भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था

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1. भारतीय संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (1773 - 1947)

भारतीय संवैधानिक प्रावधानों की ऐतिहासिक जड़ें ब्रिटिश शासन काल के दो अलग-अलग चरणों से विकसित हुई हैं:

क) ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन अधिनियम (1773 - 1858)

  • Regulating Act, 1773: भारत में ब्रिटिश प्रशासन का पहला मील का पत्थर था। इसके द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया और सहायता के लिए एक 4-सदस्यीय कार्यकारी परिषद बनाई गई।
  • Act of Settlement, 1781: रेगुलेटिंग एक्ट की न्यायपालिका और कार्यपालिका के मध्य की कमियों और विसंगतियों को दूर करने के लिए पारित किया गया।
  • Pitts India Act, 1784: कंपनी के राजनीतिक और व्यापारिक कार्यों को पूरी तरह अलग किया गया। व्यापारिक मामलों हेतु 'Court of Directors' और राजनीतिक मामलों के नियंत्रण हेतु 'Board of Control' बनाया गया।
  • Charter Act, 1813: इसके तहत कंपनी के भारतीय व्यापारिक एकाधिकार को आंशिक रूप से समाप्त किया गया (केवल चाय और चीन के व्यापार को छोड़कर)। भारत में ईसाई मिशनरियों को धर्म प्रचार की अनुमति मिली।
  • Charter Act, 1833: इसके तहत बंगाल का गवर्नर-जनरल अब संपूर्ण 'भारत का गवर्नर-जनरल' बना। कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूरी तरह समाप्त कर दिए गए और यह विशुद्ध रूप से प्रशासनिक निकाय बनी।
  • Charter Act, 1853: गवर्नर-जनरल की परिषद के विधायी और कार्यपालिका कार्यों को प्रथक किया गया। सिविल सेवा के लिए खुली प्रतियोगिता परीक्षा की नींव रखी गई।

ख) ब्रिटिश क्राउन / शासन के अधीन अधिनियम (1858 - 1947)

  • भारत शासन Act, 1858: 1857 की क्रांति के बाद कंपनी शासन समाप्त हुआ, सत्ता सीधे ब्रिटिश क्राउन को गई। भारत के गवर्नर-जनरल को **'वायसराय'** कहा जाने लगा तथा 'भारत सचिव' का पद सृजित हुआ।
  • भारत परिषद अधिनियम (1861, 1892, 1909): 1861 में विभागीय प्रणाली शुरू हुई। 1909 के एक्ट (मार्ले-मिन्टो सुधार) ने मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorate) की शुरुआत कर साम्प्रदायिकता को वैधानिक रूप दिया।
  • भारत शासन अधिनियम, 1919 (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार): इसके द्वारा प्रांतों में 'द्वैध शासन' लागू हुआ। केंद्र में द्विसदनीय विधानपालिका की स्थापना की गई:
    • उच्च सदन (राज्य परिषद - Council of State): कुल 60 सदस्य, जिसमें 33 निर्वाचित व 27 मनोनीत थे। कार्यकाल 5 वर्ष था। (इसकी धारा 18 के तहत सरकारी सदस्यों की अधिकतम संख्या 20 हो सकती थी)।
    • निम्न सदन (केन्द्रीय विधानसभा - CLA): कुल 145 सदस्य, जिसमें 104 निर्वाचित व 41 मनोनीत (26 सरकारी सदस्यों सहित) थे। कार्यकाल 3 वर्ष निर्धारित था (धारा 19 के तहत)।
  • भारत शासन अधिनियम, 1935: इसके द्वारा प्रांतों से द्वैध शासन समाप्त कर उन्हें 'प्रांतीय स्वायत्तता' दी गई। केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का विभाजन संघ, राज्य और समवर्ती सूचियों में हुआ। वर्तमान संविधान के अनुच्छेद 123 में वर्णित राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति मुख्य रूप से इसी अधिनियम की धारा 42 और 43 पर टिकी हुई है।

