RAS MAINS - संवैधानिक/सांविधिक आयोग

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पाठ्यक्रम तिथि: 09-01-2026 आधारित
RAS A2Z Core Archive

QUICK INDEX MASTER TABLE

क्र. आयोग / संगठन संवैधानिक आधार / अधिनियम स्थापना तिथि / वर्ष
1भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI)अनुच्छेद 32425 जनवरी 1950
2राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोगअनुच्छेद 243K1994
3संघ लोक सेवा आयोग (UPSC)अनुच्छेद 315-3231 अक्टूबर 1926
4राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC)अनुच्छेद 31520 अगस्त 1949
5लोकपाल (Lokpal)लोकपाल अधिनियम 20132019
6राजस्थान लोकायुक्तअधिनियम 19731973
7राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW)अधिनियम 199031 जनवरी 1992
8राजस्थान राज्य महिला आयोगअधिनियम 19992000
9केंद्रीय सूचना आयोग (CIC)RTI Act 20052005
10राजस्थान राज्य सूचना आयोगRTI Act 20052005
RPSC Chronological Radar

RPSC अध्यक्षों का ऐतिहासिक कालक्रम एवं सूक्ष्म विश्लेषण

आरपीएससी द्वारा पूछे जाने वाले कूट आधारित और तथ्यात्मक प्रश्नों हेतु पूर्ण विवरण:

क्रम / पद अध्यक्ष का नाम विशिष्ट ऐतिहासिक एवं विधिक तथ्य
प्रथम अध्यक्षसर एस.के. घोषस्थापना के समय राजस्थान के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, जिन्हें प्रथम कार्यवाहक अध्यक्ष मनोनीत किया गया।
द्वितीय अध्यक्षएस.सी. त्रिपाठीप्रशासनिक ढांचा विकसित करने में प्रारंभिक योगदान।
सर्वाधिक लंबा कार्यकालडी.एस. तिवाड़ी (देवीशंकर तिवाड़ी)RPSC के इतिहास में सबसे लंबे समय तक (लगभग 8 वर्ष) अध्यक्ष रहने का अटूट रिकॉर्ड। इनके काल में आयोग अजमेर स्थानांतरित हुआ।
न्यूनतम कार्यकालपी.एस. यादव (पुष्कर सिंह यादव)RPSC के स्थायी अध्यक्षों में सबसे छोटा कार्यकाल (मात्र 41 दिन)।
प्रथम महिला सदस्य (अध्यक्ष प्रभार)श्रीमती कांता खतूरियाRPSC की सदस्य रहीं जिन्हें कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में प्रशासनिक नियंत्रण संभालने का अवसर मिला।
चर्चित आधुनिक क्रमदीपक उप्रेती $\rightarrow$ भूपेंद्र यादव $\rightarrow$ संजय कुमार श्रोत्रियआधुनिक विधिक सुधारों और पारदर्शी तकनीकी परीक्षा प्रणालियों का क्रमिक विकास।
SEC Chronological Radar

राजस्थान राज्य निर्वाचन आयुक्तों (SEC) का प्रामाणिक अनुक्रम

क्र. आयुक्त का नाम कार्यकाल / ऐतिहासिक घटनाक्रम
1 (प्रथम)अमर सिंह राठौड़1994 में पदभार ग्रहण किया। राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के प्रथम आम चुनाव इन्हीं के कुशल नेतृत्व में संपन्न हुए।
2एन.आर. भसीनमतदाता सूचियों के प्रथम चरण का कंप्यूटरीकरण संपन्न कराया।
3 (सर्वाधिक दीर्घ)इंद्रजीत खन्नाराजस्थान के पूर्व मुख्य सचिव, जिनका कार्यकाल प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण की दृष्टि से सबसे लंबा और प्रभावी रहा।
4ए.के. पाण्डेयशहरी स्थानीय निकायों में विधिक सुधार एवं आचार संहिता का कड़ा क्रियान्वयन।
5रामलुभायापंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में तकनीकी नवाचारों और EVM के व्यापक उपयोग का सूत्रपात।
6प्रेम सिंह मेहरा (P.S. Mehra)वैश्विक महामारी COVID-19 के दौर में विधिक गाइडलाइंस के साथ चुनौतीपूर्ण स्थानीय चुनाव संपन्न कराए।
7मधुकर गुप्तामतदाता जागरूकता (SVEEP) को राज्य के ग्रामीण अंचलों तक पहुँचाया।
8 (वर्तमान)सी.एस. राजनवर्तमान में राजस्थान के राज्य निर्वाचन आयुक्त का दायित्व संभाल रहे हैं।
Mains Expert Matrix

भारत बनाम राजस्थान: समरूप संगठनों का तुलनात्मक विश्लेषण

आरएएस मुख्य परीक्षा (Mains 10-Marks) के विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए सबसे महत्वपूर्ण तालिका:

विधिक बिंदु राष्ट्रीय / केंद्रीय संगठन राजस्थान राज्य स्तरीय संगठन मुख्य संरचनात्मक एवं विधिक विभेद
निर्वाचन संचालन भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI)
• संरचना: 1 CEC + 2 EC (बहु-सदस्यीय)
• कार्यकाल: 6 वर्ष / 65 वर्ष
राज. राज्य निर्वाचन आयोग (SEC)
• संरचना: केवल 1 आयुक्त (एकल सदस्यीय)
• कार्यकाल: 5 वर्ष / 65 वर्ष
• ECI एक बहु-सदस्यीय संस्था है, जबकि राजस्थान SEC पूरी तरह एकल सदस्यीय निकाय है। दोनों का कार्यक्षेत्र पूर्णतः पृथक है।
लोक सेवा भर्ती संघ लोक सेवा आयोग (UPSC)
• संरचना: अध्यक्ष + 10 सदस्य
• आयु सीमा: 65 वर्ष
राज. लोक सेवा आयोग (RPSC)
• संरचना: अध्यक्ष + 8 सदस्य
• आयु सीमा: 62 वर्ष
• RPSC के सदस्यों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष है, जबकि UPSC में यह 65 वर्ष है। RPSC सदस्यों को केवल राष्ट्रपति हटा सकते हैं।
ओम्बुड्समैन संस्थान लोकपाल (Lokpal)
• संरचना: अध्यक्ष + 8 सदस्य
• अधिकार क्षेत्र: प्रधानमंत्री (PM) शामिल हैं।
राजस्थान लोकायुक्त
• संरचना: लोकायुक्त + उप-लोकायुक्त
• अधिकार क्षेत्र: मुख्यमंत्री (CM) पूर्णतः बाहर हैं।
• राष्ट्रीय लोकपाल के दायरे में कुछ विधिक अपवादों के साथ पीएम आते हैं, परंतु राजस्थान लोकायुक्त अधिनियम 1973 के तहत सीएम को स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है।
पारदर्शिता (RTI) केंद्रीय सूचना आयोग (CIC)
• संरचना: 1 CIC + अधिकतम 10 ICs
• नियमन: केंद्र सरकार के अधीन
राज. राज्य सूचना आयोग (SIC)
• संरचना: 1 राज्य CIC + अन्य आयुक्त
• नियमन: राज्य सरकार की सेवा शर्तों के अधीन
• 2019 के RTI विधिक संशोधन के बाद दोनों की वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता केंद्र सरकार के अधीन आ गई है।
RAS A2Z Core Notes

