee): कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक खोज समिति योग्य व्यक्तियों की सूची तैयार कर चयन समिति को सौंपती है।
आलोचना का बिंदु: इस कानून में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन समिति से बाहर कर दिया गया और उनके स्थान पर कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया, जिससे समिति में कार्यपालिका का बहुमत (2:1) हो गया है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल निम्नानुसार निर्धारित है:
उदाहरण: यदि कोई व्यक्ति 63 वर्ष की आयु में निर्वाचन आयुक्त नियुक्त होता है, तो वह 6 वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं करेगा बल्कि 65 वर्ष की आयु प्राप्त करते ही (यानी 2 वर्ष बाद) सेवानिवृत्त हो जाएगा।
निर्वाचन आयोग की वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित करने हेतु मजबूत प्रावधान किए गए हैं:
अनुच्छेद 324(5) मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद की सुरक्षा प्रदान करता है। इन्हें पद से केवल उन्हीं आधारों और रीति से हटाया जा सकता है, जिससे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
अन्य निर्वाचन आयुक्तों (ECs) या क्षेत्रीय आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) की सिफारिश के बिना पद से नहीं हटाया जा सकता। यानी इन्हें हटाने के लिए राष्ट्रपति को CEC की सहमति/सिफारिश आवश्यक होती है।
| विशेषता | मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) | अन्य निर्वाचन आयुक्त (EC) |
|---|---|---|
| हटाने वाला प्राधिकारी | राष्ट्रपति | राष्ट्रपति |
| किसकी सिफारिश पर? | संसद के दोनों सदनों के विशेष प्रस्ताव पर | मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) की सलाह पर |
| प्रक्रिया का स्वरूप | कठिन (SC न्यायाधीश के समान) | सरल (CEC की लिखित सिफारिश पर सीधे) |
पक्ष में तर्क (स्वतंत्रता के मजबूत स्तंभ): संवैधानिक दर्जा प्राप्त होना, कार्यकाल की सुरक्षा, वेतन की सुरक्षा, तथा सर्वोच्च न्यायालय का निरंतर न्यायिक संरक्षण।
विपक्ष में तर्क (चुनौतियाँ): वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका का बहुमत होना, आयोग का अपना कोई स्वतंत्र प्रशासनिक सचिवालय न होना (कर्मचारियों के लिए सरकारों पर निर्भरता) और बजटीय आवंटन के लिए कानून मंत्रालय पर निर्भर होना।
अनुच्छेद 324 आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण की व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है। सामान्यतः आयोग की शक्तियों को चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
1. चुनाव कार्यक्रम घोषित करना: नामांकन, स्क्रूटनी, नाम वापसी, मतदान की तिथियां, मतगणना और परिणामों की पूरी समय-सारिणी ECI ही तय करता है।
2. चुनावों का दायरा: निर्वाचन आयोग देश में निम्नलिखित चुनाव संपन्न कराने के लिए उत्तरदायी है:
| चुनाव का प्रकार | क्या ECI चुनाव करवाता है? |
|---|---|
| लोकसभा एवं राज्यसभा | हाँ |
| राज्य विधानसभा एवं विधान परिषद | हाँ |
| राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति पद | हाँ |
| स्थानीय पंचायतें एवं नगरपालिकाएँ | नहीं (यह राज्य निर्वाचन आयोग का कार्य है) |
3. मतदाता सूची (Electoral Roll): राष्ट्रव्यापी मतदाता सूचियों का निर्माण, समय-समय पर पुनरीक्षण और नए मतदाताओं का पंजीकरण करना।
4. चुनाव अधिकारियों की नियुक्ति: चुनाव प्रबंधन हेतु रिटर्निंग ऑफिसर (RO), प्रिजाइडिंग ऑफिसर और पोलिंग ऑफिसर्स की ऑन-ड्यूटी नियुक्ति करना।
आयोग चुनाव प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए आदर्श आचार संहिता (MCC) लागू करता है, नए दलों का पंजीकरण करता है, और उम्मीदवारों के चुनावी खर्च (Expenditure) की सीमा तय कर उन पर कड़ी नजर रखता है।
1. Mohinder Singh Gill v. CEC (1978): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग के पास व्यापक अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) हैं। जहाँ कानून मौन है, वहाँ चुनाव निष्पक्ष कराने के लिए आयोग अपने विवेक से नियम बना सकता है।
2. A.C. Jose v. Sivan Pillai (1984): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आयोग की शक्तियाँ असीमित नहीं हैं। यदि संसद ने किसी विषय पर स्पष्ट कानून बनाया है, तो आयोग उसके विपरीत जाकर कार्य नहीं कर सकता।
यह चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के मार्गदर्शन के लिए आचरण के नियमों का एक स्व-नियामक समूह है।
cVIGIL मोबाइल ऐप: यह निर्वाचन आयोग द्वारा विकसित एक अभिनव ऐप है, जिसके माध्यम से आम नागरिक आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत लाइव ऑडियो/वीडियो/फ़ोटो (Geo-tagging के साथ) द्वारा सीधे आयोग को कर सकते हैं, जिस पर 100 मिनट के भीतर कार्रवाई का प्रावधान है।
1. चुनावी वित्तपोषण (Electoral Funding): चुनावों में काले धन और कॉर्पोरेट फंडिंग का प्रभाव बड़ी चुनौती है। वर्ष 2018 में शुरू की गई Electoral Bonds Scheme को सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2024 (ADR Case) में "मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन" मानते हुए पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया।
2. राजनीति का अपराधीकरण: गंभीर दागी चेहरों को संसद में आने से रोकने के लिए Lily Thomas Case (2013) के तहत प्रावधान किया गया कि 2 वर्ष या अधिक की सजा होने पर जनप्रतिनिधि की सदस्यता तुरंत समाप्त हो जाएगी।
3. Artificial Intelligence & Deep Fake: सोशल मीडिया पर फेक न्यूज, डीपफेक वीडियो और ऑडियो के माध्यम से मतदाताओं को भ्रमित करने की नई डिजिटल चुनौती उभर कर सामने आई है।
4. One Nation One Election: लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का समसामयिक विचार। इसके पक्ष में वित्तीय बचत और नीतिगत निरंतरता का तर्क दिया जाता है, जबकि संघवाद पर विपरीत प्रभाव को लेकर इसकी आलोचना भी होती है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172 और 174 में संशोधन की आवश्यकता होगी।
5. SVEEP प्रोग्राम: Systematic Voters' Education and Electoral Participation - नागरिकों को चुनावी प्रक्रियाओं के बारे में शिक्षित करने और मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए आयोग का सबसे प्रमुख सूचनात्मक अभियान है।