2. संविधान के भाग और उनके विषय

मूल संविधान के सभी 22 भागों का अनुच्छेदवार पूर्ण वर्गीकरण निम्नलिखित है:

भाग (Part) संविधान का विषय (Subject Matter) संबंधित अनुच्छेद (Articles)
भाग 1संघ और उसका राज्यक्षेत्र1 - 4
भाग 2नागरिकता5 - 11
भाग 3मूल अधिकार (Fundamental Rights)12 - 35
भाग 4राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP)36 - 51
भाग 4(क)मूल कर्तव्य (42वें संशोधन द्वारा स्थापित)51 (क)
भाग 5संघ सरकार (केंद्र स्तर)52 - 151
भाग 6राज्य सरकार (राज्य स्तर)152 - 237
भाग 7प्रथम अनुसूची के भाग ख के राज्यनिरसित (7वें संशोधन 1956 द्वारा)
भाग 8संघ राज्य क्षेत्र (UTs)239 - 242
भाग 9पंचायतें (73वें संशोधन, 1992 द्वारा)243 - 243 (ण)
भाग 9(क)नगरपालिकाएं (74वें संशोधन, 1992 द्वारा)243 (त) - 243 (य छ)
भाग 9(ख)सहकारी समितियां (97वें संशोधन द्वारा)243 (य ज) - 243 (य n) [243-ZH to 243-ZT]
भाग 10अनुसूचित और जनजाति क्षेत्र244 - 244 (क)
भाग 11संघ और राज्यों के बीच संबंध245 - 263
भाग 12वित्त, संपत्ति, संविदाएं और वाद264 - 300 (क)
भाग 13भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर व्यापार, वाणिज्य एवं समागम301 - 307
भाग 14संघ और राज्यों के अधीन सेवाएं308 - 323
भाग 14(क)अधिकरिकी निकाय (Tribunals)323 (क) - 323 (ख)
भाग 15निर्वाचन (Elections)324 - 329 (क)
भाग 16कुछ वर्गों (SC, ST, OBC) के संबंध में विशेष उपबंध330 - 342
भाग 17राजभाषा (Official Languages)343 - 351
भाग 18आपात उपबंध (Emergency Provisions)352 - 360
भाग 19प्रकीर्ण (Miscellaneous)361 - 367
भाग 20संविधान का संशोधन368
भाग 21अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध369 - 392
भाग 22संक्षिप्त नाम, प्रारंभ, हिंदी में प्राधिकृत पाठ और निरसन393 - 395

3. अंतरिम सरकार एवं स्वतंत्र भारत का प्रथम मंत्रिमंडल (1946 - 1947)

प्रशासन और विभागों के क्रमिक हस्तांतरण को समझने के लिए इस प्रीमियम तालिका का उपयोग करें:

सदस्य व्यक्तित्व अंतरिम सरकार विभाग (2 Sep 1946) स्वतंत्र भारत प्रथम मंत्रिमंडल (15 Aug 1947)
जवाहरलाल नेहरूपरिषद के उपाध्यक्ष, विदेशी मामले व राष्ट्रमंडलप्रधानमंत्री, विदेशी मामले व वैज्ञानिक शोध
सरदार वल्लभभाई पटेलगृह, सूचना एवं प्रसारणगृह, सूचना व प्रसारण, राज्यों के मामले
डॉ. राजेंद्र प्रसादखाद्य एवं कृषिखाद्य एवं कृषि
मौलाना अबुल कलाम आजाद--शिक्षा विभाग
डॉ. जॉन मथाईउद्योग एवं आपूर्तिरेलवे एवं परिवहन
आर.के. शणमुखम चेट्टी--वित्त विभाग (प्रथम वित्त मंत्री)
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर--विधि (कानून मंत्री)
जगजीवन रामश्रम विभागश्रम विभाग
सरदार बलदेव सिंहरक्षा विभागरक्षा विभाग
राजकुमारी अमृत कौर--स्वास्थ्य (प्रथम महिला कैबिनेट मंत्री)
लियाकत अली खाँवित्त विभाग (मुस्लिम लीग कोटा)--
जोगेंद्र नाथ मंडलविधि विभाग (मुस्लिम लीग कोटा)--
अब्दुर रब निश्तारसंचार (रेलवे/डाक) (लीग कोटा)--
सी.एच. भाभाकार्य, खान एवं ऊर्जावाणिज्य विभाग
रफी अहमद किदवई--संचार विभाग
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी--उद्योग एवं आपूर्ति
लीग का प्रवेश तथ्य: मुस्लिम लीग शुरुआत में अंतरिम सरकार में शामिल नहीं हुई थी, वह बाद में 26 अक्टूबर 1946 को अपने 5 सदस्यों के साथ इसमें प्रवेश की थी।