PART-1: भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India - ECI)

1.1 संवैधानिक आधार (अनुच्छेदवार वर्गीकरण)

  • अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग की स्थापना, अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण की अंतर्निहित शक्तियां।
  • अनुच्छेद 325: धर्म, नस्ल, जाति, लिंग के आधार पर किसी भी नागरिक को निर्वाचक नामावली में नाम जोड़ने से वंचित न करने का प्रतिबंध।
  • अनुच्छेद 326: वयस्क मताधिकार (61वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 1988 द्वारा आयु सीमा को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष किया गया)।
  • अनुच्छेद 327: संसद को निर्वाचन के संबंध में विधिक नियम या कानून बनाने की शक्ति।
  • अनुच्छेद 328: राज्य विधानमंडल को अपने राज्यों के निर्वाचन के संबंध में कानून बनाने की शक्ति।
  • अनुच्छेद 329: निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप वर्जित (केवल विधिक चुनाव याचिका के माध्यम से ही चुनौती संभव)।
  • अनुच्छेद 243K: स्थानीय निकाय एवं पंचायत चुनावों के लिए राज्य निर्वाचन आयोग का विधिक प्रावधान।

1.2 स्थापना एवं संरचना का इतिहास

तिथि / वर्ष ऐतिहासिक एवं विधिक घटनाक्रम
25 जनवरी 1950ECI की स्थापना की गई (इसी गौरवमयी स्मृति में प्रतिवर्ष राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है)।
1950-1989आयोग पूर्णतः एकल सदस्यीय था, जिसमें केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) होते थे।
अक्टूबर 1989वी.पी. सिंह सरकार द्वारा पहली बार दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति की गई (अल्पकाल हेतु)।
जनवरी 1990नरसिम्हा राव सरकार ने इस व्यवस्था को पुनः बदलकर आयोग को एकल सदस्यीय कर दिया।
अक्टूबर 1993स्थायी रूप से तीन सदस्यीय निकाय (1 CEC + 2 EC) बना दिया गया, जो आज भी अनवरत जारी है।
2023 का नया नियुक्ति अधिनियम (Syllabus Upgradation)
Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023:
इसके तहत चयन समिति की संरचना को विधिक रूप से पुनर्परिभाषा दी गई है:
  1. प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
  2. एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (प्रधानमंत्री द्वारा नामित)
  3. लोकसभा में विपक्ष का नेता (LOP) या सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता
विवाद एवं न्यायिक हस्तक्षेप: इस कानून से ठीक पहले सर्वोच्च न्यायालय ने अनूप बरनवाल केस (2023) में आदेश दिया था कि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) होने चाहिए, परंतु संसद ने नया कानून बनाकर CJI को चयन समिति से बाहर कर दिया, जो विधिक हलकों में विवादास्पद रहा है।
खोज समिति (Search Committee): कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में 5 सचिवों की समिति उम्मीदवारों के नामों का सुझाव देती है।

1.3 योग्यताएं, कार्यकाल एवं सेवा शर्तें

  • योग्यताएं: संविधान में कोई स्पष्ट विधिक योग्यता का उल्लेख नहीं है। व्यावहारिक रूप से वरिष्ठ IAS अधिकारी नियुक्त होते हैं। 2023 एक्ट के अनुसार व्यक्ति भारत सरकार के सचिव पद के समकक्ष रहा हो।
  • कार्यकाल: 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो)। पद से सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्ति का कोई प्रावधान नहीं है। CEC पद पर पदोन्नत होने वाले EC का कार्यकाल मिलाकर भी कुल 6 वर्ष से अधिक नहीं हो सकता।
  • वेतन एवं सेवा शर्तें: वेतन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान (₹2,50,000/माह) होता है। सेवानिवृत्ति के बाद भारत सरकार के अधीन कोई लाभदायक पद ग्रहण नहीं कर सकते (यह विधिक नैतिक परंपरा है)। 2023 एक्ट से पहले इनका वेतन भारत की संचित निधि (Consolidated Fund) से भारित था।

1.4 पद से हटाने की विधिक प्रक्रिया

  • CEC को हटाना: केवल उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश की भांति हटाया जा सकता है। संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (2/3 उपस्थित + मतदान + कुल सदस्यों का बहुमत) द्वारा। हटाए जाने का आधार: सिद्ध कदाचार (Proved Misbehaviour) या असमर्थता (Incapacity)। राष्ट्रपति अंतिम आदेश द्वारा पद से हटाते हैं।
  • अन्य EC को हटाना: इन्हें हटाने के लिए किसी महाभियोग जैसी प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं है, राष्ट्रपति इन्हें मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) की सिफारिश पर पद से हटा सकते हैं। यह व्यवस्था CEC को अन्य EC से अधिक विधिक सुरक्षा देती है जो ECI की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है।

1.5 प्रमुख कार्य एवं शक्तियां

  1. लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभा और विधान परिषदों के चुनावों का संपूर्ण संचालन।
  2. भारत के राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति पदों के चुनावों का प्रबंधन।
  3. निर्वाचन नामावली (Electoral Rolls) तैयार करना एवं उसका समय-समय पर पुनरीक्षण।
  4. आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct - MCC) लागू करना और उसका कड़ाई से पालन कराना।
  5. राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करना एवं उन्हें चुनाव चिन्ह विधिक रूप से आवंटित करना।
  6. EVM (Electronic Voting Machine) एवं VVPAT का तकनीकी प्रबंधन।
  7. चुनाव व्यय पर निगरानी रखना तथा प्रत्याशियों की अयोग्यता संबंधी निर्णय (अनुच्छेद 103 व 192 के तहत)।
  8. चुनाव आचार संहिता का गंभीर उल्लंघन होने पर मामले राष्ट्रपति या संबंधित राज्यपाल को भेजना।
  9. परिसिमन आयोग (Delimitation Commission) के साथ मिलकर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का विधिक निर्धारण करना।
महत्वपूर्ण विधिक निर्णय व शक्तियां
अनुच्छेद 324: आयोग को अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) देता है, जहाँ कोई कानून न हो वहाँ आयोग निर्णय ले सकता है।
धारा 10A (जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951): चुनावी खर्च का ब्यौरा न देने पर भ्रष्ट आचरण के तहत अयोग्यता।
धारा 8A: चुनावी कदाचार सिद्ध होने पर अयोग्यता का निर्धारण।
Order 6 (Election Symbols Order 1968): दल-विभाजन की स्थिति में असली दल और चुनाव चिन्ह का विधिक निर्णय करने की पूर्ण शक्ति।