4. संविधान सभा, दलीय स्थिति एवं निर्माण प्रक्रिया

संविधान सभा की मांग और उसके गठन का दलीय विश्लेषण विस्तृत आंकड़ों के साथ नीचे स्पष्ट है:

क) मांग का क्रमिक इतिहास

  • 1934: वामपंथी नेता एम.एन. रॉय (M.N. Roy) ने पहली बार औपचारिक रूप से संविधान सभा के गठन का विचार रखा।
  • 1935: कांग्रेस ने पहली बार आधिकारिक मांग रखी, जिसकी पुष्टि 1936 के फैजपुर अधिवेशन में की गई।
  • 1946: कैबिनेट मिशन योजना के तहत प्रातिनिधिक आधार पर गठन तय हुआ (प्रति 10 लाख की आबादी पर 1 सीट)।

ख) सीटों का गहन दलीय व सामाजिक विश्लेषण (टॉपर लेवल स्पेशल)

मूल सदस्य संख्या 389 तय थी। 296 निर्वाचित सीटों पर चुनावी परिणाम तथा सामाजिक विभाजन इस प्रकार था:

दलीय स्थिति (296 सीटें):
  • कांग्रेस: 208 सीटें
  • मुस्लिम लीग: 73 सीटें
  • निर्दलीय (Independent): 08 सीटें
  • यूनियनिस्ट पार्टी / यूनियनिस्ट मुस्लिम: 1-1 सीट
  • कृषक प्रजा पार्टी / कम्युनिस्ट: 1-1 सीट
  • शेड्यूल कास्ट फेडरेशन: 1 सीट
सामाजिक/जातीय विभाजन (296 सीटें):
  • सामान्य वर्ग सीटें: 210 | मुस्लिम: 78 | सिख: 04
  • वास्तविक हिंदू सदस्य: 163 | मुस्लिम: 80
  • अनुसूचित जाति (SC): 31 सदस्य
  • भारतीय ईसाई: 06 | पिछड़ी जनजातियाँ (ST): 06
  • एंग्लो-इंडियन: 03 | पारसी: 03
🔄 विभाजन के बाद पुनर्गठन (31 दिसंबर 1947 को वास्तविक स्थिति)

देश विभाजन के बाद कुल सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई, जिसमें प्रांतों के 229 और रियासतों के 70 प्रतिनिधि थे।

  • प्रांतीय प्रभुत्व: अकेले संयुक्त प्रांत (UP) के पास सर्वाधिक 55 सीटें थीं। इसके बाद मद्रास (49) का स्थान था।
  • देशी रियासतों का प्रभुत्व: रियासतों की 70 सीटों में सर्वाधिक प्रतिनिधित्व मैसूर रियासत (7 सदस्य) का और उसके बाद त्रावणकोर (6 सदस्य) का था।

ग) मुख्य तिथियां, वाचन एवं प्रारूप समिति के छुपे हुए तथ्य

  • 09 दिसंबर 1946 (प्रथम बैठक): केवल 207 सदस्यों (9 महिलाओं सहित) ने भाग लिया। सबसे बुजुर्ग सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष चुना गया।
  • 11 दिसंबर 1946: डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्थायी अध्यक्ष चुने गए।
  • 13 दिसंबर 1946: नेहरू द्वारा उद्देश्य प्रस्ताव पेश, जो 22 जनवरी 1947 को पारित हुआ।
  • प्रारूप समिति (Drafting Committee): गठन 29 अगस्त 1947 को डॉ. अम्बेडकर की अध्यक्षता में हुआ। प्रथम प्रारूप फरवरी 1948 में तथा द्वितीय अक्टूबर 1948 में आया। समिति ने कार्य पूरा करने में 6 माह से भी कम समय लिया और इस दौरान कुल **141 बैठकें** हुईं।
  • हस्ताक्षर (24 जनवरी 1950): अंतिम बैठक में मौजूद 284 सदस्यों (8 महिलाओं सहित) ने संविधान पर हस्ताक्षर किए। कुल 15 महिला सदस्यों में से केवल 8 इस दिन मौजूद थीं।
  • राजस्थान का गौरव: राजस्थान से कुल 12 सदस्य थे। उदयपुर के बलवंत सिंह मेहता संविधान की मूल प्रति पर हस्ताक्षर करने वाले राजस्थान के पहले व्यक्ति थे। अजमेर-मेरवाड़ा से मुकुट बिहारी भार्गव थे।

5. प्रस्तावना (Preamble), न्यायिक वाद एवं शब्दों की पूर्ण व्याख्या

प्रस्तावना के शब्दों और उनसे जुड़े सुप्रीम कोर्ट के वादों का गहन विश्लेषण:

क) प्रस्तावना से जुड़े ऐतिहासिक वाद (Preamble Case Laws)

बेरुबारी यूनियन वाद (1960):

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि प्रस्तावना संविधान निर्माताओं के विचारों की कुंजी तो है, लेकिन यह **संविधान का भाग नहीं है**। इसलिए इसमें संशोधन नहीं किया जा सकता।

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973):

13 जजों की सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ ने पुराना फैसला पलटा और कहा कि **प्रस्तावना संविधान का अभिन्न भाग है**। इसमें संशोधन संभव है बशर्ते इसका "मूल ढांचा" (Basic Structure) नष्ट न हो।

एस.आर. बोम्मई वाद (1994) & एल.आई.सी. वाद (1995):

सुप्रीम कोर्ट ने पुनः पुष्टि की कि प्रस्तावना संविधान का आंतरिक हिस्सा है और इसमें वर्णित "पंथनिरपेक्षता" बुनियादी ढांचा है।

ख) प्रस्तावना के 10 मुख्य शब्दों की प्रामाणिक प्रशासनिक व्याख्या

  1. हम भारत के लोग: स्पष्ट करता है कि भारतीय संविधान का मूल स्रोत और उसकी संप्रभुता का अंतिम केंद्र भारत की जनता है।
  2. संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न (Sovereign): भारत अपने आंतरिक और बाह्य सभी मामलों में पूर्णतः स्वतंत्र है, किसी विदेशी सत्ता के अधीन नहीं है।
  3. समाजवादी (Socialist): 42वें संशोधन (1976) द्वारा जुड़ा। यह 'लोकतांत्रिक समाजवाद' है जिसका लक्ष्य गरीबी, अवसर की असमानता और बीमारी को मिटाना है।
  4. पंथनिरपेक्ष (Secular): 42वें संशोधन द्वारा स्थापित। राज्य का अपना कोई राजकीय धर्म नहीं होगा, सभी धर्मों को समान आदर (सर्वधर्म समभाव) मिलेगा।
  5. लोकतंत्रात्मक: शासन की ऐसी प्रणाली जहाँ संप्रभु शक्ति जनता के हाथ में है और संसदीय लोकतंत्र के माध्यम से प्रतिनिधि शासन चलाते हैं।
  6. गणराज्य (Republic): राज्य का सर्वोच्च प्रमुख (राष्ट्रपति) वंशानुगत नहीं होगा, बल्कि जनता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से निश्चित समय के लिए चुना जाएगा।
  7. न्याय (Justice): तीन स्तरों पर सुनिश्चित—सामाजिक (भेदभाव का अंत), आर्थिक (संपदा असमानता का अंत) और राजनीतिक (समान अधिकार)।
  8. स्वतंत्रता (Liberty): पांच प्रकार की सुरक्षा—विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता।
  9. समता (Equality): समाज के किसी वर्ग को विशेष विशेषाधिकार नहीं। इसमें "प्रतिष्ठा और अवसर की समता" निहित है।
  10. बंधुता (Fraternity): भाईचारे की भावना जो दो बातों को संभालती है—व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता व अखंडता ('अखंडता' शब्द 42वें संशोधन द्वारा जुड़ा)।