1.6 प्रमुख ऐतिहासिक निर्वाचन सुधार

  • 1952: पहला आम चुनाव - विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक प्रयोग।
  • 1960: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में व्यापक संशोधन।
  • 1988: मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई (61वाँ संविधान संशोधन)।
  • 1989: चुनावी इतिहास में EVM का प्रथम प्रयोगात्मक उपयोग किया गया।
  • 1993: आयोग को स्थायी रूप से तीन सदस्यीय बनाया गया एवं फोटो पहचान पत्र (Voter ID / EPIC) विधिक रूप से लागू।
  • 2003: चुनावी बॉन्ड व्यवस्था से पूर्व दान सीमाओं में महत्वपूर्ण पारदर्शिता सुधार।
  • 2004: सम्पूर्ण भारत के सभी बूथों पर पहली बार केवल EVM से मतदान संपन्न।
  • 2013: उच्चतम न्यायालय के आदेश पर मतपत्रों/EVM में **NOTA** का विकल्प विधिक रूप से प्रारंभ।
  • 2014: चुनावों में पारदर्शिता हेतु **VVPAT** (Voter Verifiable Paper Audit Trail) का प्रारंभ।
  • 2019: लोकसभा चुनाव के सभी बूथों पर अनिवार्य रूप से VVPAT का उपयोग संपन्न।
  • 2023: संसद द्वारा ऐतिहासिक मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्ति अधिनियम 2023 पारित।
RAS A2Z State Core

PART-2: राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग

2.1 संवैधानिक ढांचा एवं कानूनी आधार

  • अनुच्छेद 243K: पंचायती राज संस्थाओं (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद) के चुनावों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण।
  • अनुच्छेद 243ZA: शहरी निकायों (नगर पालिका, नगर परिषद, नगर निगम) के चुनावों का विधिक उत्तरदायित्व।
  • यह आयोग 73वें एवं 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के तहत अस्तित्व में आया।
  • राजस्थान में इसकी विधिवत स्थापना राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग अधिनियम, 1994 के तहत 1994 में की गई।

2.2 संरचना, योग्यता एवं सेवा शर्तें

  • संरचना: यह भारत निर्वाचन आयोग की भांति बहु-सदस्यीय नहीं है। यह पूर्णतः एकल सदस्यीय निकाय है, जिसमें केवल 'राज्य निर्वाचन आयुक्त' (SEC) होते हैं।
  • नियुक्ति: राज्य के राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है। व्यावहारिक रूप से वरिष्ठतम सेवानिवृत्त IAS अधिकारी नियुक्त होते हैं।
  • योग्यता: उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की अर्हता रखता हो या राज्य सरकार के विशेष सचिव स्तर का दीर्घ प्रशासनिक अनुभव हो।
  • कार्यकाल: 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो)। (विशेष ध्यान दें: ECI में कार्यकाल 6 वर्ष है, यहाँ 5 वर्ष है)।
  • वेतन: राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान वेतन और भत्ते देय हैं।
  • पद से हटाना: इसे केवल उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जैसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है (संसद के विशेष प्रस्ताव पर राष्ट्रपति द्वारा)। राज्य के राज्यपाल को इन्हें पद से हटाने का विधिक अधिकार नहीं है, जो इनकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है।

2.3 प्रमुख प्रशासनिक कार्य

  1. पंचायती राज एवं नगरीय निकायों की संपूर्ण निर्वाचन नामावली (Voter List) तैयार करना और उसका पुनरीक्षण।
  2. स्थानीय चुनावों हेतु आरक्षण का रोस्टर (Chakranukram) विधिक रूप से निर्धारित करना।
  3. चुनाव कार्यक्रमों की आधिकारिक घोषणा और अधिसूचना जारी करना।
  4. स्थानीय चुनावों में आदर्श आचार संहिता लागू करना तथा चुनावी विवादों का विधिक निपटान करना।
UPSC Premium Library

PART-3: संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission - UPSC)

3.1 अनुच्छेदवार संवैधानिक उपबंध (भाग 14 - अनुच्छेद 315 से 323)

  • अनुच्छेद 315: संघ के लिए एक संघ लोक सेवा आयोग और राज्यों के लिए राज्य लोक सेवा आयोग की स्थापना का मूल प्रावधान।
  • अनुच्छेद 316: सदस्यों की नियुक्ति, योग्यताएं एवं कार्यकाल का निर्धारण।
  • अनुच्छेद 317: लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को पद से हटाने या निलंबित करने की विधिक प्रक्रिया।
  • अनुच्छेद 318: आयोग के सदस्यों और कर्मचारियों की सेवा शर्तों के संबंध में नियम बनाने की शक्ति (राष्ट्रपति को)।
  • अनुच्छेद 319: पद पर न रहने के पश्चात आयोग के सदस्यों द्वारा सरकारी रोजगार या अन्य लाभदायक पदों को ग्रहण करने पर पूर्ण विधिक प्रतिबंध।
  • अनुच्छेद 320: लोक सेवा आयोगों के प्रमुख कर्तव्य एवं प्रशासनिक कार्यों का विस्तृत विवरण।
  • अनुच्छेद 321: लोक सेवा आयोग के कार्यों का विस्तार करने की विधिक शक्ति (संसद के पास)।
  • अनुच्छेद 322: आयोग के संपूर्ण खर्च, अध्यक्ष व सदस्यों के वेतन-भत्ते भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित होंगे।
  • अनुच्छेद 323: UPSC अपना वार्षिक प्रशासनिक प्रतिवेदन प्रतिवर्ष देश के राष्ट्रपति को सौंपेगा।

3.2 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • 1854: मैकाले रिपोर्ट (Macaulay Report) द्वारा योग्यता पर आधारित खुली सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करने का सर्वप्रथम सुझाव दिया गया।
  • 1 अक्टूबर 1926: 'ली आयोग' (Lee Commission) की सिफारिश पर भारत में प्रथम बार **Federal Public Service Commission** की स्थापना की गई। सर रॉस बार्कर (Sir Ross Barker) इसके प्रथम अध्यक्ष बने।
  • 1935: भारत शासन अधिनियम 1935 द्वारा इस आयोग को और अधिक मजबूत विधिक और कानूनी आधार प्रदान किया गया।
  • 26 जनवरी 1950: भारतीय संविधान लागू होने के साथ ही इसका नाम बदलकर **Union Public Service Commission (UPSC)** कर दिया गया और इसे पूर्ण संवैधानिक दर्जा मिला। स्वतंत्रता के पश्चात एच.के. कृपलानी (H.K. Kripalani) इसके प्रथम भारतीय अध्यक्ष बने।

3.3 संरचना, नियुक्ति एवं कार्यकाल

  • संरचना: वर्तमान में आयोग में 1 अध्यक्ष और अधिकतम 10 सदस्य होते हैं (संख्या का निर्धारण राष्ट्रपति के विवेकाधिकार पर निर्भर है)।
  • विधिक नियम (अनुच्छेद 316): आयोग के कम से कम आधे ($50\%$) सदस्य ऐसे होने अनिवार्य हैं जिन्होंने केंद्र या राज्य सरकार के अधीन न्यूनतम 10 वर्ष तक प्रशासनिक सेवा का कार्य किया हो।
  • नियुक्ति: भारत के राष्ट्रपति द्वारा केंद्रीय कैबिनेट (PM) की सलाह पर की जाती है, इसके लिए कोई संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है।
  • कार्यकाल: 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो)। पद पर कार्यकाल समाप्ति के बाद उसी पद पर पुनर्नियुक्ति नहीं हो सकती।

3.4 पद से हटाने की विधिक प्रक्रिया (अनुच्छेद 317)

राष्ट्रपति निम्नलिखित विशेष परिस्थितियों में किसी सदस्य को बिना किसी लंबी जांच के भी हटा सकते हैं: दिवालिया (Insolvent) होने पर, कार्यकाल के दौरान किसी अन्य वैतनिक रोजगार में संलग्न होने पर, या शारीरिक/मानसिक अक्षमता की स्थिति में।

'सिद्ध कदाचार' (Proved Misbehaviour) के आधार पर हटाना:
यदि कदाचार का आरोप लगता है, तो राष्ट्रपति मामले को जांच हेतु **उच्चतम न्यायालय (Supreme Court)** को भेजते हैं। उच्चतम न्यायालय विधिक जांच के बाद जो भी सलाह राष्ट्रपति को देता है, वह सलाह मानने के लिए राष्ट्रपति **पूर्णतः बाध्य** हैं। जांच के दौरान राष्ट्रपति संबंधित सदस्य को निलंबित कर सकते हैं।
RPSC Ajmer Vault

PART-4: राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC)

4.1 स्थापना, कानूनी आधार एवं प्रशासनिक नियम

  • 20 अगस्त 1949: अध्यादेश के माध्यम से RPSC की स्थापना जयपुर में की गई थी। इसके प्रथम अध्यक्ष तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश **सर एस.के. घोष** बने थे।
  • बाद में प्रशासनिक सुविधा हेतु **सत्यनारायण राव समिति** की सिफारिश पर इसके मुख्यालय को जयपुर से **अजमेर (घूघरा घाटी)** स्थानांतरित कर दिया गया।
  • 26 जनवरी 1950 से इसे पूर्ण संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। इसके प्रशासनिक कार्यों को सुचारू रूप से संचालित करने हेतु RPSC Rules, 1952 एवं Regulations, 1963 प्रभावी हैं।

4.2 संरचना, कार्यकाल एवं पद से हटाना

  • संरचना: वर्तमान में आयोग में 1 अध्यक्ष और 7 सदस्य होते हैं (कुल 8 सदस्य वर्तमान संरचना)। सदस्यों की संख्या में फेरबदल करने का विधिक अधिकार राज्य के **राज्यपाल** में निहित है। इसमें भी आधे सदस्य सरकारी सेवा से होने अनिवार्य हैं।
  • नियुक्ति: राज्य के राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है।
  • कार्यकाल: 6 वर्ष या 62 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो)। (UPSC में यह आयु सीमा 65 वर्ष है, यही सबसे बड़ा संरचनात्मक विभेद है)। पद पर पुनर्नियुक्ति नहीं हो सकती।
  • वेतन व खर्च: RPSC के अध्यक्ष और सदस्यों के वेतन-भत्ते **राजस्थान की संचित निधि (Consolidated Fund of Rajasthan)** पर भारित होते हैं।
  • हटाने का अनूठा विधिक नियम (अनुच्छेद 317): RPSC के सदस्यों की नियुक्ति तो राज्य के राज्यपाल करते हैं, परंतु 'सिद्ध कदाचार' के आधार पर इन्हें पद से हटाने की अनन्य शक्ति केवल **भारत के राष्ट्रपति** के पास है (सुप्रीम कोर्ट की विधिक जांच रिपोर्ट के बाद)। राज्यपाल जांच के दौरान केवल इन्हें निलंबित कर सकते हैं, हटा नहीं सकते, जो संस्था की विधिक स्वायत्तता की गारंटी है।

4.3 आरपीएससी के प्रमुख कार्य

  1. राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS), राजस्थान पुलिस सेवा (RPS), राजस्थान लेखा सेवा आदि हेतु संयुक्त प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन।
  2. राज्य सरकार के अधीन Class-I एवं Class-II के समस्त तकनीकी व प्रशासनिक पदों पर सीधी भर्ती व साक्षात्कार का आयोजन।
  3. विभागीय पदोन्नति समितियों (DPC) के माध्यम से अधिकारियों की पदोन्नति व सेवा नियमों पर राज्य सरकार को विधिक परामर्श देना।
National Ombudsman

PART-5: लोकपाल (Lokpal) - राष्ट्रीय सांविधिक संस्थान

5.1 वैधानिक आधार एवं विकास का इतिहास

  • यह एक गैर-संवैधानिक, **सांविधिक (Statutory) निकाय** है, जिसका गठन संसद द्वारा पारित **लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013** के तहत किया गया है।
  • यह संस्था स्वीडन के 'Ombudsman' (1809) की ऐतिहासिक अवधारणा पर आधारित है। भारत में इसके लिए प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966) मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में गठित हुआ था, जिसने लोकपाल शब्द की पुरजोर वकालत की थी (यह नाम डॉ. एल.एम.सिंघवी ने सुझाया था)।
  • वर्ष 2011 के ऐतिहासिक अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन के बाद यह कानून 2013 में पारित हुआ और 23 मार्च 2019 को देश के पहले लोकपाल (जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष) की नियुक्ति की गई।

5.2 संरचना, चयन समिति एवं योग्यताएं

  • संरचना: लोकपाल संस्थान में 1 अध्यक्ष और अधिकतम 8 सदस्य हो सकते हैं। इसमें विधिक रूप से $50\%$ सदस्यों का न्यायिक पृष्ठभूमि (Judicial) से होना अनिवार्य है, तथा शेष $50\%$ सदस्य SC/ST/OBC/अल्पसंख्यक या महिला होने आवश्यक हैं। मुख्यालय नई दिल्ली में स्थापित है।
  • योग्यताएं: अध्यक्ष पद हेतु व्यक्ति भारत का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश (CJI) होना चाहिए या उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश हो, या भ्रष्टाचार विरोधी नीति का २५ वर्षों का अनुभवी प्रख्यात विशेषज्ञ हो।
  • कार्यकाल: 5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो)। सेवानिवृत्ति के बाद ये किसी भी सरकारी रोजगार के पात्र नहीं होते।
लोकपाल की उच्च स्तरीय चयन समिति (Selection Committee)
Aअधिनियम के अनुसार, लोकपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक विशिष्ट चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है:
  1. प्रधानमंत्री (चयन समिति के अध्यक्ष)
  2. लोकसभा अध्यक्ष (Speaker)
  3. लोकसभा में विपक्ष का नेता (LOP)
  4. भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या उनके द्वारा नामित उच्चतम न्यायालय के कोई न्यायाधीश
  5. राष्ट्रपति द्वारा नामित एक प्रख्यात कानूनविद (Eminent Jurist)
खोज समिति (Search Committee): यह 8 सदस्यीय समिति उम्मीदवारों के नामों को शॉर्टलिस्ट करती है।

5.3 अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) एवं कार्यप्रणाली

  • अधिकार क्षेत्र का दायरा: लोकपाल के दायरे में **प्रधानमंत्री (PM)** भी शामिल हैं, परंतु राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश संबंधों, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे अति संवेदनशील विषयों को छोड़कर। इसके अतिरिक्त सभी केंद्रीय मंत्री, सांसद, और Group A, B, C, D के सभी सरकारी कर्मचारी इसके दायरे में आते हैं।
  • शक्तियां: इसे जांच के दौरान किसी भी केंद्रीय एजेंसी (जैसे CBI) को निर्देश देने और नियंत्रण करने की शक्ति प्राप्त है। भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति को जब्त करने की विधिक शक्ति भी इसमें निहित है।
  • वर्तमान अध्यक्ष: वर्तमान में **जस्टिस ए.एम. खानविलकर** (2024 - वर्तमान) देश के लोकपाल अध्यक्ष हैं।
State Ombudsman