6. संविधान संशोधन प्रक्रिया: अनुच्छेद 368 (भाग 20)

संविधान संशोधन की बारीक नियम कायदे और व्यावहारिक प्रकार:

क) संशोधन की क्रमिक चरणबद्ध प्रक्रिया

  • विधेयक की शुरुआत: संशोधन प्रस्ताव केवल संसद के किसी भी सदन (LS या RS) में पेश हो सकता है, राज्य विधानमंडलों में नहीं।
  • पूर्व-मंजूरी: इसके लिए राष्ट्रपति की **पूर्व अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं** होती। इसे किसी मंत्री या गैर-सरकारी सदस्य द्वारा लाया जा सकता है।
  • विशेष बहुमत नियम: दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग अपने विशेष बहुमत (कुल सीटों का $50\%$ से अधिक तथा उपस्थित व मत देने वालों का $2/3$) से पारित होना अनिवार्य है।
  • संयुक्त बैठक का अभाव: दोनों सदनों में गतिरोध होने पर **संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुलाने का कोई उपबंध नहीं है**।
  • राष्ट्रपति की बाध्यता: 24वें संशोधन (1971) द्वारा यह कानून बनाया गया कि राष्ट्रपति संशोधन बिल पर वीटो नहीं कर सकते, न ही पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं; उन्हें सहमति देनी ही होगी।

ख) संशोधन प्रक्रिया की आलोचना व कमियां (Mains Special)

  • अमेरिका की तरह भारत में संशोधन के लिए कोई विशेष 'संवैधानिक कन्वेंशन या परिषद' नहीं है।
  • राज्यों के पास संशोधन शुरू करने की कोई शक्ति नहीं है, वे केवल संसद द्वारा भेजे गए बिल को पास या फेल कर सकते हैं।
  • राज्यों को बिल की मंजूरी देने के लिए संविधान में **कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है**।

7. महत्वपूर्ण संविधान संशोधन अधिनियम (1st से 105th)

टॉपर लेवल के लिए हर एक संशोधन की गहरी व्याख्या:

  • 1st CAA (1951): भूमि सुधार कानूनों को कोर्ट की समीक्षा से बचाने के लिए 9वीं अनुसूची जोड़ी गई। अनुच्छेद 15(4) जोड़कर पिछड़ों के लिए विशेष अवसर और 19(2) में भाषण स्वतंत्रता पर 'लोक व्यवस्था' के आधार पर प्रतिबंध लगाया गया।
  • 7th CAA (1956): राज्यों का पुराना क, ख, ग, घ वर्गीकरण समाप्त। भारत को 14 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित किया गया।
  • 21st CAA (1967): सिंधी भाषा को 8वीं अनुसूची में 15वीं आधिकारिक भाषा बनाया गया।
  • 24th & 25th CAA (1971): गोलकनाथ केस को पलटने के लिए संसद को मूल अधिकारों सहित किसी भी भाग को बदलने की असीम शक्ति दी गई। अनुच्छेद 31(C) जोड़ा गया कि 39(B) और 39(C) के निदेशक तत्वों को लागू करने वाली विधि को मूल अधिकारों के उल्लंघन पर अमान्य नहीं किया जा सकता।
  • 26th CAA (1971): भूतपूर्व राजाओं के प्रिवी पर्स (Privy Purses) और विशेष उपाधियाँ पूर्णतः समाप्त।
  • 42nd CAA (1976 - लघु संविधान): प्रस्तावना में 'समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता' जुड़े। भाग 4(क) में 10 मूल कर्तव्य जोड़े गए। लोकसभा/विधानसभा कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 वर्ष किया गया। शिक्षा, वन सहित 5 विषय समवर्ती सूची में डाले गए। राष्ट्रपति शासन की एक बार की सीमा 6 से बढ़ाकर **12 माह** की गई।
  • 44th CAA (1978): संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार से हटाकर अनुच्छेद 300(क) में कानूनी अधिकार बनाया गया। 'आंतरिक अशांति' की जगह 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द आया। आपातकाल में भी अनुच्छेद 20-21 के निलंबन पर रोक। लोकसभा कार्यकाल पुनः 5 वर्ष हुआ तथा विधानसभाओं में **गणपूर्ति (Quorum - 1/10)** को बहाल किया गया।
  • 52nd CAA (1985): दलबदल रोकने के लिए 10वीं अनुसूची जोड़ी गई। इसमें मूल रूप से **1/3 सदस्यों** के टूटने को विभाजन के रूप में कानूनी मान्यता थी।
  • 61st CAA (1989): मतदान की न्यूनतम आयु सीमा 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई।
  • 71st CAA (1992): 8वीं अनुसूची में तीन भाषाएं—कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली जुड़ीं।
  • 73st & 74th CAA (1992): पंचायती राज (11वीं अनुसूची - 29 विषय) और शहरी निकायों (12वीं अनुसूची - 18 विषय) को संवैधानिक दर्जा।
  • 81st & 85th CAA (2000-2001): बैकलॉग रिक्तियों पर 50% सीमा का अंत तथा SC/ST के लिए पदोन्नति में **'परिणामिक वरिष्ठता' (Consequential Seniority)** का सिद्धांत लागू।
  • 86th CAA (2002): अनुच्छेद 21(A) के तहत शिक्षा मूल अधिकार बना। 11वां मूल कर्तव्य जुड़ा। अनुच्छेद 45 की भाषा बदली गई: इसके तहत '6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की शुरुआती देखभाल और शिक्षा' का राज्य प्रयास करेगा।
  • 91st CAA (2003): मंत्रिपरिषद का आकार लोकसभा/विधानसभा की कुल सीटों के **अधिकतम 15%** तय। दलबदल के पुराने 1/3 विभाजन नियम को खत्म कर केवल **2/3 सदस्यों के विलय** को मान्यता दी गई।
  • 92nd CAA (2003): 8वीं अनुसूची में चार भाषाएं—बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली शामिल की गईं।
  • 97th CAA (2011): सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा, नया **भाग 9(ख)** जोड़ा गया।
  • 101st & 102nd CAA (2016-2018): 101वें द्वारा GST लागू (Art. 279A). 102वें द्वारा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को संवैधानिक दर्जा (Art. 338B).
  • 103rd & 104th CAA (2019): 103वें द्वारा सवर्णों को **(EWS) 10% आरक्षण** (Art. 15(6) & 16(6)). 104वें द्वारा SC/ST आरक्षण 2030 तक बढ़ा, एंग्लो-इंडियन मनोनयन समाप्त।
  • 105th CAA (2021): मराठा आरक्षण मामले की सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के बाद राज्यों के अधिकार को बहाल कर उन्हें अपनी स्वयं की स्थानीय OBC सूची बनाने की शक्ति पुनः सौंपी गई।