PART-6: राजस्थान लोकायुक्त

6.1 कानूनी आधार, स्थापना एवं संरचना

  • राजस्थान लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973 के तहत स्थापित एक सांविधिक संस्था है। ध्यान दें: भारत में सबसे पहले लोकायुक्त संस्था महाराष्ट्र (1971) में स्थापित हुई थी।
  • संरचना: इसमें मुख्य रूप से एक लोकायुक्त (अध्यक्ष) और सहायता हेतु उप-लोकायुक्त की नियुक्ति का विधिक प्रावधान है।
  • नियुक्ति प्रक्रिया: राज्य के राज्यपाल द्वारा एक उच्च स्तरीय विधिक परामर्श के बाद की जाती है, जिसमें राज्य के मुख्यमंत्री, राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और विधानसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।
  • योग्यता: लोकायुक्त पद हेतु व्यक्ति राजस्थान उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश होना अनिवार्य है।
  • कार्यकाल: 5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो)। पद पर पुनर्नियुक्ति का विधिक निषेध है।
  • वेतन: राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समान वेतन देय होता है।

6.2 अधिकार क्षेत्र का दायरा एवं सीमाएं

  • दायरे में शामिल: राज्य सरकार के समस्त मंत्री, विधायक (MLA), जिला प्रमुख, प्रधान, और सभी लोक सेवक व आईएएस/आरएएस अधिकारी।
  • दायरे से बाहर: राज्य के **राज्यपाल**, **मुख्यमंत्री (CM)**, आरपीएससी के अध्यक्ष एवं सदस्य, न्यायपालिका के सदस्य, और राज्य निर्वाचन आयुक्त इसके विधिक दायरे से पूर्णतः बाहर हैं।
  • शक्तियां: यह लोक सेवकों के विरुद्ध स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर भी भ्रष्टाचार की जांच प्रारंभ कर सकता है। अपनी वार्षिक विधिक रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपता है जो इसे विधानसभा के पटल पर रखवाते हैं।
  • प्रमुख लोकायुक्त: जस्टिस आई.डी. दुआ (1973 - प्रथम लोकायुक्त), उप-लोकायुक्त के.पी.यू. मेनन, और वर्तमान में **जस्टिस प्रताप कृष्ण लोहरा** इस पद पर कार्यरत हैं।
National Women Cell

PART-7: राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women - NCW)

  • कानूनी आधार: संसद के **राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990** के तहत स्थापित एक सांविधिक संस्था है। इसकी स्थापना 31 जनवरी 1992 को नई दिल्ली में की गई थी। इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 14, 15 और 39 में निहित महिला कल्याण की भावना है।
  • संरचना: इसमें कुल 7 सदस्य होते हैं (1 अध्यक्ष + 5 सदस्य जिन्हें केंद्र सरकार नामित करती है + 1 सदस्य सचिव जो प्रशासनिक सेवा का वरिष्ठ अधिकारी होता है)। विधिक नियम के अनुसार, सदस्यों में कम से कम एक सदस्य SC और एक सदस्य ST वर्ग से होना अनिवार्य है।
  • नियुक्ति व हटाना: संपूर्ण नियुक्ति केंद्र सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा की जाती है। इन्हें हटाने का अधिकार भी केंद्र सरकार को ही है, इसके लिए किसी सुप्रीम कोर्ट की जांच की विधिक बाध्यता नहीं है, इसलिए इसकी स्वायत्तता यूपीएससी या चुनाव आयोग जितनी मजबूत नहीं मानी जाती।
  • कार्यकाल एवं शक्तियां: इनका कार्यकाल 3 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है। जांच के दौरान आयोग को **सिविल कोर्ट (Civil Court)** की पूर्ण विधिक शक्तियां प्राप्त होती हैं। यह महिलाओं के अधिकारों के उल्लंघन पर स्वतः संज्ञान ले सकता है तथा जेलों व सुधार गृहों का औचक निरीक्षण कर सकता है।
  • प्रमुख अध्यक्ष: जयंती पटनायक (1992 - प्रथम अध्यक्ष), गिरजा व्यास (लगातार दो कार्यकाल का रिकॉर्ड), रेखा शर्मा, और वर्तमान में विजया रहाटकर (2024 - वर्तमान) इसकी अध्यक्ष हैं।
State Women Cell

PART-8: राजस्थान राज्य महिला आयोग

  • कानूनी आधार व स्थापना: **राजस्थान राज्य महिला आयोग अधिनियम, 1999** के तहत जयपुर मुख्यालय में वर्ष 2000 में स्थापित किया गया।
  • संरचना: इसमें कुल 6 सदस्य होते हैं (1 अध्यक्ष + 4 सदस्य जिन्हें राज्य सरकार नामित करती है + 1 सदस्य सचिव)।
  • नियुक्ति व कार्यकाल: राज्य सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा ३ वर्ष के लिए नियुक्ति की जाती है।
  • प्रमुख कार्य: राज्य में महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों पर विधिक निगरानी रखना, महिला अदालतों (Mahila Nyayalaya) की स्थापना की सिफारिश करना और नीति निर्माण में राज्य सरकार को परामर्श देना।
  • प्रमुख अध्यक्ष: कांता खतूरिया (प्रथम अध्यक्ष - कॉपियों के अनुसार प्रभा ठाकुर भी उल्लेखित), और वर्तमान में **रेहाना रियाज चिश्ती** इसकी अध्यक्ष हैं।
National Transparency

PART-9: केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission - CIC)

  • कानूनी आधार: ऐतिहासिक **सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act), 2005** की धारा 12-14 के तहत स्थापित एक बेहद महत्वपूर्ण सांविधिक निकाय है। यह कानून १२ अक्टूबर २००५ से संपूर्ण देश में प्रभावी हुआ था।
  • संरचना: इसमें मुख्य रूप से 1 मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) और अधिकतम 10 सूचना आयुक्त (ICs) हो सकते हैं।
  • RTI संशोधन अधिनियम, 2019 (विधिक बदलाव): इस संशोधन के माध्यम से संसद ने पूर्व के नियमों को बदल दिया। अब मुख्य सूचना आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों का कार्यकाल और उनके वेतन-भत्ते पूरी तरह **केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित** किए जाते हैं (संशोधन से पहले इनका कार्यकाल ५ वर्ष निश्चित था और वेतन मुख्य चुनाव आयुक्त के समान था)। इस बदलाव की स्वायत्तता के हनन को लेकर काफी आलोचना हुई है।
  • पद से हटाना: दिवालियापन या मानसिक अक्षमता के आधार पर सीधे, परंतु 'सिद्ध कदाचार' के गंभीर मामलों में उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की विधिक जांच रिपोर्ट के पश्चात ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
  • शक्तियां व कार्यप्रणाली: यह अधिनियम के तहत द्वितीय अपील (Second Appeal) सुनने का सर्वोच्च विधिक मंच है। जांच के दौरान इसे सिविल कोर्ट की शक्तियां प्राप्त हैं तथा यह दोषी अधिकारियों (CPIO) पर ₹25,000 तक का जुर्माना विधिक रूप से लगा सकता है।
  • प्रमुख अध्यक्ष: वजाहत हबीबुल्लाह (2005 - प्रथम CIC), दीपक संधू (प्रथम महिला मुख्य सूचना आयुक्त), और वर्तमान में **विनोद कुमार तिवारी** (2024 - वर्तमान) मुख्य सूचना आयुक्त हैं।
State Transparency

PART-10: राजस्थान राज्य सूचना आयोग

  • कानूनी आधार व स्थापना: RTI Act 2005 की धारा 15-17 के विधिक प्रावधानों के तहत वर्ष 2005 में जयपुर मुख्यालय में स्थापित।
  • संरचना व चयन समिति: इसमें 1 मुख्य राज्य सूचना आयुक्त (CSIC) और अधिकतम 10 राज्य सूचना आयुक्त होते हैं। इनकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा एक विशिष्ट चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है, जिसमें राज्य के मुख्यमंत्री (अध्यक्ष), एक कैबिनेट मंत्री और विधानसभा में विपक्ष का नेता शामिल होते हैं।
  • कार्यकाल व वेतन: 2019 के संशोधन के बाद इनका कार्यकाल और वेतन पूरी तरह राज्य सरकार (केंद्र सरकार के विधिक निर्देशानुसार) निर्धारित करती है। पद से हटाने का अधिकार विधिक रूप से सुप्रीम कोर्ट की जांच के बाद राष्ट्रपति के पास ही सुरक्षित है।
  • प्रमुख अध्यक्ष: एम.डी. कौरानी (प्रथम अध्यक्ष), टी. श्रीनिवासन, नारायण बारेठ, और वर्तमान में **डी.बी. गुप्ता** (देवेंद्र भूषण गुप्ता) मुख्य राज्य सूचना आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं।
RAS A2Z Core Matrix

PART-11: सम्पूर्ण तुलनात्मक विधिक तालिकाएं

11.1 हटाने की प्रक्रिया का विधिक वर्गीकरण

आयोग / पद हटाने का अंतिम विधिक प्राधिकारी विशेष विधिक प्रक्रिया / आवश्यक जांच
ECI (CEC)भारत के राष्ट्रपतिसंसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत (महाभियोग की भांति)।
ECI (अन्य EC)भारत के राष्ट्रपतिकेवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) की लिखित सिफारिश पर।
Rajasthan SECभारत के राष्ट्रपतिउच्च न्यायालय के न्यायाधीश की भांति (संसद प्रस्ताव + SC जांच)।
UPSC अध्यक्ष / सदस्यभारत के राष्ट्रपतिकदाचार के मामले में उच्चतम न्यायालय (SC) की अनिवार्य विधिक जांच के बाद।
RPSC अध्यक्ष / सदस्यभारत के राष्ट्रपति**विशेष ध्यान दें:** नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, परंतु कदाचार पर हटाने की शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास (UPSC/SC जांच के बाद) है।
लोकपाल / लोकायुक्तभारत के राष्ट्रपतिउच्चतम न्यायालय के कम से कम दो न्यायाधीशों की विधिक जांच पीठ की रिपोर्ट के बाद।
NCW / NCPCRकेंद्र सरकारबिना किसी न्यायिक जांच के, दुर्व्यवहार या विधिक अक्षमता सिद्ध होने पर सीधे।
RAS A2Z High-Yield Vault

PART-12: परीक्षा में अक्सर पूछे जाने वाले तथ्य (Exam Shots)

📌 आरपीएससी फिक्स पैटर्न: प्रथम पदाधिकारी सूची
ECI प्रथम CEC: सुकुमार सेन (स्थापना तिथि 25 जनवरी 1950 = राष्ट्रीय मतदाता दिवस)।
प्रथम लोकपाल: जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष (2019)।
NCW प्रथम अध्यक्ष: जयंती पटनायक।
RTI प्रथम CIC: वजाहत हबीबुल्लाह।
RPSC प्रथम अध्यक्ष: सर एस.के. घोष (20 अगस्त 1949)।
UPSC प्रथम अध्यक्ष: सर रॉस बार्कर (1 अक्टूबर 1926)।
भारत में प्रथम लोकायुक्त: महाराष्ट्र राज्य में वर्ष 1971 में स्थापित।
⚠️ आयु सीमा का तुलनात्मक भ्रम दूर करें
70 वर्ष की आयु सीमा: केवल लोकपाल एवं लोकायुक्त संस्थानों के सदस्यों हेतु विधिक रूप से लागू है।
65 वर्ष की आयु सीमा: UPSC, ECI, NCW, NCPCR और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) हेतु मान्य है।
62 वर्ष की आयु सीमा: विशेष रूप से केवल RPSC (SPSC) के सदस्यों हेतु ही विधिक रूप से निर्धारित है।
RAS A2Z Vigilance Shield

PART-13: केंद्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission - CVC)

13.1 कानूनी आधार एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • 1962-64: भारत सरकार द्वारा गठित **के. संथानम समिति** (भ्रष्टाचार निवारण समिति) ने देश में CVC की स्थापना की पुरजोर सिफारिश की थी।
  • 11 फरवरी 1964: सरकार ने एक कार्यकारी संकल्प (Executive Resolution) पारित करके इसे एक गैर-सांविधिक निकाय के रूप में स्थापित किया।
  • विनीत नारायण बनाम भारत संघ वाद (1997): इस ऐतिहासिक वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि CVC को तुरंत मजबूत विधिक और सांविधिक दर्जा प्रदान किया जाए।
  • CVC अधिनियम, 2003: संसद द्वारा यह ऐतिहासिक कानून पारित किए जाने के बाद CVC एक पूर्ण **सांविधिक (Statutory)** संस्था बना। ध्यान दें: यह संवैधानिक संस्था नहीं है।
  • विधिक विकास: वर्ष 2003 में ही CVC को दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (DSPE / CBI) के प्रशासनिक अधीक्षण की शक्ति भ्रष्टाचार के मामलों में प्रदान की गई। चर्चित 2G स्पेक्ट्रम घोटाले में CVC की भूमिका अत्यंत अग्रणीय रही थी।