8. आधारभूत ढांचा (Basic Structure) एवं प्रमुख न्यायिक वाद

संसद बनाम न्यायपालिका के विवादों और कॉपियों में दर्ज विशिष्ट केस लॉ का पूर्ण संकलन:

  • शंकरी प्रसाद वाद (1951) & सज्जन सिंह वाद (1965): कोर्ट ने माना कि संसद मूल अधिकारों सहित किसी भी भाग को संशोधित कर सकती है।
  • गोलकनाथ वाद (1967): 11 जजों की पीठ ने कहा कि संसद मूल अधिकारों को छू भी नहीं सकती, संशोधन असंभव है।
  • केशवानंद भारती वाद (1973): 13 जजों की ऐतिहासिक पीठ ने **"मूल ढांचे का सिद्धांत"** दिया। संसद संशोधन कर सकती है लेकिन संविधान की बुनियादी आत्मा या ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती।
  • मिनर्वा Mills वाद (1980): कोर्ट ने 42वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 368(4) व (5) में किए गए असीमित संशोधन शक्ति के प्रावधान को रद्द किया और कहा कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) मूल ढांचा है।

📋 कॉपियों में दर्ज विशिष्ट वादों के मूल ढांचे के तत्व

ऐतिहासिक वाद (Cases) कोर्ट द्वारा घोषित मूल ढांचे के बारीक तत्व
सेंट्रल कोल फील्ड्स लिमिटेड वाद (1980)न्याय तक प्रभावी पहुँच (Effective Access to Justice)
भीम सिंह जी वाद (1981)लोक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की अवधारणा और सामाजिक-आर्थिक न्याय
रघुनाथ राव वाद (1993)समानता का सिद्धांत (Principle of Equality) तथा राष्ट्र की एकता व अखंडता
एस.आर. बोम्मई वाद (1994)संघवाद, लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता (Secularism)
एल. चन्द्रकुमार वाद (1997)उच्च न्यायालयों (Art. 226) और सुप्रीम कोर्ट (Art. 32) की रिट क्षेत्राधिकार की शक्तियां
ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन (2002)एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायिक प्रणाली का होना

विषयवार अंतिम माइंड मैप (Visual Summary)

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व भाग [संवैधानिक विकासक्रम] ├──► कंपनी शासन ──► 1773 (नियामक कानून) -> 1833 (भारत का गवर्नर जनरल) -> 1853 (विधायी पृथक्करण) └──► क्राउन शासन ──► 1858 (वायसराय) -> 1919 (द्विसदन: राज्य परिषद 60, CLA 145) -> 1935 (प्रांतीय स्वायत्तता, Art. 123 का आधार) 2. संविधान सभा दलीय स्थिति (विभाजन बाद) [पुनर्गठित सभा: 299 सदस्य] ├──► प्रांतीय सीटें (229) ──► सर्वाधिक प्रभुत्व: संयुक्त प्रांत (UP) - 55 सीटें └──► रियासती सीटें (70) ──► सर्वाधिक प्रभुत्व: मैसूर रियासत - 07 सीटें 3. प्रस्तावना, संशोधन व वाद [संविधान की आत्मा] ├──► न्यायिक वाद ──► बेरुबारी (भाग नहीं) -> केशवानंद 1973 (भाग है + मूल ढांचा सिद्धांत) -> बोम्मई (पंथनिरपेक्षता मूल ढांचा) ├──► प्रक्रिया (368) ──► कोई संयुक्त बैठक नहीं -> राष्ट्रपति मंजूरी देने हेतु बाध्य (24वें संशोधन से) └──► मुख्य संशोधन ──► 42वां (लघु संविधान: 12 माह राष्ट्रपति शासन) -> 91वां (15% मंत्री सीमा, 2/3 विलय) -> 105वां (राज्य OBC सूची)