13.2 संरचना, नियुक्ति प्रक्रिया एवं सेवा शर्तें

  • संरचना: इसमें मुख्य रूप से 1 केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (अध्यक्ष) और अधिकतम 2 सतर्कता आयुक्त शामिल हो सकते हैं। मुख्यालय सतर्कता भवन, नई दिल्ली में स्थित है।
  • कार्यकाल: इसका कार्यकाल विशिष्ट रूप से **4 वर्ष या 65 वर्ष की आयु** (जो भी पहले हो) होता है। पद पर सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्ति का कोई विधिक मार्ग नहीं है। (यूपीएससी और चुनाव आयोग के 6 वर्ष से यह पृथक है, इसे कंठस्थ रखें)।
  • वेतन: केंद्रीय सतर्कता आयुक्त का वेतन और भत्ते संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के अध्यक्ष के समान (₹2,50,000/माह) होते हैं तथा यह भारत की संचित निधि से देय है।
  • चयन समिति (Selection Committee): इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक 3-सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति की सिफारिश पर की जाती है:
    1. भारत के प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
    2. केंद्रीय गृह मंत्री (Home Minister)
    3. लोकसभा में विपक्ष का नेता (LOP)
  • पद से हटाना: सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर उच्चतम न्यायालय (SC) की विधिक जांच रिपोर्ट के पश्चात ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
  • प्रमुख आयुक्त: नित्तूर श्रीनिवास राव (1964 - देश के प्रथम CVC), एन. विट्टल (जिन्होंने भ्रष्टाचारियों की सूची ऑनलाइन करके क्रांति ला दी थी), और वर्तमान में **प्रवीण कुमार श्रीवास्तव** इस पद पर कार्यरत हैं।
National Brain Trust

PART-14: नीति आयोग (National Institution for Transforming India)

14.1 स्थापना, वैधानिक स्वरूप एवं योजना आयोग से मूलभूत विभेद

  • स्थापना: 1 जनवरी 2015 को केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक कार्यकारी आदेश (Cabinet Resolution) द्वारा की गई। इसने ६५ वर्ष पुराने योजना आयोग (Planning Commission - स्थापित 15 मार्च 1950) को प्रतिस्थापित किया।
  • वैधानिक स्वरूप: यह **न तो संवैधानिक संस्था है और न ही सांविधिक संस्था**, यह विशुद्ध रूप से एक गैर-संवैधानिक **कार्यकारी निकाय (Executive Body)** है, जिसे सरकार जब चाहे आदेश द्वारा संशोधित या भंग कर सकती है।
  • दर्शन एवं दृष्टिकोण: योजना आयोग 'Top-Down' (ऊपर से नीचे) के केंद्रीकृत मॉडल पर काम करता था, जबकि नीति आयोग **'Bottom-Up' (नीचे से ऊपर)** के दृष्टिकोण पर आधारित है, जो **सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism)** को बढ़ावा देता है।
  • फंड आवंटन (सबसे बड़ा अंतर): योजना आयोग के पास राज्यों को धन और वित्तीय ग्रांट आवंटित करने की विशाल विधिक शक्ति थी, परंतु **नीति आयोग के पास धन आवंटित करने की कोई शक्ति नहीं है**। यह केवल एक Policy Think Tank के रूप में कार्य करता है।

14.2 सांगठनिक ढांचा (Full Structure)

  • पदेन अध्यक्ष (Ex-Officio Chairperson): भारत के प्रधानमंत्री इसके स्थायी अध्यक्ष होते हैं।
  • उपाध्यक्ष (Vice-Chairperson): प्रधानमंत्री द्वारा सीधे नियुक्त किया जाता है, जिसे केंद्रीय कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है। प्रथम उपाध्यक्ष: Arvind Panagariya, वर्तमान: Suman Bery।
  • CEO: भारत सरकार के सचिव स्तर का अधिकारी होता है, जिसे निश्चित कार्यकाल हेतु पीएम नियुक्त करते हैं। प्रथम CEO: Sindhushree Khullar, वर्तमान: B.V.R. Subrahmanyam।
  • शासी परिषद (Governing Council): इसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल (LG) / प्रशासक शामिल होते हैं, जो सहकारी संघवाद का मुख्य विधिक मंच है।
  • प्रमुख रिपोर्ट्स व सूचकांक: आयोग द्वारा प्रतिवर्ष SDG India Index, इंडिया इनोवेशन इंडेक्स और बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) जारी किया जाता है, जिसके आधार पर राज्यों की रैंकिंग तय होती है।
Child Rights Cell

PART-15: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR)

  • कानूनी आधार: संसद द्वारा पारित **बाल अधिकार संरक्षण आयोग (CPCR) अधिनियम, 2005** के तहत स्थापित एक सांविधिक संस्था है। इसकी कार्यात्मक स्थापना 5 मार्च 2007 को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधीन की गई थी। यह संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन (UNCRC 1989) के मानकों के अनुरूप कार्य करता है।
  • संरचना व योग्यता: इसमें कुल 7 सदस्य होते हैं (1 अध्यक्ष + 6 विशिष्ट क्षेत्रों के विशेषज्ञ सदस्य, जिनमें कम से कम दो महिलाओं का होना विधिक रूप से अनिवार्य है)। कुल 7 सदस्यीय। अधिनियम के अनुसार बाल की परिभाषा ० से १८ वर्ष तक का व्यक्ति है।
  • कार्यकाल व शक्तियां: इनका कार्यकाल 3 वर्ष (अधिकतम दो कार्यकाल या ६५ वर्ष की आयु तक, सदस्यों हेतु ६० वर्ष) होता है। जांच के दौरान आयोग को **सिविल कोर्ट (Civil Court)** की पूर्ण विधिक शक्तियां प्राप्त होती हैं।
  • प्रमुख विधिक कार्य: देश में **शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act, 2009)**, **पॉक्सो एक्ट (POCSO Act, 2012)** और किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act, 2015) के जमीनी क्रियान्वयन की विधिक निगरानी करना तथा राष्ट्रीय हेल्पलाइन **CHILDLINE (1098)** की मॉनिटरिंग करना।
  • प्रमुख अध्यक्ष: प्रो. शांता सिन्हा (2007 - प्रथम अध्यक्ष), प्रियंक कानूनगो, और वर्तमान में **उमा महेश शर्मा** इसके अध्यक्ष पद का दायित्व संभाल रहे हैं।
Human Rights Cell

PART-16: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission - NHRC)

16.1 वैधानिक आधार एवं 2019 का युगांतरकारी विधिक संशोधन

  • स्थापना: 12 अक्टूबर 1993 को **मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम (PHR Act), 1993** के विधिक प्रावधानों के तहत एक शक्तिशाली सांविधिक संस्था के रूप में की गई (यह संयुक्त राष्ट्र के पेरिस सिद्धांतों 1991 के पूर्णतः अनुरूप है)।
  • 2019 का महत्वपूर्ण संशोधन (Syllabus Upgradation): संशोधन से पूर्व केवल देश के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश (CJI) ही इसके अध्यक्ष बन सकते थे। २०१९ के संशोधन के बाद **CJI या उच्चतम न्यायालय का कोई भी सेवानिवृत्त न्यायाधीश** आयोग का अध्यक्ष बनने हेतु विधिक रूप से अर्ह है।
  • संरचना का विस्तार: इसमें 1 अध्यक्ष, 5 पूर्णकालिक सदस्य (जिनमें कम से कम एक महिला सदस्य होना अनिवार्य है) तथा कई पदेन सदस्य (Deemed Members) जैसे NCSC, NCST, NCW और २०१९ में जोड़ा गया राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) का अध्यक्ष शामिल होते हैं।
  • कार्यकाल: 5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो)। पद पर सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्ति का विधिक मार्ग अवरुद्ध है।

16.2 चयन समिति एवं विधिक सीमाएं

  • चयन समिति (देश की सबसे बड़ी समिति): राष्ट्रपति द्वारा **6-सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति** की लिखित सिफारिश पर नियुक्ति की जाती है:
    1. प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)    2. लोकसभा अध्यक्ष    3. राज्यसभा के उपसभापति
    4. केंद्रीय गृह मंत्री    5. लोकसभा में विपक्ष का नेता    6. राज्यसभा में विपक्ष का नेता
  • विधिक सीमाएं (Limitations): NHRC के पास केवल **सिफारिशी शक्तियां** हैं, इसके सुझाव सरकार पर विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं हैं। यह १ वर्ष से अधिक पुराने मामलों की जांच सामान्यतः नहीं कर सकता। सशस्त्र बलों (Armed Forces) के विरुद्ध इसे सीधे जांच का अधिकार नहीं है, यह केवल केंद्र सरकार से रिपोर्ट मांग सकता है।
  • प्रमुख अध्यक्ष: जस्टिस रंगनाथ मिश्र (1993 - प्रथम अध्यक्ष), जस्टिस के.जी. बालकृष्णन, जस्टिस अरुण मिश्रा, और वर्तमान में **जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यन** इसके अध्यक्ष हैं।
Rajasthan Revenue Apex

PART-17: राजस्थान राजस्व मंडल (Board of Revenue, Rajasthan)

17.1 विधिक आधार, प्रकृति एवं सांगठनिक ढांचा

  • कानूनी आधार: राजस्थान के एकीकरण के समय **Rajasthan Board of Revenue Act, 1949** के तहत 1 नवंबर 1949 को इसकी विधिवत स्थापना की गई थी। इसका स्थायी मुख्यालय **अजमेर** में स्थित है।
  • प्रकृति: यह राजस्थान का **सर्वोच्च राजस्व न्यायालय (Apex Revenue Court)** है। ध्यान दें: यह एक प्रशासनिक न्यायाधिकरण (Tribunal) की भांति कार्य करता है, इसके अंतिम विधिक निर्णयों को केवल **राजस्थान उच्च न्यायालय (Jodhpur/Jaipur Bench)** में रिट याचिका (Writ Petition) के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है।
  • संरचना व नियुक्ति: इसमें मुख्य रूप से 1 अध्यक्ष (President) और राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर निर्धारित निबंधक व न्यायिक/प्रशासनिक सदस्य होते हैं। इनकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य सरकार की सलाह पर की जाती है। व्यावहारिक रूप से अध्यक्ष का पद भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के वरिष्ठतम एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (ACS) रैंक के अधिकारी को सौंपा जाता है। कोई निश्चित कार्यकाल नहीं होता, यह सरकार के विवेकाधीन है।

17.2 अपीलीय क्षेत्राधिकार एवं प्रमुख विधिक कार्य

यह राज्य में भू-राजस्व प्रशासन की शीर्ष संस्था है। राजस्व मामलों में अपील का सही विधिक क्रम इस प्रकार है: नायब तहसीलदार/तहसीलदार $\rightarrow$ उप-खंड अधिकारी (SDM) $\rightarrow$ जिला कलेक्टर $\rightarrow$ राजस्व अपीलीय प्राधिकरण (RAA) $\rightarrow$ राजस्व मंडल, अजमेर.

  • अधिनियम: इसके अंतर्गत मुख्य रूप से **राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955** (Rajasthan Tenancy Act), **राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम, 1956** (Rajasthan Land Revenue Act) और राजस्थान पब्लिक डिमांड रिकवरी एक्ट, 1952 का प्रशासन व मुकदमों का निपटान किया जाता है।
  • प्रमुख कार्य: नामांतरण (Mutation) विवाद, जमाबंदी, खसरा-खतौनी संबंधी रिकॉर्ड संशोधन, नजूल व सरकारी चारागाह (Gauchar) भूमियों पर अतिक्रमण हटाने के आदेशों के विरुद्ध अंतिम विधिक अपीलें सुनना।
RAS A2Z High-Value Quiz

PART-18: परीक्षा उपयोगी अद्यतन अभ्यास प्रश्न (MCQs)

Q1. निम्नलिखित में से कौन-सा विधिक क्षेत्राधिकार राजस्थान लोकायुक्त के दायरे में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं है?

(a) राज्य के कैबिनेट मंत्री    (b) जिला प्रमुख एवं प्रधान    (c) राज्य के मुख्यमंत्री (CM)    (d) राजस्थान के विधायक (MLAs)

उत्तर: (c) व्याख्या: राजस्थान लोकायुक्त अधिनियम 1973 के तहत राज्य के मुख्यमंत्री, राज्यपाल और आरपीएससी के सदस्यों को लोकायुक्त के विधिक क्षेत्राधिकार से पूर्णतः बाहर रखा गया है।

Q2. आरपीएससी (RPSC) के अध्यक्षों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. आरपीएससी के प्रथम अध्यक्ष सर एस.के. घोष थे।
2. आयोग के इतिहास में सबसे लंबा कार्यकाल देवीशंकर तिवाड़ी का रहा है।

(a) केवल कथन 1 सत्य है    (b) केवल कथन 2 सत्य है    (c) कथन 1 और 2 दोनों सत्य हैं    (d) दोनों कथन असत्य हैं

उत्तर: (c) व्याख्या: दोनों कथन विधिक रूप से सत्य हैं। सर एस.के. घोष प्रथम और डी.एस. तिवाड़ी सर्वाधिक ८ वर्ष तक रहने वाले अध्यक्ष हैं।

Q3. केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) को किस ऐतिहासिक वाद में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पश्चात सांविधिक दर्जा देने का विधिक मार्ग प्रशस्त हुआ?

(a) अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ    (b) विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1997)    (c) पी.जे. थॉमस वाद    (d) विशाखा बनाम राजस्थान राज्य

उत्तर: (b) व्याख्या: विनीत नारायण वाद 1997 में सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश के बाद संसद ने वर्ष 2003 में CVC अधिनियम पारित करके इसे सांविधिक दर्जा दिया।

Q4. नीति आयोग और भूतपूर्व योजना आयोग के मध्य विधिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से सबसे बड़ा संरचनात्मक विभेद क्या है?

(a) नीति आयोग के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं।    (b) योजना आयोग एक थिंक टैंक मात्र था।    (c) नीति आयोग के पास धन/फंड आवंटित करने की कोई विधिक शक्ति नहीं है।    (d) दोनों संगठनों का गठन संसद के अधिनियम द्वारा हुआ था।

उत्तर: (c) व्याख्या: नीति आयोग केवल एक Policy Think Tank है, इसके पास योजना आयोग की भांति राज्यों को वित्तीयकाफी ग्रांट या फंड आवंटित करने की कोई विधिक शक्ति नहीं है।

Q5. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की नियुक्ति करने वाली उच्च स्तरीय चयन समिति में कुल कितने सदस्य शामिल होते हैं?

(a) 3 सदस्य    (b) 4 सदस्य    (c) 5 सदस्य    (d) 6 सदस्य

उत्तर: (d) व्याख्या: NHRC की चयन समिति देश की सबसे बड़ी ६-सदस्यीय नियुक्ति समिति है, जिसमें पीएम, गृहमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा उपसभापति और दोनों सदनों के विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।